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  • ज़िंदगी में कभी ये मत सोचो
    कि कौन कब, कैसे, कहाँ बदल गया…

    बस इतना देखो
    वह तुम्हें *सिखा कर क्या गया।*

    ✨ यही जीवन का सच्चा ज्ञान है।

    पीड़ाएँ केवल दुःख नहीं देतीं,
    वे हमें *समझदार, मजबूत और जागरूक* भी बनाती हैं।" 🌸
    ज़िंदगी में कभी ये मत सोचो कि कौन कब, कैसे, कहाँ बदल गया… बस इतना देखो वह तुम्हें *सिखा कर क्या गया।* ✨ यही जीवन का सच्चा ज्ञान है। पीड़ाएँ केवल दुःख नहीं देतीं, वे हमें *समझदार, मजबूत और जागरूक* भी बनाती हैं।" 🌸
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  • फ़कीर

    एक दिन एक फ़कीर अकबर के महल में आया।

    वह महल की चारदीवारी पर बैठकर प्रार्थना करने लगा।

    सिपाहियों ने सोचा कि वह थोड़ी देर बाद स्वतः चला जाएगा, किन्तु वह वहीं

    बैठा रहा। घंटों बीत गए।

    फ़कीर की इस अनाधिकार चेष्टा से अकबर

    खीझ उठा और फ़कीर से जाकर बोला,

    “हे पवित्रात्मा! यह महल है, आश्रम या धर्मशाला नहीं। आप जहाँ चाहें वहाँ बैठकर इस प्रकार ध्यान नहीं लगा सकते।"

    फ़कीर ने पूछा, “आपसे पहले इस महल में कौन रहता था?"

    "पहले मेरे दादा जी, फिर मेरे पिता और अब मैं रहता हूँ।

    मेरे बाद मेरा पुत्र और फिर मेरा पोता..." अकबर ने उत्तर दिया।

    अर्थात् लोग आते और चले जाते हैं।

    यहाँ कोई भी सदा नहीं रहता है।

    तब क्या आपको लगता नहीं कि यह एक आश्रम है?

    उसी प्रकार से यह संसार एक आश्रम है जहाँ हम कुछ समय तक रहते हैं

    और फिर चले जाते हैं।" अकबर निरुत्तर हो गया था।

    फ़कीर को लगा कि सम्राट् को बात समझ आ चुकी थी इसलिए उसने अपनी पगड़ी और दाढ़ी उतार दी।

    अकबर यह देखकर हैरान रह गया कि फ़कीर और

    कोई नहीं पर छद्म वेष में बीरबल ही था ।
    फ़कीर एक दिन एक फ़कीर अकबर के महल में आया। वह महल की चारदीवारी पर बैठकर प्रार्थना करने लगा। सिपाहियों ने सोचा कि वह थोड़ी देर बाद स्वतः चला जाएगा, किन्तु वह वहीं बैठा रहा। घंटों बीत गए। फ़कीर की इस अनाधिकार चेष्टा से अकबर खीझ उठा और फ़कीर से जाकर बोला, “हे पवित्रात्मा! यह महल है, आश्रम या धर्मशाला नहीं। आप जहाँ चाहें वहाँ बैठकर इस प्रकार ध्यान नहीं लगा सकते।" फ़कीर ने पूछा, “आपसे पहले इस महल में कौन रहता था?" "पहले मेरे दादा जी, फिर मेरे पिता और अब मैं रहता हूँ। मेरे बाद मेरा पुत्र और फिर मेरा पोता..." अकबर ने उत्तर दिया। अर्थात् लोग आते और चले जाते हैं। यहाँ कोई भी सदा नहीं रहता है। तब क्या आपको लगता नहीं कि यह एक आश्रम है? उसी प्रकार से यह संसार एक आश्रम है जहाँ हम कुछ समय तक रहते हैं और फिर चले जाते हैं।" अकबर निरुत्तर हो गया था। फ़कीर को लगा कि सम्राट् को बात समझ आ चुकी थी इसलिए उसने अपनी पगड़ी और दाढ़ी उतार दी। अकबर यह देखकर हैरान रह गया कि फ़कीर और कोई नहीं पर छद्म वेष में बीरबल ही था ।
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  • बीरबल के गुरु

    एक दिन अकबर ने कहा, “बीरबल, मैं तुम्हारे गुरु से मिलना चाहता हूँ।”

    बीरबल का कोई गुरु था ही नहीं पर वह बादशाह को यह बताना नहीं चाहता था।

    उसने झूठ बोलते हुए कहा कि उसके गए हुए हैं।

    फिर भी अकबर गुरु से मिलने पर जोर देते रहे।

    बीरबल ने एक गरीब गड़रिए तीर्थाटन पर गुरु को अपना गुरु बनने का प्रशिक्षण दिया।

    इस कार्य को करने के लिए बीरबल

    ने उसे पचास स्वर्ण मुद्राएँ दीं।

    गड़रिए ने अपना रूप बदलकर एक साधु

    का रूप धर लिया। कई माह बाद बीरबल अकबर को अपने

    कहा,

    गुरु से मिलाने ले गया।

    अकबर ने गुरु का अभिनन्दन कर 'आपका अभिनन्दन है गुरु जी, मैं आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ।”

    गुरु मौन रहे। अकबर ने सोचा कि शायद उन्हें धन चाहिए... उन्होंने अशर्फ़ियों का कटोरा उनके सामने रखा।

    फिर भी गुरु जी ने कुछ नहीं कहा।

    रुष्ट होकर अकबर अपने महल लौट आए।

    उन्होंने बीरबल को बुलाकर पूछा, "एक मूर्ख से मिलने पर हमें क्या करना चाहिए?"

    छूटते ही बीरबल ने कहा, " शांत

    रहें।" अकबर को एक झटका लगा।

    उन्होंने सोचा... स्वर्ण मुद्राएँ देने के कारण अवश्य ही गुरु जी ने मुझे मूर्ख समझ लिया होगा इसीलिए वे शांत रहे।
    बीरबल के गुरु एक दिन अकबर ने कहा, “बीरबल, मैं तुम्हारे गुरु से मिलना चाहता हूँ।” बीरबल का कोई गुरु था ही नहीं पर वह बादशाह को यह बताना नहीं चाहता था। उसने झूठ बोलते हुए कहा कि उसके गए हुए हैं। फिर भी अकबर गुरु से मिलने पर जोर देते रहे। बीरबल ने एक गरीब गड़रिए तीर्थाटन पर गुरु को अपना गुरु बनने का प्रशिक्षण दिया। इस कार्य को करने के लिए बीरबल ने उसे पचास स्वर्ण मुद्राएँ दीं। गड़रिए ने अपना रूप बदलकर एक साधु का रूप धर लिया। कई माह बाद बीरबल अकबर को अपने कहा, गुरु से मिलाने ले गया। अकबर ने गुरु का अभिनन्दन कर 'आपका अभिनन्दन है गुरु जी, मैं आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ।” गुरु मौन रहे। अकबर ने सोचा कि शायद उन्हें धन चाहिए... उन्होंने अशर्फ़ियों का कटोरा उनके सामने रखा। फिर भी गुरु जी ने कुछ नहीं कहा। रुष्ट होकर अकबर अपने महल लौट आए। उन्होंने बीरबल को बुलाकर पूछा, "एक मूर्ख से मिलने पर हमें क्या करना चाहिए?" छूटते ही बीरबल ने कहा, " शांत रहें।" अकबर को एक झटका लगा। उन्होंने सोचा... स्वर्ण मुद्राएँ देने के कारण अवश्य ही गुरु जी ने मुझे मूर्ख समझ लिया होगा इसीलिए वे शांत रहे।
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  • जो होता है अच्छा होता है

    एक दिन शिकार करते समय अकबर की अँगुली कट गई।

    बीरबल ने यह देखा तो कहा, “जो होता है अच्छा होता है।”

    बीरबल की बात सुनकर अकबर नाराज हो उठा और उसे अपनी नज़रों से दूर कर राज्य से

    निकाल दिया। जाते-जाते बीरबल ने कहा, "यह भी अच्छा ही हुआ।" कई दिनों बाद

    अकबर पुनः शिकार करने गया।

    जंगल में कबीलियों ने उसे पकड़ लिया। वे

    अपने देवता को अकबर की बलि देने ले गए।

    वह बुरी तरह डर गया।

    कबीले वाले अकबर की बलि देने की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्होंने उसकी कटी हुई अँगुली देखी।

    उसने कहा, “ओह! हम इसकी बलि नहीं दे सकते।

    देखो, इसकी अँगुली कटी हुई है।

    दोषपूर्ण शरीर की बलि अपने भगवान को नहीं दी जा सकती है।"

    उन लोगों ने यह कहकर अकबर को छोड़ दिया।

    घर वापस आकर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उसे सारा किस्सा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए कहा, "तुम्हारा कथन सत्य हो गया।

    पर तुम्हें राज्य से निकालने की मेरी आज्ञा तुम्हारे लिए अच्छी कैसे हुई?"

    बीरबल ने कहा, "यदि आपने मुझे जाने के लिए नहीं कहा होता तो शायद मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता ।

    वहाँ आपकी जगह मुझे पकड़कर कबीले वाले मेरी बलि चढ़ा देते।

    आपकी आज्ञा ने तो मेरी जान बचा दी।"
    जो होता है अच्छा होता है एक दिन शिकार करते समय अकबर की अँगुली कट गई। बीरबल ने यह देखा तो कहा, “जो होता है अच्छा होता है।” बीरबल की बात सुनकर अकबर नाराज हो उठा और उसे अपनी नज़रों से दूर कर राज्य से निकाल दिया। जाते-जाते बीरबल ने कहा, "यह भी अच्छा ही हुआ।" कई दिनों बाद अकबर पुनः शिकार करने गया। जंगल में कबीलियों ने उसे पकड़ लिया। वे अपने देवता को अकबर की बलि देने ले गए। वह बुरी तरह डर गया। कबीले वाले अकबर की बलि देने की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्होंने उसकी कटी हुई अँगुली देखी। उसने कहा, “ओह! हम इसकी बलि नहीं दे सकते। देखो, इसकी अँगुली कटी हुई है। दोषपूर्ण शरीर की बलि अपने भगवान को नहीं दी जा सकती है।" उन लोगों ने यह कहकर अकबर को छोड़ दिया। घर वापस आकर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उसे सारा किस्सा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए कहा, "तुम्हारा कथन सत्य हो गया। पर तुम्हें राज्य से निकालने की मेरी आज्ञा तुम्हारे लिए अच्छी कैसे हुई?" बीरबल ने कहा, "यदि आपने मुझे जाने के लिए नहीं कहा होता तो शायद मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता । वहाँ आपकी जगह मुझे पकड़कर कबीले वाले मेरी बलि चढ़ा देते। आपकी आज्ञा ने तो मेरी जान बचा दी।"
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  • ईर्ष्यालु दरबारी

    अकबर के दरबार में एक दिन एक दरबारी ने कहा, “महाराज !

    मेरी समझ से बीरबल बुद्धिमान नहीं है।

    पर हाँ, यदि वह मेरे प्रश्नों का सही उत्तर दे दे तो मैं उसकी बुद्धिमता को मान लूँगा।”

    अकबर सहमत हो गए।

    उन्होंने बीरबल से कहा कि यदि उसने प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दिए तो वह दंड का अधिकारी होगा।

    दरबारी ने तीन प्रश्न पूछे:-

    1. आकाश में कितने तारे हैं?

    2. धरती का मध्य कहाँ है?

    3. संसार में कितने स्त्री और पुरुष हैं?

    बीरबल तुरंत एक भेड़ लेकर आया और बोला, “आकाश में उतने ही तारे हैं जितने इस भेड़ के शरीर पर बाल हैं।

    " फिर बीरबल ने धरती पर दो रेखाएँ खींची और उनके बीच एक लोहे की सरिया रखकर उसे ही धरती का मध्य (केन्द्र) बताया।

    तीसरे प्रश्न के उत्तर में बीरबल ने कहा, “पुरुष और स्त्री की

    सही संख्या तो बतानी ज़रा कठिन है क्योंकि दरबारी जैसे नमूने तो दोनों में से किसी भी वर्ग में नहीं आते हैं।”

    शर्मिन्दा हुए दरबारी ने बीरबल से क्षमा-याचना की।
    ईर्ष्यालु दरबारी अकबर के दरबार में एक दिन एक दरबारी ने कहा, “महाराज ! मेरी समझ से बीरबल बुद्धिमान नहीं है। पर हाँ, यदि वह मेरे प्रश्नों का सही उत्तर दे दे तो मैं उसकी बुद्धिमता को मान लूँगा।” अकबर सहमत हो गए। उन्होंने बीरबल से कहा कि यदि उसने प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दिए तो वह दंड का अधिकारी होगा। दरबारी ने तीन प्रश्न पूछे:- 1. आकाश में कितने तारे हैं? 2. धरती का मध्य कहाँ है? 3. संसार में कितने स्त्री और पुरुष हैं? बीरबल तुरंत एक भेड़ लेकर आया और बोला, “आकाश में उतने ही तारे हैं जितने इस भेड़ के शरीर पर बाल हैं। " फिर बीरबल ने धरती पर दो रेखाएँ खींची और उनके बीच एक लोहे की सरिया रखकर उसे ही धरती का मध्य (केन्द्र) बताया। तीसरे प्रश्न के उत्तर में बीरबल ने कहा, “पुरुष और स्त्री की सही संख्या तो बतानी ज़रा कठिन है क्योंकि दरबारी जैसे नमूने तो दोनों में से किसी भी वर्ग में नहीं आते हैं।” शर्मिन्दा हुए दरबारी ने बीरबल से क्षमा-याचना की।
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  • आधा इनाम

    एक बार महेश दास राजा अकबर से मिलने गया ।

    महल के द्वार के पहरेदारों ने उससे पूछा, “तुम्हें राजा से क्या काम है?”

    “महाराज ने मुझे बुलाया है, " महेश ने कहा । "

    ठीक है, तुम जा सकते हो पर तुम्हें अपने इनाम का आधा भाग मुझे देना पड़ेगा,” पहरेदार ने कहा ।

    महेश सहमत हो गया।

    कुछ माह पूर्व अकबर जंगल में रास्ता भटक गया था तब महेश ने ही उन्हें बाहर निकलने का रास्ता दिखाया था।

    अकबर ने तुरंत महेश को पहचान लिया और उससे पूछा, "इनाम में तुम क्या चाहते हो?"

    महेश ने कहा " पचास कोड़े । "

    कारण पूछने पर महेश ने कहा कि इनाम मिलने के बाद वह बताएगा ।

    पच्चीस कोड़े खाने के बाद महेश ने सिपाहियों को रोका और द्वार पर खड़े पहरेदार को बुलवाया।

    इनाम पाने की लालसा से पहरेदार बहुत प्रसन्न हो रहा था।

    महेश ने कहा, " इस पहरेदार ने मुझे आधा इनाम देने के लिए कहा था,

    अतः अब शेष पच्चीस कोड़े इसे लगाए जाएँ।"

    इस प्रकार पहरेदार को पच्चीस कोड़े खाने पड़े।

    अकबर ने महेश को अपना मंत्री नियुक्त कर लिया और वह बीरबल कहलाया ।
    आधा इनाम एक बार महेश दास राजा अकबर से मिलने गया । महल के द्वार के पहरेदारों ने उससे पूछा, “तुम्हें राजा से क्या काम है?” “महाराज ने मुझे बुलाया है, " महेश ने कहा । " ठीक है, तुम जा सकते हो पर तुम्हें अपने इनाम का आधा भाग मुझे देना पड़ेगा,” पहरेदार ने कहा । महेश सहमत हो गया। कुछ माह पूर्व अकबर जंगल में रास्ता भटक गया था तब महेश ने ही उन्हें बाहर निकलने का रास्ता दिखाया था। अकबर ने तुरंत महेश को पहचान लिया और उससे पूछा, "इनाम में तुम क्या चाहते हो?" महेश ने कहा " पचास कोड़े । " कारण पूछने पर महेश ने कहा कि इनाम मिलने के बाद वह बताएगा । पच्चीस कोड़े खाने के बाद महेश ने सिपाहियों को रोका और द्वार पर खड़े पहरेदार को बुलवाया। इनाम पाने की लालसा से पहरेदार बहुत प्रसन्न हो रहा था। महेश ने कहा, " इस पहरेदार ने मुझे आधा इनाम देने के लिए कहा था, अतः अब शेष पच्चीस कोड़े इसे लगाए जाएँ।" इस प्रकार पहरेदार को पच्चीस कोड़े खाने पड़े। अकबर ने महेश को अपना मंत्री नियुक्त कर लिया और वह बीरबल कहलाया ।
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  • " बराबरी की सोच भी मत रखना ऐ दोस्त,
    हम वो किरदार हैं जो वक़्त भी तराशे,
    जो दिखा है अभी वो बस एक झलक भर है,
    असली कहानी तो अभी इतिहास में लिखी जानी है। "

    =============== END ===============

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    " बराबरी की सोच भी मत रखना ऐ दोस्त, हम वो किरदार हैं जो वक़्त भी तराशे, जो दिखा है अभी वो बस एक झलक भर है, असली कहानी तो अभी इतिहास में लिखी जानी है। " =============== END =============== #ShayariLovers, #HindiShayari, #AttitudeShayari, #RoyalShayari, #UniqueShayari, #PremiumShayari, #UrduShayari, #PoetryCommunity, #PoetryGram, #InstaShayari, #ShayariStatus, #WordsOfPower, #BoldWords, #AlphaMindset, #SuccessQuotes, #MotivationDaily, #PowerfulLines, #EliteMindset, #LuxuryLifeMindset, #HighValueContent
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  • आत्मा

    ईश्वर ने पंचभूत देवों (पृथ्वी, जल, अग्नि, गगन और वायु) की रचना की।

    देवताओं ने उनसे अनुरोध किया, “हम चाहते हैं कि कोई हमें अन्न और जल उपलब्ध करवाए,

    हमारा पोषण करे..." यह सुनकर ईश्वर ने पंचभूतों से मानव की रचना की

    और देवताओं को उसमें प्रवेश करने के लिए कहा।

    सर्वप्रथम उन्होंने अग्नि से प्रवेश करने के लिए कहा।

    अग्नि देव मनुष्य के मुख में वाणी बने, वायु देव नासिका से प्रवेश कर जीवनदायिनी श्वास बने, सूर्यदेव ने चक्षु बन दृष्टि प्रदान की।

    चारों दिशाओं ने कान से प्रवेश किया और श्रवण शक्ति दी।

    पृथ्वी की दिव्य जड़ी-बूटियाँ शरीर के चर्म भाग पर रोम के रूप में समा गईं।

    अंत में 'मन' मनुष्य मस्तिष्क में विचार रूप में स्थापित हुआ।

    इस प्रकार ईश्वर ने सभी देवों को मनुष्य के भीतर ज्ञानेन्द्रिय रूप में स्थापित कर दिया।

    अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने मनुष्य के सिर के ऊपरी भाग में एक ‘ब्रह्मरंध्र' बनाया।

    वहीं से आत्मा मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है।

    आत्मा अविनाशी है, इस पर किसी भी प्राकृतिक भाव का असर नहीं होता।

    इसका एक ही स्वाभाविक गुण है- स्वाभाविक रूप से प्रसार करना और ईश्वर में विलीन होना।

    जब तक आत्मा ईश्वर के अपने मुख्य बिन्दु तक नहीं पहुँचती, तब तक शरीर बदलता रहता है।
    आत्मा ईश्वर ने पंचभूत देवों (पृथ्वी, जल, अग्नि, गगन और वायु) की रचना की। देवताओं ने उनसे अनुरोध किया, “हम चाहते हैं कि कोई हमें अन्न और जल उपलब्ध करवाए, हमारा पोषण करे..." यह सुनकर ईश्वर ने पंचभूतों से मानव की रचना की और देवताओं को उसमें प्रवेश करने के लिए कहा। सर्वप्रथम उन्होंने अग्नि से प्रवेश करने के लिए कहा। अग्नि देव मनुष्य के मुख में वाणी बने, वायु देव नासिका से प्रवेश कर जीवनदायिनी श्वास बने, सूर्यदेव ने चक्षु बन दृष्टि प्रदान की। चारों दिशाओं ने कान से प्रवेश किया और श्रवण शक्ति दी। पृथ्वी की दिव्य जड़ी-बूटियाँ शरीर के चर्म भाग पर रोम के रूप में समा गईं। अंत में 'मन' मनुष्य मस्तिष्क में विचार रूप में स्थापित हुआ। इस प्रकार ईश्वर ने सभी देवों को मनुष्य के भीतर ज्ञानेन्द्रिय रूप में स्थापित कर दिया। अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने मनुष्य के सिर के ऊपरी भाग में एक ‘ब्रह्मरंध्र' बनाया। वहीं से आत्मा मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। आत्मा अविनाशी है, इस पर किसी भी प्राकृतिक भाव का असर नहीं होता। इसका एक ही स्वाभाविक गुण है- स्वाभाविक रूप से प्रसार करना और ईश्वर में विलीन होना। जब तक आत्मा ईश्वर के अपने मुख्य बिन्दु तक नहीं पहुँचती, तब तक शरीर बदलता रहता है।
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  • त्रिदेव

    एक बार ब्रह्मा और विष्णु में कौन अधिक श्रेष्ठ है?

    इस बात को लेकर विवाद हो गया।

    अचानक उनके समक्ष एक प्रकाश स्तम्भ प्रकट हुआ।

    दोनों में सहमति बनी कि जो भी उसके छोर को ढूँढेगा वही श्रेष्ठ होगा।

    ब्रह्मा स्तम्भ का छोर ढूँढने के लिए आकाश की ओर गए जबकि विष्णु भूतल की ओर छोर ढूँढने गए।

    किन्तु दोनों ही छोर न ढूँढ सके।

    इसी बीच आकाश से गिरते हुए केतकी के फूल को पकड़कर ब्रह्मा विष्णु से मिलने गए।

    विष्णु ने छोर को ढूँढ पाने में अपनी असमर्थता बताई।

    तब ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को दिखाते हुए असत्य कहा कि यह उन्हें स्तम्भ के ऊपर मिला था।

    ब्रह्मा के असत्य से शिव रुष्ट हो गए।

    वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक दूसरे के पूरक हैं।

    जिस प्रकार अ, उ, म एक साथ मिलकर ‘ओऽम्’ बनता है उसी प्रकार ब्रह्मा सृष्टिकर्ता,

    विष्णु-पालनकर्ता और महेश-संहारक हैं जो एक साथ त्रिदेव कहलाते हैं।
    त्रिदेव एक बार ब्रह्मा और विष्णु में कौन अधिक श्रेष्ठ है? इस बात को लेकर विवाद हो गया। अचानक उनके समक्ष एक प्रकाश स्तम्भ प्रकट हुआ। दोनों में सहमति बनी कि जो भी उसके छोर को ढूँढेगा वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्मा स्तम्भ का छोर ढूँढने के लिए आकाश की ओर गए जबकि विष्णु भूतल की ओर छोर ढूँढने गए। किन्तु दोनों ही छोर न ढूँढ सके। इसी बीच आकाश से गिरते हुए केतकी के फूल को पकड़कर ब्रह्मा विष्णु से मिलने गए। विष्णु ने छोर को ढूँढ पाने में अपनी असमर्थता बताई। तब ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को दिखाते हुए असत्य कहा कि यह उन्हें स्तम्भ के ऊपर मिला था। ब्रह्मा के असत्य से शिव रुष्ट हो गए। वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार अ, उ, म एक साथ मिलकर ‘ओऽम्’ बनता है उसी प्रकार ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु-पालनकर्ता और महेश-संहारक हैं जो एक साथ त्रिदेव कहलाते हैं।
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  • जन्म का रिश्ता हैं माता-पिता से

    एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं

    वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है

    साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो

    बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है

    रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी

    वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है

    दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है , माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है , तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं

    दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे

    माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की

    शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है

    हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है , अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे

    साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी

    कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी

    माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती , माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे
    जन्म का रिश्ता हैं माता-पिता से एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं वो कहती है आपकी माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है साथ ही सुबह 4 बजे उठकर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती है सुबह 5 बजे पूजा आरती करके हमे सोने नही देती ना रात को ना ही सुबह जाओ सोच क्या रहे हो जाकर माँ को मना करो बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है रास्ते मे छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बाते सुनाई पड़ती जो उसके कमरे हो रही थी वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है छोटा भाई बाहर आता है दोनो भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते है , माँ मना करती पर वो नही मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते है , तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे माँ बोली ठीक है बच्चों, दोनो बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ, तो बेटे बोले हम लोगो की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी पर तुम लोग ये कार्य नही कर रही हो कोई बात नही हम अपनी माँ की सहायता कर देते है हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है , अगले तीन दिनों में घर मे पूरा बदलाव आ गया बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगी की नही तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे साथ ही सुबह भी वो भी पतियों के साथ ही उठने लगी और पूजा आरती में शामिल होने लगी कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगी माँ का सम्मान तब कम नही होता जब बहुवे उनका सम्मान नही करती , माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नही करे या माँ के कार्य मे सहयोग ना करे
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  • परफेक्ट जोड़ी सिर्फ जूतों की होती है
    बाकी सब वहम है
    परफेक्ट जोड़ी सिर्फ जूतों की होती है बाकी सब वहम है
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  • क्यों माता शक्ति (माँ भगवती) का नाम दुर्गा पड़ा?

    पुरातन काल में दुर्गम नाम का एक अत्यंत बलशाली दैत्य हुआ करता था। उसने ब्राहमाजी को प्रसन्न कर के समस्त वेदों को अपनें आधीन कर लिया, जिस कारण सारे देव गण का बल क्षीण हो गया। इस घटना के उपरांत दुर्गम नें स्वर्ग पर आक्रमण कर के उसे जीत लिया।और तब समस्त देव गण एकत्रित हुए और उन्होने देवी माँ भगवती का आह्वान किया और फिर देव गण नें उन्हे अपनी व्यथा सुनाई। तब माँ भगवती नें समस्त देव गण को दैत्य दुर्गम के प्रकोप से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया।

    माँ भगवती नें दुर्गम का अंत करने का प्रण लिया है, यह बात जब दुर्गम को पता चली तब उसने सवर्ग लोग पर पुनः आक्रमण कर दिया। और तब माँ भगवती नें दैत्य दुर्गम की सेना का संहार किया और अंत में दुर्गम को भी मृत्यु लोक पहुंचा दिया। माँ भगवती नें दुर्गम के साथ जब अंतिम युद्ध किया तब उन्होने भुवनेश्वरी, काली, तारा, छीन्नमस्ता, भैरवी, बगला तथा दूसरी अन्य महा शक्तियों का आह्वान कर के उनकी सहायता से दुर्गम को पराजित किया था।

    इस भीषण युद्ध में विकट दैत्य दुर्गम को पराजित करके उसका वध करने पर माँ भगवती दुर्गा नाम से प्रख्यात हुईं।
    क्यों माता शक्ति (माँ भगवती) का नाम दुर्गा पड़ा? पुरातन काल में दुर्गम नाम का एक अत्यंत बलशाली दैत्य हुआ करता था। उसने ब्राहमाजी को प्रसन्न कर के समस्त वेदों को अपनें आधीन कर लिया, जिस कारण सारे देव गण का बल क्षीण हो गया। इस घटना के उपरांत दुर्गम नें स्वर्ग पर आक्रमण कर के उसे जीत लिया।और तब समस्त देव गण एकत्रित हुए और उन्होने देवी माँ भगवती का आह्वान किया और फिर देव गण नें उन्हे अपनी व्यथा सुनाई। तब माँ भगवती नें समस्त देव गण को दैत्य दुर्गम के प्रकोप से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया। माँ भगवती नें दुर्गम का अंत करने का प्रण लिया है, यह बात जब दुर्गम को पता चली तब उसने सवर्ग लोग पर पुनः आक्रमण कर दिया। और तब माँ भगवती नें दैत्य दुर्गम की सेना का संहार किया और अंत में दुर्गम को भी मृत्यु लोक पहुंचा दिया। माँ भगवती नें दुर्गम के साथ जब अंतिम युद्ध किया तब उन्होने भुवनेश्वरी, काली, तारा, छीन्नमस्ता, भैरवी, बगला तथा दूसरी अन्य महा शक्तियों का आह्वान कर के उनकी सहायता से दुर्गम को पराजित किया था। इस भीषण युद्ध में विकट दैत्य दुर्गम को पराजित करके उसका वध करने पर माँ भगवती दुर्गा नाम से प्रख्यात हुईं।
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