Upgrade to Pro

VIJAY SAINI

  • लॉकर और खूबसूरत औरत | हिन्दी कहानी

    अंजू अपने पति राजीव और बच्चों के साथ खुशहाल ज़िंदगी जी रही थी। एक बेटा और एक बेटी, छोटा-सा मिडिल क्लास परिवार। राजीव का कपड़ों का छोटा कारोबार था, जिससे घर आराम से चल रहा था।

    लेकिन एक दिन राजीव बदला-बदला रहने लगा। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा। बच्चों को डाँटने लगा, जो उसने कभी नहीं किया था। अंजू हैरान थी, पर वो कुछ समझ नहीं पा रही थी।

    कुछ समय बाद राजीव ने एक लॉकर रख लिया, जिसकी चाबी हमेशा उसी के पास रहती। वो ज्यादा चुप रहने लगा। अंजू को चिंता होने लगी, लेकिन वो पूछने की हिम्मत नहीं कर पाई।

    एक दिन अंजू ने राजीव को एक खूबसूरत औरत को पैसे देते देखा। वो छिप गई, लेकिन उसके मन में शक घर कर गया। क्या उसी औरत की वजह से राजीव बदला है?

    राजीव से पूछने पर वो टाल देता। धीरे-धीरे अंजू उसे हर महीने उस औरत से मिलते देखती रही। उसका शक और गहरा हो गया।

    कई साल बाद राजीव की तबीयत खराब हो गई। तब अंजू ने ज़िद की कि अब सच बताए।

    राजीव ने लॉकर खोला।

    उसमें अस्पताल की फाइलें थीं।

    राजीव ने बताया कि चार साल पहले उसे गंभीर बीमारी का पता चला था। वो टूट गया था। उसी दौरान उसे एक बेसहारा औरत मिली, जो बच्चों के साथ भीख माँग रही थी। उसने उसकी मदद शुरू की। हर महीने पैसे भेजने लगा। धीरे-धीरे और लोगों की भी मदद करने लगा।

    उसने कहा,
    “मुझे लगा था मैं ज्यादा दिन नहीं जियूँगा, इसलिए किसी के काम आ जाऊँ।”

    अच्छे कामों से उसे सुकून मिला और बीमारी भी काबू में रही।

    अंजू रो पड़ी। उसे अपनी गलतफहमी पर शर्म आई। उसने माफी माँगी।

    उस दिन के बाद दोनों मिलकर जरूरतमंदों की मदद करने लगे।

    क्योंकि सच्ची दौलत…
    लॉकर में नहीं,
    अच्छे दिल में होती है।
    लॉकर और खूबसूरत औरत | हिन्दी कहानी अंजू अपने पति राजीव और बच्चों के साथ खुशहाल ज़िंदगी जी रही थी। एक बेटा और एक बेटी, छोटा-सा मिडिल क्लास परिवार। राजीव का कपड़ों का छोटा कारोबार था, जिससे घर आराम से चल रहा था। लेकिन एक दिन राजीव बदला-बदला रहने लगा। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगा। बच्चों को डाँटने लगा, जो उसने कभी नहीं किया था। अंजू हैरान थी, पर वो कुछ समझ नहीं पा रही थी। कुछ समय बाद राजीव ने एक लॉकर रख लिया, जिसकी चाबी हमेशा उसी के पास रहती। वो ज्यादा चुप रहने लगा। अंजू को चिंता होने लगी, लेकिन वो पूछने की हिम्मत नहीं कर पाई। एक दिन अंजू ने राजीव को एक खूबसूरत औरत को पैसे देते देखा। वो छिप गई, लेकिन उसके मन में शक घर कर गया। क्या उसी औरत की वजह से राजीव बदला है? राजीव से पूछने पर वो टाल देता। धीरे-धीरे अंजू उसे हर महीने उस औरत से मिलते देखती रही। उसका शक और गहरा हो गया। कई साल बाद राजीव की तबीयत खराब हो गई। तब अंजू ने ज़िद की कि अब सच बताए। राजीव ने लॉकर खोला। उसमें अस्पताल की फाइलें थीं। राजीव ने बताया कि चार साल पहले उसे गंभीर बीमारी का पता चला था। वो टूट गया था। उसी दौरान उसे एक बेसहारा औरत मिली, जो बच्चों के साथ भीख माँग रही थी। उसने उसकी मदद शुरू की। हर महीने पैसे भेजने लगा। धीरे-धीरे और लोगों की भी मदद करने लगा। उसने कहा, “मुझे लगा था मैं ज्यादा दिन नहीं जियूँगा, इसलिए किसी के काम आ जाऊँ।” अच्छे कामों से उसे सुकून मिला और बीमारी भी काबू में रही। अंजू रो पड़ी। उसे अपनी गलतफहमी पर शर्म आई। उसने माफी माँगी। उस दिन के बाद दोनों मिलकर जरूरतमंदों की मदद करने लगे। क्योंकि सच्ची दौलत… लॉकर में नहीं, अच्छे दिल में होती है।
    1
    1 Reacties ·10 Views ·0 voorbeeld
  • **माँ का सच | जब अतीत आया सामने**

    मेरा नाम सुशीला है। मेरी एक 14 साल की बेटी है, जया। मैंने उसे अकेले ही पाला है। हम दोनों की एक छोटी-सी दुनिया है। वो स्कूल जाती है और मैं छोटा-सा पार्लर चलाती हूँ। हमारी ज़िंदगी सुकून से चल रही थी।

    लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक राज़ था, जो मैंने जया से छुपा रखा था।

    एक दिन मैं सामान लेने शहर गई थी। वहीं अचानक अजय से मुलाकात हो गई। बरसों बाद सामने खड़ा था वो इंसान, जिससे मैं कभी शादी करना चाहती थी। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया।

    अजय आज भी मुझसे प्यार करता था। उसने कहा कि वो मुझसे शादी करना चाहता है और जया को भी अपनाएगा। मैं कुछ बोल नहीं पाई। धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। वो घर भी आने लगा, लेकिन मैं जया से उसे दूर रखना चाहती थी।

    फिर वही हुआ, जिसका मुझे डर था।

    एक दिन जया अचानक घर आ गई और उसने मुझे अजय के साथ देख लिया। उसका चेहरा बदल गया। वो चुप हो गई।

    शाम को उसने खुद मुझसे पूछा,
    “मम्मी, वो कौन थे? अगर कोई सच है, तो मुझे बता दीजिए।”

    तभी अजय फिर आ गया। उसने कहा,
    “आज सच बताना जरूरी है।”

    उसने जया को बताया कि वो मेरी बेटी नहीं, बल्कि मेरे भाई की बेटी है। एक हादसे में मेरे भाई-भाभी चल बसे थे। तब जया सिर्फ 9 महीने की थी। मैं उसे लेकर दूसरे शहर आ गई और अपनी पूरी ज़िंदगी उसी के लिए समर्पित कर दी।

    मैंने रोते हुए सच मान लिया।

    जया मेरी तरफ दौड़ी और मुझसे लिपट गई।
    “आप मेरी माँ हैं… बस यही सच है,” वो बोली।

    मैंने कहा, “हाँ बेटा, तू मेरी बेटी है और मैं तेरी माँ।”

    उस दिन हमें समझ आ गया कि रिश्ता खून से नहीं, प्यार से बनता है।

    अजय आज भी शादी करना चाहता है, लेकिन मैंने कहा,
    “अब हमारी तपस्या पूरी हो गई। इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।”

    क्योंकि मेरी सबसे बड़ी खुशी… जया है।
    **माँ का सच | जब अतीत आया सामने** मेरा नाम सुशीला है। मेरी एक 14 साल की बेटी है, जया। मैंने उसे अकेले ही पाला है। हम दोनों की एक छोटी-सी दुनिया है। वो स्कूल जाती है और मैं छोटा-सा पार्लर चलाती हूँ। हमारी ज़िंदगी सुकून से चल रही थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक राज़ था, जो मैंने जया से छुपा रखा था। एक दिन मैं सामान लेने शहर गई थी। वहीं अचानक अजय से मुलाकात हो गई। बरसों बाद सामने खड़ा था वो इंसान, जिससे मैं कभी शादी करना चाहती थी। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। अजय आज भी मुझसे प्यार करता था। उसने कहा कि वो मुझसे शादी करना चाहता है और जया को भी अपनाएगा। मैं कुछ बोल नहीं पाई। धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। वो घर भी आने लगा, लेकिन मैं जया से उसे दूर रखना चाहती थी। फिर वही हुआ, जिसका मुझे डर था। एक दिन जया अचानक घर आ गई और उसने मुझे अजय के साथ देख लिया। उसका चेहरा बदल गया। वो चुप हो गई। शाम को उसने खुद मुझसे पूछा, “मम्मी, वो कौन थे? अगर कोई सच है, तो मुझे बता दीजिए।” तभी अजय फिर आ गया। उसने कहा, “आज सच बताना जरूरी है।” उसने जया को बताया कि वो मेरी बेटी नहीं, बल्कि मेरे भाई की बेटी है। एक हादसे में मेरे भाई-भाभी चल बसे थे। तब जया सिर्फ 9 महीने की थी। मैं उसे लेकर दूसरे शहर आ गई और अपनी पूरी ज़िंदगी उसी के लिए समर्पित कर दी। मैंने रोते हुए सच मान लिया। जया मेरी तरफ दौड़ी और मुझसे लिपट गई। “आप मेरी माँ हैं… बस यही सच है,” वो बोली। मैंने कहा, “हाँ बेटा, तू मेरी बेटी है और मैं तेरी माँ।” उस दिन हमें समझ आ गया कि रिश्ता खून से नहीं, प्यार से बनता है। अजय आज भी शादी करना चाहता है, लेकिन मैंने कहा, “अब हमारी तपस्या पूरी हो गई। इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।” क्योंकि मेरी सबसे बड़ी खुशी… जया है।
    1
    ·7 Views ·0 voorbeeld
  • माँ का संदूक | 20 साल का रहस्य

    सावित्री देवी अब 75 साल की हो चुकी थीं। पति के गुजरने के बाद वो अपने पुराने छोटे-से घर में अकेली रहती थीं। उनके तीन बेटे थे। तीनों अलग-अलग घरों में रहते थे, लेकिन रोज़ माँ से मिलने आते थे। उनकी पत्नियाँ भी आती थीं। घर कभी खाली नहीं रहता था।

    देखने में लगता था कि तीनों बेटे बहुत संस्कारी हैं। माँ की खूब सेवा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

    घर में एक पुराना बड़ा संदूक था, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। सावित्री जी उसे अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखती थीं। बेटे और बहुएँ समझते थे कि उसमें बहुत सारा सोना-चाँदी है।

    सबकी नज़र उसी पर थी।

    कई बार उन्होंने माँ को अपने घर ले जाने की कोशिश की, ताकि संदूक भी साथ आ जाए। लेकिन माँ हमेशा मना कर देतीं। वो जानती थीं कि उनकी सेवा प्यार से नहीं, लालच से हो रही है।

    बीस साल यूँ ही बीत गए।

    एक दिन सावित्री जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने को कहा। बाहर बेटे-बहुएँ आपस में बात करने लगे कि अब संदूक का बँटवारा कैसे होगा।

    माँ ने सब सुन लिया।

    उन्होंने सबको कमरे में बुलाया।

    “जिसके लिए तुम इतने सालों से घूम रहे हो, पहले उसे देख लो,” माँ बोलीं।

    उन्होंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और संदूक खोला।

    अंदर तीन कपड़ों में लिपटी चीज़ें रखी थीं।

    तीनों बेटों ने एक-एक उठाया और खोला।

    सबके हाथ में भारी पत्थर था।

    “ये क्या माँ?” बेटे चौंक गए।

    माँ बोलीं, “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, तब तुम सबने मुँह फेर लिया था। मैंने गहने बेचकर घर चलाया। ये पत्थर उन्होंने इसलिए रखवाए, ताकि तुम लोग लालच में मेरे पास आते रहो। वो चाहते थे कि मैं अकेली न रहूँ।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सब गुस्से में बाहर चले गए।

    माँ बिस्तर पर लेटी सब सुनती रहीं।

    संदूक में दौलत नहीं थी,
    लेकिन एक माँ का आखिरी सबक जरूर था।
    माँ का संदूक | 20 साल का रहस्य सावित्री देवी अब 75 साल की हो चुकी थीं। पति के गुजरने के बाद वो अपने पुराने छोटे-से घर में अकेली रहती थीं। उनके तीन बेटे थे। तीनों अलग-अलग घरों में रहते थे, लेकिन रोज़ माँ से मिलने आते थे। उनकी पत्नियाँ भी आती थीं। घर कभी खाली नहीं रहता था। देखने में लगता था कि तीनों बेटे बहुत संस्कारी हैं। माँ की खूब सेवा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और थी। घर में एक पुराना बड़ा संदूक था, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। सावित्री जी उसे अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखती थीं। बेटे और बहुएँ समझते थे कि उसमें बहुत सारा सोना-चाँदी है। सबकी नज़र उसी पर थी। कई बार उन्होंने माँ को अपने घर ले जाने की कोशिश की, ताकि संदूक भी साथ आ जाए। लेकिन माँ हमेशा मना कर देतीं। वो जानती थीं कि उनकी सेवा प्यार से नहीं, लालच से हो रही है। बीस साल यूँ ही बीत गए। एक दिन सावित्री जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने को कहा। बाहर बेटे-बहुएँ आपस में बात करने लगे कि अब संदूक का बँटवारा कैसे होगा। माँ ने सब सुन लिया। उन्होंने सबको कमरे में बुलाया। “जिसके लिए तुम इतने सालों से घूम रहे हो, पहले उसे देख लो,” माँ बोलीं। उन्होंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और संदूक खोला। अंदर तीन कपड़ों में लिपटी चीज़ें रखी थीं। तीनों बेटों ने एक-एक उठाया और खोला। सबके हाथ में भारी पत्थर था। “ये क्या माँ?” बेटे चौंक गए। माँ बोलीं, “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, तब तुम सबने मुँह फेर लिया था। मैंने गहने बेचकर घर चलाया। ये पत्थर उन्होंने इसलिए रखवाए, ताकि तुम लोग लालच में मेरे पास आते रहो। वो चाहते थे कि मैं अकेली न रहूँ।” कमरे में सन्नाटा छा गया। सब गुस्से में बाहर चले गए। माँ बिस्तर पर लेटी सब सुनती रहीं। संदूक में दौलत नहीं थी, लेकिन एक माँ का आखिरी सबक जरूर था।
    1
    ·8 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • माँ का संदूक | 20 साल का रहस्य**

    सावित्री देवी अब 75 साल की हो चुकी थीं। पति के गुजरने के बाद वो अपने पुराने छोटे-से घर में अकेली रहती थीं। उनके तीन बेटे थे। तीनों अलग-अलग घरों में रहते थे, लेकिन रोज़ माँ से मिलने आते थे। उनकी पत्नियाँ भी आती थीं। घर कभी खाली नहीं रहता था।

    देखने में लगता था कि तीनों बेटे बहुत संस्कारी हैं। माँ की खूब सेवा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

    घर में एक पुराना बड़ा संदूक था, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। सावित्री जी उसे अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखती थीं। बेटे और बहुएँ समझते थे कि उसमें बहुत सारा सोना-चाँदी है।

    सबकी नज़र उसी पर थी।

    कई बार उन्होंने माँ को अपने घर ले जाने की कोशिश की, ताकि संदूक भी साथ आ जाए। लेकिन माँ हमेशा मना कर देतीं। वो जानती थीं कि उनकी सेवा प्यार से नहीं, लालच से हो रही है।

    बीस साल यूँ ही बीत गए।

    एक दिन सावित्री जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने को कहा। बाहर बेटे-बहुएँ आपस में बात करने लगे कि अब संदूक का बँटवारा कैसे होगा।

    माँ ने सब सुन लिया।

    उन्होंने सबको कमरे में बुलाया।

    “जिसके लिए तुम इतने सालों से घूम रहे हो, पहले उसे देख लो,” माँ बोलीं।

    उन्होंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और संदूक खोला।

    अंदर तीन कपड़ों में लिपटी चीज़ें रखी थीं।

    तीनों बेटों ने एक-एक उठाया और खोला।

    सबके हाथ में भारी पत्थर था।

    “ये क्या माँ?” बेटे चौंक गए।

    माँ बोलीं, “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, तब तुम सबने मुँह फेर लिया था। मैंने गहने बेचकर घर चलाया। ये पत्थर उन्होंने इसलिए रखवाए, ताकि तुम लोग लालच में मेरे पास आते रहो। वो चाहते थे कि मैं अकेली न रहूँ।”

    कमरे में सन्नाटा छा गया।

    सब गुस्से में बाहर चले गए।

    माँ बिस्तर पर लेटी सब सुनती रहीं।

    संदूक में दौलत नहीं थी,
    लेकिन एक माँ का आखिरी सबक जरूर था।
    माँ का संदूक | 20 साल का रहस्य** सावित्री देवी अब 75 साल की हो चुकी थीं। पति के गुजरने के बाद वो अपने पुराने छोटे-से घर में अकेली रहती थीं। उनके तीन बेटे थे। तीनों अलग-अलग घरों में रहते थे, लेकिन रोज़ माँ से मिलने आते थे। उनकी पत्नियाँ भी आती थीं। घर कभी खाली नहीं रहता था। देखने में लगता था कि तीनों बेटे बहुत संस्कारी हैं। माँ की खूब सेवा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और थी। घर में एक पुराना बड़ा संदूक था, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। सावित्री जी उसे अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखती थीं। बेटे और बहुएँ समझते थे कि उसमें बहुत सारा सोना-चाँदी है। सबकी नज़र उसी पर थी। कई बार उन्होंने माँ को अपने घर ले जाने की कोशिश की, ताकि संदूक भी साथ आ जाए। लेकिन माँ हमेशा मना कर देतीं। वो जानती थीं कि उनकी सेवा प्यार से नहीं, लालच से हो रही है। बीस साल यूँ ही बीत गए। एक दिन सावित्री जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने को कहा। बाहर बेटे-बहुएँ आपस में बात करने लगे कि अब संदूक का बँटवारा कैसे होगा। माँ ने सब सुन लिया। उन्होंने सबको कमरे में बुलाया। “जिसके लिए तुम इतने सालों से घूम रहे हो, पहले उसे देख लो,” माँ बोलीं। उन्होंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और संदूक खोला। अंदर तीन कपड़ों में लिपटी चीज़ें रखी थीं। तीनों बेटों ने एक-एक उठाया और खोला। सबके हाथ में भारी पत्थर था। “ये क्या माँ?” बेटे चौंक गए। माँ बोलीं, “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, तब तुम सबने मुँह फेर लिया था। मैंने गहने बेचकर घर चलाया। ये पत्थर उन्होंने इसलिए रखवाए, ताकि तुम लोग लालच में मेरे पास आते रहो। वो चाहते थे कि मैं अकेली न रहूँ।” कमरे में सन्नाटा छा गया। सब गुस्से में बाहर चले गए। माँ बिस्तर पर लेटी सब सुनती रहीं। संदूक में दौलत नहीं थी, लेकिन एक माँ का आखिरी सबक जरूर था।
    ·11 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
  • ·9 Views ·0 voorbeeld
Meer blogs
Talkfever - Growing worldwide https://talkfever.com