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VIJAY SAINI

  • ## राज्य में अंधों की संख्या – अकबर बीरबल की कहानी

    एक दिन सम्राट अकबर ने राज्य के सभी अंधों को दान देने का निश्चय किया। उन्होंने आदेश दिया कि पूरे राज्य में दृष्टिहीन लोगों की सूची तैयार की जाए ताकि कोई भी वंचित न रहे।

    सूची तैयार होकर दरबार में प्रस्तुत हुई। अकबर ने वह सूची बीरबल को देकर दान बाँटने की व्यवस्था करने को कहा।

    सूची देखते ही बीरबल बोले, “महाराज, इसमें जितने नाम हैं, उनसे कहीं अधिक अंधे हमारे राज्य में हैं। सच तो यह है कि देखने वालों से ज़्यादा अंधे हैं।”

    अकबर चौंक गए। “यह कैसे संभव है? इसे सिद्ध करो,” उन्होंने चुनौती दी।

    अगले दिन बीरबल एक पुराने पलंग का ढांचा लेकर मुख्य चौराहे पर बैठ गए और उसकी रस्सी बुनने लगे। पास में एक सेवक कागज़-कलम लेकर खड़ा था।

    लोग आते, आश्चर्य से पूछते, “बीरबल, आप क्या कर रहे हैं?”
    बीरबल कुछ न कहते, बस सेवक को संकेत करते और सेवक कागज़ पर एक नाम लिख लेता।

    देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। हर कोई वही सवाल दोहराता रहा—“आप क्या कर रहे हैं?”

    शाम तक यह खबर अकबर तक पहुँची। वे स्वयं वहाँ आए और बोले, “बीरबल, यह क्या कर रहे हो?”

    सेवक ने फिर कागज़ पर एक नाम लिख लिया। तब बीरबल खड़े हुए और बोले, “महाराज, मैं अंधों की सूची बना रहा था।”

    उन्होंने वह सूची अकबर को थमा दी। अंत में अपना नाम देखकर अकबर हैरान रह गए।
    “मेरा नाम क्यों?” उन्होंने पूछा।

    बीरबल मुस्कुराए, “महाराज, आप स्पष्ट देख सकते थे कि मैं पलंग बुन रहा हूँ, फिर भी आपने पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ। जो सामने दिख रहा हो, उसे न देख पाना भी तो अंधापन ही है।”

    अकबर हँस पड़े और बोले, “तुम सही कहते हो, बीरबल। हमारे राज्य में आँखों से देखने वालों से ज़्यादा मन से अंधे लोग हैं।”

    सीख:
    सच्चा अंधापन आँखों का नहीं, समझ का होता है। जो स्पष्ट सत्य को भी न देख पाए, वही असली अंधा है।
    ## राज्य में अंधों की संख्या – अकबर बीरबल की कहानी एक दिन सम्राट अकबर ने राज्य के सभी अंधों को दान देने का निश्चय किया। उन्होंने आदेश दिया कि पूरे राज्य में दृष्टिहीन लोगों की सूची तैयार की जाए ताकि कोई भी वंचित न रहे। सूची तैयार होकर दरबार में प्रस्तुत हुई। अकबर ने वह सूची बीरबल को देकर दान बाँटने की व्यवस्था करने को कहा। सूची देखते ही बीरबल बोले, “महाराज, इसमें जितने नाम हैं, उनसे कहीं अधिक अंधे हमारे राज्य में हैं। सच तो यह है कि देखने वालों से ज़्यादा अंधे हैं।” अकबर चौंक गए। “यह कैसे संभव है? इसे सिद्ध करो,” उन्होंने चुनौती दी। अगले दिन बीरबल एक पुराने पलंग का ढांचा लेकर मुख्य चौराहे पर बैठ गए और उसकी रस्सी बुनने लगे। पास में एक सेवक कागज़-कलम लेकर खड़ा था। लोग आते, आश्चर्य से पूछते, “बीरबल, आप क्या कर रहे हैं?” बीरबल कुछ न कहते, बस सेवक को संकेत करते और सेवक कागज़ पर एक नाम लिख लेता। देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। हर कोई वही सवाल दोहराता रहा—“आप क्या कर रहे हैं?” शाम तक यह खबर अकबर तक पहुँची। वे स्वयं वहाँ आए और बोले, “बीरबल, यह क्या कर रहे हो?” सेवक ने फिर कागज़ पर एक नाम लिख लिया। तब बीरबल खड़े हुए और बोले, “महाराज, मैं अंधों की सूची बना रहा था।” उन्होंने वह सूची अकबर को थमा दी। अंत में अपना नाम देखकर अकबर हैरान रह गए। “मेरा नाम क्यों?” उन्होंने पूछा। बीरबल मुस्कुराए, “महाराज, आप स्पष्ट देख सकते थे कि मैं पलंग बुन रहा हूँ, फिर भी आपने पूछा कि मैं क्या कर रहा हूँ। जो सामने दिख रहा हो, उसे न देख पाना भी तो अंधापन ही है।” अकबर हँस पड़े और बोले, “तुम सही कहते हो, बीरबल। हमारे राज्य में आँखों से देखने वालों से ज़्यादा मन से अंधे लोग हैं।” सीख: सच्चा अंधापन आँखों का नहीं, समझ का होता है। जो स्पष्ट सत्य को भी न देख पाए, वही असली अंधा है।
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  • **पक्षी पकड़ने वाले और छोटे पक्षी की कहानी – दया की शक्ति**

    एक दिन एक पक्षी पकड़ने वाला पेड़ के नीचे जाल बिछाकर बैठा था। तभी एक छोटी चिड़िया डरकर उसके कंबल में छिप गई। ऊपर एक बाज़ मंडरा रहा था। उसे समझ आ गया कि चिड़िया जान बचाने आई है। उसके मन में दया जागी और उसने पत्थर मारकर बाज़ को भगा दिया। चिड़िया उड़ गई।

    कुछ समय बाद वह बीमार होकर मर गया। यमलोक में अनेक पक्षी उसे दंड दिलाने पहुँचे, क्योंकि उसने उन्हें पकड़ा था। तभी वही छोटी चिड़िया आई और बोली, “इसने मेरी जान बचाई थी, इसे क्षमा करें।” दया के उस एक कार्य से उसे एक वर्ष का जीवन और मिला।

    जीवित होकर उसने पक्षी पकड़ना छोड़ दिया, सब जीवों पर दया करने लगा। एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हुई और वह स्वर्ग गया।

    **सीख:** एक छोटी सी दया भी जीवन बदल सकती है। सभी प्राणियों पर करुणा रखें।
    **पक्षी पकड़ने वाले और छोटे पक्षी की कहानी – दया की शक्ति** एक दिन एक पक्षी पकड़ने वाला पेड़ के नीचे जाल बिछाकर बैठा था। तभी एक छोटी चिड़िया डरकर उसके कंबल में छिप गई। ऊपर एक बाज़ मंडरा रहा था। उसे समझ आ गया कि चिड़िया जान बचाने आई है। उसके मन में दया जागी और उसने पत्थर मारकर बाज़ को भगा दिया। चिड़िया उड़ गई। कुछ समय बाद वह बीमार होकर मर गया। यमलोक में अनेक पक्षी उसे दंड दिलाने पहुँचे, क्योंकि उसने उन्हें पकड़ा था। तभी वही छोटी चिड़िया आई और बोली, “इसने मेरी जान बचाई थी, इसे क्षमा करें।” दया के उस एक कार्य से उसे एक वर्ष का जीवन और मिला। जीवित होकर उसने पक्षी पकड़ना छोड़ दिया, सब जीवों पर दया करने लगा। एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हुई और वह स्वर्ग गया। **सीख:** एक छोटी सी दया भी जीवन बदल सकती है। सभी प्राणियों पर करुणा रखें।
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  • ## एक महिला का एक नेक काम – दिल को छू लेने वाली कहानी

    एक दुकानदार ने अभी दुकान खोली ही थी कि एक महिला आई और बोली, “ये लीजिए आपके दस रुपये।”

    दुकानदार हैरान हुआ। महिला ने समझाया, “कल मैंने 70 रुपये का सामान लिया और 100 रुपये दिए। आपने गलती से 30 की जगह 40 रुपये लौटा दिए।”

    दुकानदार ने पूछा, “जब सामान लेते समय आप पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं, तो अब दस रुपये लौटाने क्यों आईं?”

    महिला मुस्कुराई, “कीमत कम कराना मेरा अधिकार है, लेकिन तय पैसे से ज़्यादा रखना पाप है।”

    दुकानदार बोला, “मेरी गलती थी। आप रख लेतीं तो भी मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

    महिला ने शांत स्वर में कहा, “आपको न सही, मेरी अंतरात्मा को फर्क पड़ता। मैं कल रात भी आई थी, पर दुकान बंद थी। मैं सात किलोमीटर दूर से आई हूँ, क्योंकि गलत पैसे रखकर मुझे चैन नहीं मिलता। मेरे पति कहा करते थे—किसी की एक पाई भी अपने पास मत रखना। ईश्वर कभी भी हिसाब मांग सकता है।”

    उसकी बात दुकानदार के दिल को छू गई। वह तुरंत 300 रुपये लेकर एक दूसरे व्यापारी के पास गया और बोला, “कल मैंने आपसे अनजाने में ज़्यादा पैसे ले लिए थे।”

    दूसरे दुकानदार ने हँसकर कहा, “अगली बार दे देते।”

    वह बोला, “कौन जाने अगली बार हो या न हो। हिसाब साफ रहना चाहिए।”

    इन शब्दों ने पहले दुकानदार की आत्मा को झकझोर दिया। दस साल पहले उसने अपने मित्र से तीन लाख रुपये उधार लिए थे। मित्र की अचानक मृत्यु हो गई और परिवार को इस कर्ज़ का पता न था। उसने कभी वह पैसा लौटाया नहीं।

    अब उसे चैन नहीं मिला। अंततः उसने तीन लाख रुपये निकाले और मित्र की विधवा को लौटा दिए। वह महिला आँसुओं से भर उठी—वही महिला थी जिसने दस रुपये लौटाए थे।

    ### सीख

    ईमानदारी सबसे बड़ा धन है।
    हर कर्म का हिसाब होता है।
    मन की शांति पैसे से नहीं, सही आचरण से मिलती है।
    एक नेक काम कई और नेक कामों को जन्म देता है।
    ## एक महिला का एक नेक काम – दिल को छू लेने वाली कहानी एक दुकानदार ने अभी दुकान खोली ही थी कि एक महिला आई और बोली, “ये लीजिए आपके दस रुपये।” दुकानदार हैरान हुआ। महिला ने समझाया, “कल मैंने 70 रुपये का सामान लिया और 100 रुपये दिए। आपने गलती से 30 की जगह 40 रुपये लौटा दिए।” दुकानदार ने पूछा, “जब सामान लेते समय आप पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं, तो अब दस रुपये लौटाने क्यों आईं?” महिला मुस्कुराई, “कीमत कम कराना मेरा अधिकार है, लेकिन तय पैसे से ज़्यादा रखना पाप है।” दुकानदार बोला, “मेरी गलती थी। आप रख लेतीं तो भी मुझे फर्क नहीं पड़ता।” महिला ने शांत स्वर में कहा, “आपको न सही, मेरी अंतरात्मा को फर्क पड़ता। मैं कल रात भी आई थी, पर दुकान बंद थी। मैं सात किलोमीटर दूर से आई हूँ, क्योंकि गलत पैसे रखकर मुझे चैन नहीं मिलता। मेरे पति कहा करते थे—किसी की एक पाई भी अपने पास मत रखना। ईश्वर कभी भी हिसाब मांग सकता है।” उसकी बात दुकानदार के दिल को छू गई। वह तुरंत 300 रुपये लेकर एक दूसरे व्यापारी के पास गया और बोला, “कल मैंने आपसे अनजाने में ज़्यादा पैसे ले लिए थे।” दूसरे दुकानदार ने हँसकर कहा, “अगली बार दे देते।” वह बोला, “कौन जाने अगली बार हो या न हो। हिसाब साफ रहना चाहिए।” इन शब्दों ने पहले दुकानदार की आत्मा को झकझोर दिया। दस साल पहले उसने अपने मित्र से तीन लाख रुपये उधार लिए थे। मित्र की अचानक मृत्यु हो गई और परिवार को इस कर्ज़ का पता न था। उसने कभी वह पैसा लौटाया नहीं। अब उसे चैन नहीं मिला। अंततः उसने तीन लाख रुपये निकाले और मित्र की विधवा को लौटा दिए। वह महिला आँसुओं से भर उठी—वही महिला थी जिसने दस रुपये लौटाए थे। ### सीख ईमानदारी सबसे बड़ा धन है। हर कर्म का हिसाब होता है। मन की शांति पैसे से नहीं, सही आचरण से मिलती है। एक नेक काम कई और नेक कामों को जन्म देता है।
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  • ## दो डायरियाँ – पति-पत्नी की दिल छू लेने वाली कहानी

    शादी की सालगिरह से एक दिन पहले पति-पत्नी साथ बैठकर चाय पी रहे थे। दुनिया उन्हें आदर्श दंपत्ति मानती थी, पर समय के साथ उनके रिश्ते में छोटी-छोटी शिकायतें जगह बनाने लगी थीं।

    पत्नी बोली, “हमें खुलकर बात करने का समय नहीं मिलता। इसलिए मैंने दो डायरियाँ खरीदी हैं। पूरे साल हम एक-दूसरे की कमियाँ लिखेंगे। अगली सालगिरह पर इन्हें पढ़कर अपनी गलतियाँ सुधारेंगे।”

    पति ने सहमति दे दी। देखते-देखते एक साल बीत गया।

    सालगिरह के दिन उन्होंने डायरियाँ बदलीं। पति ने पत्नी की डायरी पढ़नी शुरू की।

    पहला पन्ना—“आपने मुझे अच्छा उपहार नहीं दिया।”
    दूसरा—“आप डिनर पर नहीं ले गए।”
    तीसरा—“फिल्म का वादा करके मुकर गए।”
    आगे—“मेरे रिश्तेदारों से ठीक से बात नहीं की।”
    “मेरे लिए पुरानी फैशन की ड्रेस ले आए।”

    ऐसी ही कई छोटी शिकायतों से पूरी डायरी भरी थी। पति की आंखें नम हो गईं।
    “मुझे एहसास नहीं था कि तुम इतना महसूस करती हो। मैं अपनी गलतियाँ सुधारूंगा,” उसने कहा।

    अब पत्नी ने पति की डायरी खोली।

    पहला पन्ना—खाली।
    दूसरा—खाली।
    कई पन्ने—सब खाली।

    पत्नी नाराज़ हो गई। “मैंने पूरे साल मेहनत से सब लिखा, और तुम एक पन्ना भी नहीं भर पाए!”

    पति मुस्कुराया, “सब कुछ आखिरी पन्ने पर है।”

    पत्नी ने अंतिम पन्ना खोला। उसमें लिखा था—

    “कमियाँ हर इंसान में होती हैं। पर तुमने वर्षों से मुझे और मेरे परिवार को जो प्रेम, त्याग और साथ दिया है, उसके सामने वे कमियाँ दिखाई ही नहीं देतीं। जब अच्छाइयाँ बड़ी हों, तो छोटी गलतियाँ मायने नहीं रखतीं। मैं अपनी ही परछाईं में कमी कैसे ढूँढूँ?”

    यह पढ़कर पत्नी की आंखों से आंसू बह निकले। उसे समझ आया कि वह कमियों को गिनती रही, जबकि पति ने प्रेम को देखा।

    उसने दोनों डायरियाँ जला दीं और वादा किया—अब वे शिकायतें नहीं, बल्कि एक-दूसरे की अच्छाइयाँ याद रखेंगे।

    उस दिन के बाद उनका जीवन फिर से नए विवाह जैसा खिल उठा।

    सीख:
    रिश्ते शिकायतों से नहीं, सराहना और प्रेम से मजबूत होते हैं।
    ## दो डायरियाँ – पति-पत्नी की दिल छू लेने वाली कहानी शादी की सालगिरह से एक दिन पहले पति-पत्नी साथ बैठकर चाय पी रहे थे। दुनिया उन्हें आदर्श दंपत्ति मानती थी, पर समय के साथ उनके रिश्ते में छोटी-छोटी शिकायतें जगह बनाने लगी थीं। पत्नी बोली, “हमें खुलकर बात करने का समय नहीं मिलता। इसलिए मैंने दो डायरियाँ खरीदी हैं। पूरे साल हम एक-दूसरे की कमियाँ लिखेंगे। अगली सालगिरह पर इन्हें पढ़कर अपनी गलतियाँ सुधारेंगे।” पति ने सहमति दे दी। देखते-देखते एक साल बीत गया। सालगिरह के दिन उन्होंने डायरियाँ बदलीं। पति ने पत्नी की डायरी पढ़नी शुरू की। पहला पन्ना—“आपने मुझे अच्छा उपहार नहीं दिया।” दूसरा—“आप डिनर पर नहीं ले गए।” तीसरा—“फिल्म का वादा करके मुकर गए।” आगे—“मेरे रिश्तेदारों से ठीक से बात नहीं की।” “मेरे लिए पुरानी फैशन की ड्रेस ले आए।” ऐसी ही कई छोटी शिकायतों से पूरी डायरी भरी थी। पति की आंखें नम हो गईं। “मुझे एहसास नहीं था कि तुम इतना महसूस करती हो। मैं अपनी गलतियाँ सुधारूंगा,” उसने कहा। अब पत्नी ने पति की डायरी खोली। पहला पन्ना—खाली। दूसरा—खाली। कई पन्ने—सब खाली। पत्नी नाराज़ हो गई। “मैंने पूरे साल मेहनत से सब लिखा, और तुम एक पन्ना भी नहीं भर पाए!” पति मुस्कुराया, “सब कुछ आखिरी पन्ने पर है।” पत्नी ने अंतिम पन्ना खोला। उसमें लिखा था— “कमियाँ हर इंसान में होती हैं। पर तुमने वर्षों से मुझे और मेरे परिवार को जो प्रेम, त्याग और साथ दिया है, उसके सामने वे कमियाँ दिखाई ही नहीं देतीं। जब अच्छाइयाँ बड़ी हों, तो छोटी गलतियाँ मायने नहीं रखतीं। मैं अपनी ही परछाईं में कमी कैसे ढूँढूँ?” यह पढ़कर पत्नी की आंखों से आंसू बह निकले। उसे समझ आया कि वह कमियों को गिनती रही, जबकि पति ने प्रेम को देखा। उसने दोनों डायरियाँ जला दीं और वादा किया—अब वे शिकायतें नहीं, बल्कि एक-दूसरे की अच्छाइयाँ याद रखेंगे। उस दिन के बाद उनका जीवन फिर से नए विवाह जैसा खिल उठा। सीख: रिश्ते शिकायतों से नहीं, सराहना और प्रेम से मजबूत होते हैं।
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  • कमांडर और चाय की दुकान के मालिक की कहानी – मददगार बनें

    कड़ाके की ठंड थी। तापमान शून्य डिग्री के आसपास था। पहाड़ी रास्ते पर गश्त करते हुए सैनिकों का एक दल अपने कमांडर के साथ आगे बढ़ रहा था। रास्ता अंधेरा और कठिन था। ठंड से सबकी हालत खराब थी।

    कुछ दूर उन्हें एक छोटी सी चाय की दुकान दिखाई दी, पर पास जाकर देखा तो वह बंद थी। थके हुए सैनिकों ने उम्मीद भरी नजरों से कमांडर की ओर देखा। कमांडर समझ गया कि सबको थोड़ी राहत चाहिए।

    एक सैनिक बोला, “सर, अगर एक कप चाय मिल जाए तो जान में जान आ जाए।”

    कमांडर ने शांत स्वर में कहा, “दुकान बंद है, कैसे?”

    एक जवान बोला, “सर, हम ताला तोड़ देते हैं। हम कुछ चुराएँगे नहीं, बस चाय पी लेंगे। देश की रक्षा करते हैं, इतना हक तो बनता है।”

    ठंड से कांपते सैनिकों की हालत देखकर कमांडर ने चुपचाप अनुमति दे दी। ताला तोड़ा गया। सबने चाय बनाई, बिस्कुट खाए और थोड़ी देर आराम किया। जाने से पहले कमांडर ने मेज पर 500-500 रुपये के दो नोट रख दिए।

    सुबह दुकानदार आया तो टूटा ताला देखकर घबरा गया। वह रो पड़ा, “हे भगवान! मेरा बच्चा बीमार है, इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, और अब दुकान में चोरी हो गई!”

    घबराते हुए वह अंदर गया। सामान लगभग सुरक्षित था। जब वह निराश होकर मेज पर बैठा, तो उसकी नजर दो नोटों पर पड़ी। 1000 रुपये देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए—पर इस बार खुशी के।

    अगले दिन जब सैनिक उसी रास्ते से लौटे, तो चाय पीने वहीं रुके। दुकानदार बेहद खुश था और गुनगुना रहा था।

    एक सैनिक ने पूछा, “चाचा जी, आज बहुत खुश लग रहे हो?”

    दुकानदार मुस्कुराया, “साहब, कल रात भगवान मेरी दुकान पर आए थे। मेरा बेटा बीमार है। इलाज के लिए मुझे ठीक एक हजार रुपये चाहिए थे। मैं सोच रहा था दुकान बेच दूं। सुबह ताला टूटा देखा तो लगा सब खत्म हो गया। लेकिन अंदर आया तो मेज पर 1000 रुपये रखे थे। भगवान चाय पीकर पैसे छोड़ गए।”

    यह सुनकर सभी सैनिक चुप हो गए। उनकी नजरें कमांडर पर टिक गईं। कमांडर ने बस हल्की सी मुस्कान दी और चाय खत्म कर आगे बढ़ गया।

    सीख

    छोटी सी मदद भी किसी के जीवन में चमत्कार बन सकती है।
    ईश्वर सीधे मदद करने नहीं आता—वह इंसानों के जरिए काम करता है।
    जहाँ भी अवसर मिले, मदद के लिए हाथ जरूर बढ़ाएँ।
    कमांडर और चाय की दुकान के मालिक की कहानी – मददगार बनें कड़ाके की ठंड थी। तापमान शून्य डिग्री के आसपास था। पहाड़ी रास्ते पर गश्त करते हुए सैनिकों का एक दल अपने कमांडर के साथ आगे बढ़ रहा था। रास्ता अंधेरा और कठिन था। ठंड से सबकी हालत खराब थी। कुछ दूर उन्हें एक छोटी सी चाय की दुकान दिखाई दी, पर पास जाकर देखा तो वह बंद थी। थके हुए सैनिकों ने उम्मीद भरी नजरों से कमांडर की ओर देखा। कमांडर समझ गया कि सबको थोड़ी राहत चाहिए। एक सैनिक बोला, “सर, अगर एक कप चाय मिल जाए तो जान में जान आ जाए।” कमांडर ने शांत स्वर में कहा, “दुकान बंद है, कैसे?” एक जवान बोला, “सर, हम ताला तोड़ देते हैं। हम कुछ चुराएँगे नहीं, बस चाय पी लेंगे। देश की रक्षा करते हैं, इतना हक तो बनता है।” ठंड से कांपते सैनिकों की हालत देखकर कमांडर ने चुपचाप अनुमति दे दी। ताला तोड़ा गया। सबने चाय बनाई, बिस्कुट खाए और थोड़ी देर आराम किया। जाने से पहले कमांडर ने मेज पर 500-500 रुपये के दो नोट रख दिए। सुबह दुकानदार आया तो टूटा ताला देखकर घबरा गया। वह रो पड़ा, “हे भगवान! मेरा बच्चा बीमार है, इलाज के लिए पैसे नहीं हैं, और अब दुकान में चोरी हो गई!” घबराते हुए वह अंदर गया। सामान लगभग सुरक्षित था। जब वह निराश होकर मेज पर बैठा, तो उसकी नजर दो नोटों पर पड़ी। 1000 रुपये देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए—पर इस बार खुशी के। अगले दिन जब सैनिक उसी रास्ते से लौटे, तो चाय पीने वहीं रुके। दुकानदार बेहद खुश था और गुनगुना रहा था। एक सैनिक ने पूछा, “चाचा जी, आज बहुत खुश लग रहे हो?” दुकानदार मुस्कुराया, “साहब, कल रात भगवान मेरी दुकान पर आए थे। मेरा बेटा बीमार है। इलाज के लिए मुझे ठीक एक हजार रुपये चाहिए थे। मैं सोच रहा था दुकान बेच दूं। सुबह ताला टूटा देखा तो लगा सब खत्म हो गया। लेकिन अंदर आया तो मेज पर 1000 रुपये रखे थे। भगवान चाय पीकर पैसे छोड़ गए।” यह सुनकर सभी सैनिक चुप हो गए। उनकी नजरें कमांडर पर टिक गईं। कमांडर ने बस हल्की सी मुस्कान दी और चाय खत्म कर आगे बढ़ गया। सीख छोटी सी मदद भी किसी के जीवन में चमत्कार बन सकती है। ईश्वर सीधे मदद करने नहीं आता—वह इंसानों के जरिए काम करता है। जहाँ भी अवसर मिले, मदद के लिए हाथ जरूर बढ़ाएँ।
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  • दृष्टिहीन पति - दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी

    एक आदमी ने एक बहुत सुंदर लड़की से शादी की। शादी के बाद वे खुशी-खुशी रहने लगे। आदमी उसकी सुंदरता का मुग्ध था और उससे बहुत प्यार करता था।

    लेकिन कुछ महीनों बाद पत्नी को पता चला कि वह एक त्वचा रोग से पीड़ित है और इसी वजह से धीरे-धीरे उसकी सुंदरता क्षीण हो जाएगी।

    यह जानकर पत्नी मन ही मन सोचने लगी, "अगर मैं बदसूरत हो गई तो क्या होगा, मेरे पति मुझसे नफरत करने लगेंगे... मैं उनकी नफरत बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी।"

    इसी बीच, एक दिन उनके पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। काम खत्म करके घर लौटते समय उनका एक्सीडेंट हो गया। उस एक्सीडेंट में उनकी दोनों आंखें चली गईं।

    इन सब के बावजूद, उनका वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से आगे बढ़ता रहा।

    समय बीतता गया और त्वचा रोग के कारण पत्नी की सारी सुंदरता क्षीण हो गई। वह बदसूरत हो गई, लेकिन उसके अंधे पति को यह दिखाई नहीं दिया। इसलिए इसका उनके वैवाहिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

    वह हमेशा की तरह उससे प्यार करता रहा।

    एक दिन पत्नी का निधन हो गया। अब पति दुखी और अकेला था। उसने उस शहर को छोड़ने का फैसला किया।

    उन्होंने अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कर लीं। अगले दिन, जब वे जाने ही वाले थे, तो उनके पड़ोसी ने उन्हें देखा और उनके पास जाकर कहा, “आप अपनी पत्नी के सहारे के बिना कैसे जी पाएंगे? आप देख नहीं सकते और आपकी पत्नी वर्षों से हमेशा आपका सहारा और मदद करती रही हैं। आपके लिए यह बहुत मुश्किल होगा।”

    पति ने जवाब दिया, "दोस्त, मैं अंधा नहीं हूँ। मैं तो बस अंधे होने का नाटक कर रहा था। क्योंकि जब मेरी पत्नी को अपनी बीमारी के बारे में पता चला तो मुझे एहसास हुआ कि वह इससे परेशान और डरी हुई थी।"

    अगर मेरी पत्नी को पता होता कि मैं उसकी कुरूपता देख सकता हूँ, तो उसे अपनी बीमारी से भी ज़्यादा दुख होता। वह बहुत अच्छी पत्नी थी और मैं बस उसे खुश रखना चाहता था। इसीलिए इतने सालों तक मैंने अंधा होने का नाटक किया।

    सीख:
    खुश रहने के लिए, कभी-कभी हमें एक-दूसरे की कमियों को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए।
    दृष्टिहीन पति - दिल को छू लेने वाली प्रेम कहानी एक आदमी ने एक बहुत सुंदर लड़की से शादी की। शादी के बाद वे खुशी-खुशी रहने लगे। आदमी उसकी सुंदरता का मुग्ध था और उससे बहुत प्यार करता था। लेकिन कुछ महीनों बाद पत्नी को पता चला कि वह एक त्वचा रोग से पीड़ित है और इसी वजह से धीरे-धीरे उसकी सुंदरता क्षीण हो जाएगी। यह जानकर पत्नी मन ही मन सोचने लगी, "अगर मैं बदसूरत हो गई तो क्या होगा, मेरे पति मुझसे नफरत करने लगेंगे... मैं उनकी नफरत बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी।" इसी बीच, एक दिन उनके पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। काम खत्म करके घर लौटते समय उनका एक्सीडेंट हो गया। उस एक्सीडेंट में उनकी दोनों आंखें चली गईं। इन सब के बावजूद, उनका वैवाहिक जीवन सामान्य रूप से आगे बढ़ता रहा। समय बीतता गया और त्वचा रोग के कारण पत्नी की सारी सुंदरता क्षीण हो गई। वह बदसूरत हो गई, लेकिन उसके अंधे पति को यह दिखाई नहीं दिया। इसलिए इसका उनके वैवाहिक जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह हमेशा की तरह उससे प्यार करता रहा। एक दिन पत्नी का निधन हो गया। अब पति दुखी और अकेला था। उसने उस शहर को छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपनी पत्नी के अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कर लीं। अगले दिन, जब वे जाने ही वाले थे, तो उनके पड़ोसी ने उन्हें देखा और उनके पास जाकर कहा, “आप अपनी पत्नी के सहारे के बिना कैसे जी पाएंगे? आप देख नहीं सकते और आपकी पत्नी वर्षों से हमेशा आपका सहारा और मदद करती रही हैं। आपके लिए यह बहुत मुश्किल होगा।” पति ने जवाब दिया, "दोस्त, मैं अंधा नहीं हूँ। मैं तो बस अंधे होने का नाटक कर रहा था। क्योंकि जब मेरी पत्नी को अपनी बीमारी के बारे में पता चला तो मुझे एहसास हुआ कि वह इससे परेशान और डरी हुई थी।" अगर मेरी पत्नी को पता होता कि मैं उसकी कुरूपता देख सकता हूँ, तो उसे अपनी बीमारी से भी ज़्यादा दुख होता। वह बहुत अच्छी पत्नी थी और मैं बस उसे खुश रखना चाहता था। इसीलिए इतने सालों तक मैंने अंधा होने का नाटक किया। सीख: खुश रहने के लिए, कभी-कभी हमें एक-दूसरे की कमियों को नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए।
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  • डाकिया और बूढ़ी औरत – दिल को छू लेने वाली कहानी

    “अम्मा, आपके बेटे ने मनी ऑर्डर भेजा है,” डाकिया ने दरवाजे पर बैठी बुज़ुर्ग महिला से कहा।

    अम्मा की आंखें चमक उठीं। “बेटा, पहले मुझे उससे बात करा दे… बस उसकी आवाज़ सुन लूं।”

    डाकिया हर बार की तरह थोड़ा झिझका, फिर मोबाइल निकालकर एक नंबर डायल किया। “लो अम्मा, ज्यादा देर मत करना।”

    अम्मा ने कांपते हाथों से फोन लिया। “हेलो बेटा… खाना समय पर खा रहे हो न? मैं ठीक हूं… बस तुम्हारी याद आती है।”
    एक मिनट की बात ने उनके चेहरे पर महीनों की खुशी लौटा दी।

    डाकिया ने उन्हें हजार रुपये दिए। पैसे गिनकर अम्मा ने सौ रुपये निकालकर उसकी ओर बढ़ाए।
    “इसे रख लो बेटा, फोन कराने के पैसे लगते होंगे।”

    डाकिया ने मना किया, पर अम्मा ने आशीर्वाद देते हुए जबरदस्ती रखवा दिए।

    कुछ दूर जाकर मोबाइल दुकान वाला रामू मिला। उसने पूछा, “भाई, आप हर महीने अपनी जेब से अम्मा को पैसे क्यों देते हैं? और मुझे उनके बेटे की तरह बात करने के लिए पैसे भी देते हैं?”

    डाकिया की आंखें भर आईं।
    “क्योंकि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। एक साल पहले उसकी बीमारी से मौत हो गई। उस दिन मुझसे अम्मा को सच कहते नहीं बना। वह उम्मीद से दरवाजे पर बैठी थीं। मैं उनका दिल नहीं तोड़ पाया।”

    रामू स्तब्ध रह गया।

    डाकिया ने धीमे से कहा, “मैं भी अपनी मां को हर महीने हजार रुपये भेजता था। अब वह नहीं रहीं। इसलिए ये पैसे मैं अपनी मां को ही देता हूं… बस चेहरा बदल गया है।”

    उस दिन के बाद रामू ने पैसे लेना छोड़ दिया और सच्चे बेटे की तरह अम्मा से बात करने लगा।

    एक दिन सर्द धूप में अम्मा खाट पर बैठी थीं। डाकिया आया, “अम्मा, आपके बेटे का मनी ऑर्डर…”
    पर आज अम्मा शांत थीं। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। जैसे बेटे की आवाज़ सुनते-सुनते सो गई हों।

    डाकिया की आंखों से आंसू बह निकले। उसने आसमान की ओर देखा—
    “मां, आज आपका कर्ज थोड़ा सा चुका पाया।”

    संदेश:
    कभी-कभी किसी का विश्वास बचाना ही सबसे बड़ा धर्म होता है। मां की खुशी में ही सच्ची इंसानियत छिपी है।
    डाकिया और बूढ़ी औरत – दिल को छू लेने वाली कहानी “अम्मा, आपके बेटे ने मनी ऑर्डर भेजा है,” डाकिया ने दरवाजे पर बैठी बुज़ुर्ग महिला से कहा। अम्मा की आंखें चमक उठीं। “बेटा, पहले मुझे उससे बात करा दे… बस उसकी आवाज़ सुन लूं।” डाकिया हर बार की तरह थोड़ा झिझका, फिर मोबाइल निकालकर एक नंबर डायल किया। “लो अम्मा, ज्यादा देर मत करना।” अम्मा ने कांपते हाथों से फोन लिया। “हेलो बेटा… खाना समय पर खा रहे हो न? मैं ठीक हूं… बस तुम्हारी याद आती है।” एक मिनट की बात ने उनके चेहरे पर महीनों की खुशी लौटा दी। डाकिया ने उन्हें हजार रुपये दिए। पैसे गिनकर अम्मा ने सौ रुपये निकालकर उसकी ओर बढ़ाए। “इसे रख लो बेटा, फोन कराने के पैसे लगते होंगे।” डाकिया ने मना किया, पर अम्मा ने आशीर्वाद देते हुए जबरदस्ती रखवा दिए। कुछ दूर जाकर मोबाइल दुकान वाला रामू मिला। उसने पूछा, “भाई, आप हर महीने अपनी जेब से अम्मा को पैसे क्यों देते हैं? और मुझे उनके बेटे की तरह बात करने के लिए पैसे भी देते हैं?” डाकिया की आंखें भर आईं। “क्योंकि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है। एक साल पहले उसकी बीमारी से मौत हो गई। उस दिन मुझसे अम्मा को सच कहते नहीं बना। वह उम्मीद से दरवाजे पर बैठी थीं। मैं उनका दिल नहीं तोड़ पाया।” रामू स्तब्ध रह गया। डाकिया ने धीमे से कहा, “मैं भी अपनी मां को हर महीने हजार रुपये भेजता था। अब वह नहीं रहीं। इसलिए ये पैसे मैं अपनी मां को ही देता हूं… बस चेहरा बदल गया है।” उस दिन के बाद रामू ने पैसे लेना छोड़ दिया और सच्चे बेटे की तरह अम्मा से बात करने लगा। एक दिन सर्द धूप में अम्मा खाट पर बैठी थीं। डाकिया आया, “अम्मा, आपके बेटे का मनी ऑर्डर…” पर आज अम्मा शांत थीं। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। जैसे बेटे की आवाज़ सुनते-सुनते सो गई हों। डाकिया की आंखों से आंसू बह निकले। उसने आसमान की ओर देखा— “मां, आज आपका कर्ज थोड़ा सा चुका पाया।” संदेश: कभी-कभी किसी का विश्वास बचाना ही सबसे बड़ा धर्म होता है। मां की खुशी में ही सच्ची इंसानियत छिपी है।
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  • अंधापन और सुंदरता से परे – पति-पत्नी की कहानी

    एक आदमी ने एक खूबसूरत औरत से शादी की, वह उससे बहुत प्यार करता था। एक दिन, उसे त्वचा की बीमारी हो गई और धीरे-धीरे उसकी सुंदरता क्षीण होने लगी।
    एक दोपहर, उनके पति टहलने के लिए बाहर गए। लौटते समय, उनका एक दुर्घटना में एक्सीडेंट हो गया और उनकी आंखों की रोशनी चली गई।
    उनका वैवाहिक जीवन पहले की तरह चलता रहा। दिन बीतते-बीतते उसकी सुंदरता कम होती गई, लेकिन उसके अंधे पति को इसका कभी पता नहीं चला। उनके प्यार में कोई बदलाव नहीं आया था। वह उससे उतना ही गहरा प्यार करता था और वह भी उससे उतना ही प्यार करती थी।
    एक दिन, उसका देहांत हो गया। उसकी मृत्यु से उसे अपार दुःख हुआ। उसने अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कीं और शहर छोड़ने का फैसला किया।
    जब वह जा रहा था, तभी किसी ने पुकार कर कहा, "अब आप अकेले कैसे चल पाएंगे? इतने दिनों तक तो आपकी पत्नी आपकी मदद करती थी।"
    उस आदमी ने जवाब दिया, “मैं अंधा नहीं हूँ। मैं तो बस अंधा होने का नाटक कर रहा था। अगर उसे पता चल जाता कि मैं उसकी हालत देख सकता हूँ, तो उसे बीमारी से भी ज़्यादा तकलीफ़ होती। मैं उससे सिर्फ़ उसकी खूबसूरती के लिए प्यार नहीं करता था। मैं उसके दयालु और स्नेही स्वभाव से प्यार करता था। इसीलिए मैंने अंधे होने का नाटक किया। मैं बस उसे खुश रखना चाहता था।”

    शिक्षा:
    जब आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं, तो आप उन्हें खुश रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। सच्चा प्यार हर चीज को स्वीकार करता है – कमियों को, असुविधाओं को और समय के बीतने को। यही “स्वीकृति” प्यार को शाश्वत बनाती है। जो व्यक्ति कमियों में भी सुंदरता देख सकता है, वह जानता है कि प्यार कोई समझौता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है।
    अंधापन और सुंदरता से परे – पति-पत्नी की कहानी एक आदमी ने एक खूबसूरत औरत से शादी की, वह उससे बहुत प्यार करता था। एक दिन, उसे त्वचा की बीमारी हो गई और धीरे-धीरे उसकी सुंदरता क्षीण होने लगी। एक दोपहर, उनके पति टहलने के लिए बाहर गए। लौटते समय, उनका एक दुर्घटना में एक्सीडेंट हो गया और उनकी आंखों की रोशनी चली गई। उनका वैवाहिक जीवन पहले की तरह चलता रहा। दिन बीतते-बीतते उसकी सुंदरता कम होती गई, लेकिन उसके अंधे पति को इसका कभी पता नहीं चला। उनके प्यार में कोई बदलाव नहीं आया था। वह उससे उतना ही गहरा प्यार करता था और वह भी उससे उतना ही प्यार करती थी। एक दिन, उसका देहांत हो गया। उसकी मृत्यु से उसे अपार दुःख हुआ। उसने अंतिम संस्कार की सभी रस्में पूरी कीं और शहर छोड़ने का फैसला किया। जब वह जा रहा था, तभी किसी ने पुकार कर कहा, "अब आप अकेले कैसे चल पाएंगे? इतने दिनों तक तो आपकी पत्नी आपकी मदद करती थी।" उस आदमी ने जवाब दिया, “मैं अंधा नहीं हूँ। मैं तो बस अंधा होने का नाटक कर रहा था। अगर उसे पता चल जाता कि मैं उसकी हालत देख सकता हूँ, तो उसे बीमारी से भी ज़्यादा तकलीफ़ होती। मैं उससे सिर्फ़ उसकी खूबसूरती के लिए प्यार नहीं करता था। मैं उसके दयालु और स्नेही स्वभाव से प्यार करता था। इसीलिए मैंने अंधे होने का नाटक किया। मैं बस उसे खुश रखना चाहता था।” शिक्षा: जब आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं, तो आप उन्हें खुश रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। सच्चा प्यार हर चीज को स्वीकार करता है – कमियों को, असुविधाओं को और समय के बीतने को। यही “स्वीकृति” प्यार को शाश्वत बनाती है। जो व्यक्ति कमियों में भी सुंदरता देख सकता है, वह जानता है कि प्यार कोई समझौता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है।
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