• एक न्यायाधीश अत्यंत सदा जीवन व्यतीत करते थे। वह अपनी पत्नी के साथ एक साधारण मकान में रहते और सीमित साधनों में गुजारा करते थे।

    अधिक की लालसा उनके मन में नहीं थी। जो अर्जित कर पाते थे, उसमें ही संतुष्ट रहते थे। एक बार उन्हें किसी सरकारी कार्य से सतारा जिले में पाना पड़ा। सतारा में उन्हें अनेक स्थानों पर जाना था। उनके साथ में उनकी पत्नी भी थी। उन्होंने पत्नी से कहा तुम सरकारी रेस्ट

    हॉउस में जाकर आराम करो में कार्य निपटाकर बाद में आ जाऊंगा। पत्नी ने

    घोड़ा-गाड़ी ली और गेस्टहाउस की ओर चल दी। घोड़ा-गाड़ी रवाना हुई, तो मार्ग में एक आम का बगीचा दिखाई दिया। रसीले आम देखकर न्यायाधीश की पत्नी के मन में लालच आ गया। उसने घोडा-गाड़ी रुकवाई और चुपके से आम बगीचे में दाखिल हो गई। पत्थर मारकर उसने दो-तीन आम गिराए। दुर्भाग्यवश एक बड़ा आम उनके हाथ पर ही आ गिरा, जिससे उनकी स्वर्णजड़ित चूड़ी टूट गई। टूटा स्वर्ण अंश भी नहीं मिला।

    उन्हें बहुत पश्चात्ताप हुआ। घर आकर उन्होंने पति को सारी बात बताई। पति ने कहा- पराई वस्तु लेने का यही परिणाम होता है। साथ में मुझे भी तुम्हारे अपराध की थोड़ी सजा मिल गई। मेरी घड़ी कहीं खो गई।


    न्यायाधीश की पत्नी ने भविष्य में ऐसा फिर नहीं करने का संकल्प लिया। सार यह है कि आप की कौड़ी पुण्य का सोना भी खींच लेती है।

    एक न्यायाधीश अत्यंत सदा जीवन व्यतीत करते थे। वह अपनी पत्नी के साथ एक साधारण मकान में रहते और सीमित साधनों में गुजारा करते थे। अधिक की लालसा उनके मन में नहीं थी। जो अर्जित कर पाते थे, उसमें ही संतुष्ट रहते थे। एक बार उन्हें किसी सरकारी कार्य से सतारा जिले में पाना पड़ा। सतारा में उन्हें अनेक स्थानों पर जाना था। उनके साथ में उनकी पत्नी भी थी। उन्होंने पत्नी से कहा तुम सरकारी रेस्ट हॉउस में जाकर आराम करो में कार्य निपटाकर बाद में आ जाऊंगा। पत्नी ने घोड़ा-गाड़ी ली और गेस्टहाउस की ओर चल दी। घोड़ा-गाड़ी रवाना हुई, तो मार्ग में एक आम का बगीचा दिखाई दिया। रसीले आम देखकर न्यायाधीश की पत्नी के मन में लालच आ गया। उसने घोडा-गाड़ी रुकवाई और चुपके से आम बगीचे में दाखिल हो गई। पत्थर मारकर उसने दो-तीन आम गिराए। दुर्भाग्यवश एक बड़ा आम उनके हाथ पर ही आ गिरा, जिससे उनकी स्वर्णजड़ित चूड़ी टूट गई। टूटा स्वर्ण अंश भी नहीं मिला। उन्हें बहुत पश्चात्ताप हुआ। घर आकर उन्होंने पति को सारी बात बताई। पति ने कहा- पराई वस्तु लेने का यही परिणाम होता है। साथ में मुझे भी तुम्हारे अपराध की थोड़ी सजा मिल गई। मेरी घड़ी कहीं खो गई। न्यायाधीश की पत्नी ने भविष्य में ऐसा फिर नहीं करने का संकल्प लिया। सार यह है कि आप की कौड़ी पुण्य का सोना भी खींच लेती है।
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  • एक 20-22 साल का नौजवान सुपर मार्केट में दाखिल हुआ ।कुछ ख़रीदारी कर ही रहा था कि उसे महसूस हुआ कि कोई औरत उसका पीछा कर रही है ।मगर उसने अपना शक समझते हुए नज़रअंदाज़ किया और ख़रीदारी में मसरूफ हो गया ।लेकिन वह औरत लगातार उसका पीछा कर रही थी, अबकी बार उस नौजवान से रहा न गया ।वह अचानक उस औरत की तरफ मुड़ा और पूछा,


    माँ जी खैरियत है ? औरत बोली बेटा आपकी शक्ल मेरे मरहूम बेटे से बहुत ज्यादा मिलती जुलती है ।मैं ना चाहते हुए भी आपको अपना बेटा समझते हुए आपके पीछे चल पड़ी,


    और आप ने मुझे माँ जी कहा तो मेरे दिल के जज़्बात और खुशी बयां करने लायक नही।


    औरत ने यह कहा और उसकी आँखों से आँसू बहने शुरू हो गये। नौजवान कहता है कोई बात नहीं माँ जी आप मुझे अपना बेटा ही समझें।वह औरत बोली कि बेटा क्या आप मुझे एक बार फिर माँ जी कहोगे


    नौजवान ने ऊँची आवाज़ से कहा, जी माँ जीपर उस औरत ने ऐसा बर्ताव किया जैसे उसने सुना ही ना हो,


    नौजवान ने फिर ऊंची आवाज़ में कहा जी माँ जी.... ।औरत ने सुना और नौजवान के दोनों हाथ पकड़ कर चूमे ,


    अपने आंखों से लगाऐ और रोते हुए वहां से रुखसत हो गई।नौजवान उस मंज़र को देख कर अपने आप पर काबू नहीं कर सका और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे,वह अपनी खरीदारी पूरी करे बगैर ही वापस चल दिया।काउंटर पर पहुँचा तो कैशियर ने दस हज़ार का बिल थमा दिया....


    नौजवान ने पूछा दस हज़ार कैसे ? कैशियर ने कहा आठ सौ का बिल आपका है ।और नौ हजार दो सौ का आपकी माँ के हैं,


    जिन्हें आप अभी माँ जी माँ जी कह रहे थे।वह दिन और आज का दिन,


    नौजवान अपनी असली मां को भी मौसी कहता है।

    एक 20-22 साल का नौजवान सुपर मार्केट में दाखिल हुआ ।कुछ ख़रीदारी कर ही रहा था कि उसे महसूस हुआ कि कोई औरत उसका पीछा कर रही है ।मगर उसने अपना शक समझते हुए नज़रअंदाज़ किया और ख़रीदारी में मसरूफ हो गया ।लेकिन वह औरत लगातार उसका पीछा कर रही थी, अबकी बार उस नौजवान से रहा न गया ।वह अचानक उस औरत की तरफ मुड़ा और पूछा, माँ जी खैरियत है ? औरत बोली बेटा आपकी शक्ल मेरे मरहूम बेटे से बहुत ज्यादा मिलती जुलती है ।मैं ना चाहते हुए भी आपको अपना बेटा समझते हुए आपके पीछे चल पड़ी, और आप ने मुझे माँ जी कहा तो मेरे दिल के जज़्बात और खुशी बयां करने लायक नही।औरत ने यह कहा और उसकी आँखों से आँसू बहने शुरू हो गये। नौजवान कहता है कोई बात नहीं माँ जी आप मुझे अपना बेटा ही समझें।वह औरत बोली कि बेटा क्या आप मुझे एक बार फिर माँ जी कहोगेनौजवान ने ऊँची आवाज़ से कहा, जी माँ जीपर उस औरत ने ऐसा बर्ताव किया जैसे उसने सुना ही ना हो,नौजवान ने फिर ऊंची आवाज़ में कहा जी माँ जी.... ।औरत ने सुना और नौजवान के दोनों हाथ पकड़ कर चूमे ,अपने आंखों से लगाऐ और रोते हुए वहां से रुखसत हो गई।नौजवान उस मंज़र को देख कर अपने आप पर काबू नहीं कर सका और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे,वह अपनी खरीदारी पूरी करे बगैर ही वापस चल दिया।काउंटर पर पहुँचा तो कैशियर ने दस हज़ार का बिल थमा दिया....नौजवान ने पूछा दस हज़ार कैसे ? कैशियर ने कहा आठ सौ का बिल आपका है ।और नौ हजार दो सौ का आपकी माँ के हैं,जिन्हें आप अभी माँ जी माँ जी कह रहे थे।वह दिन और आज का दिन,नौजवान अपनी असली मां को भी मौसी कहता है।
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  • एक सिपाही बहुत बलवान था, बहुत बहादुर था और बहुत लड़ने वाला था। उसका घोडा भी वैसा ही बलवान, बहादुर और लड़ने का हौसला रखने वाला था। एक दिन सिपाही अपने लड़ने घोड़े पर बैठकर किसी पहाड़ी रास्ते से जा रहा था। अचानक घोड़े का पैर पत्थर से टकराया और उसकी नाल निकल गई। नाल निकल जाने से घोडा को बहुत कष्ट हुआ और वह लंगड़ाकर चलने लगा। सिपाही ने घोड़े का कष्ट तो समझ ही लिया परन्तु उसकी विशेष चिंता नहीं की। बस वह उसी सोच में डूबा रहा। नाल बंधवा देगा। इस प्रकार आज-काल के चक्कर में दिन निकलते गए और घोड़े का कष्ट दूर न हुआ। अचानक देश पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया। राजा की ओर से सिपाही को आज्ञा मिली। बस! चल फ़ौरन पर। अब सिपाही क्या करता। इतना समय ही कहाँ था की जो घोड़े के पैर में नाल बंधवा पाता। परन्तु लड़ाई पर तो जाना ही था इसलिए वह उसी लंगड़ाते हुए घोड़े पर बैठा और दूसरे सिपाहियों के साथ चल पड़ा। दुर्भाग्यवश घोड़े के दूसरे पैर से भी नाल निकल गई। पहले वह तीन पैर से कुछ चल भी लेता था। परन्तु अब तो पैर क्या करता। किस तरह आगे बढ़ता। देखते-देखते शत्रु सामने आ पहुंचे। वे संख्या में इतने अधिक थे कि उनके सामने सिपाही के साथ ठहर भी न सके। वे फ़ौरन अपने-अपने घोड़े दौड़ाकर लड़ाई के मैदान से भाग निकले। परन्तु वह सिपाही कैसे भागता। उनका लंगड़ा घोडा जहाँ का तहाँ खड़ा रह गया। सिपाही ने दुःख से हाथ मलते हुए कहा यदि मैं आज-कल के चक्कर में न पड़ा

    रहता और उसी दिन अपने घोड़े के पैरों में नई नाल बंधवा देता तो आज इस

    विपात्त में क्यों फंसता।

    एक सिपाही बहुत बलवान था, बहुत बहादुर था और बहुत लड़ने वाला था। उसका घोडा भी वैसा ही बलवान, बहादुर और लड़ने का हौसला रखने वाला था। एक दिन सिपाही अपने लड़ने घोड़े पर बैठकर किसी पहाड़ी रास्ते से जा रहा था। अचानक घोड़े का पैर पत्थर से टकराया और उसकी नाल निकल गई। नाल निकल जाने से घोडा को बहुत कष्ट हुआ और वह लंगड़ाकर चलने लगा। सिपाही ने घोड़े का कष्ट तो समझ ही लिया परन्तु उसकी विशेष चिंता नहीं की। बस वह उसी सोच में डूबा रहा। नाल बंधवा देगा। इस प्रकार आज-काल के चक्कर में दिन निकलते गए और घोड़े का कष्ट दूर न हुआ। अचानक देश पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया। राजा की ओर से सिपाही को आज्ञा मिली। बस! चल फ़ौरन पर। अब सिपाही क्या करता। इतना समय ही कहाँ था की जो घोड़े के पैर में नाल बंधवा पाता। परन्तु लड़ाई पर तो जाना ही था इसलिए वह उसी लंगड़ाते हुए घोड़े पर बैठा और दूसरे सिपाहियों के साथ चल पड़ा। दुर्भाग्यवश घोड़े के दूसरे पैर से भी नाल निकल गई। पहले वह तीन पैर से कुछ चल भी लेता था। परन्तु अब तो पैर क्या करता। किस तरह आगे बढ़ता। देखते-देखते शत्रु सामने आ पहुंचे। वे संख्या में इतने अधिक थे कि उनके सामने सिपाही के साथ ठहर भी न सके। वे फ़ौरन अपने-अपने घोड़े दौड़ाकर लड़ाई के मैदान से भाग निकले। परन्तु वह सिपाही कैसे भागता। उनका लंगड़ा घोडा जहाँ का तहाँ खड़ा रह गया। सिपाही ने दुःख से हाथ मलते हुए कहा यदि मैं आज-कल के चक्कर में न पड़ा रहता और उसी दिन अपने घोड़े के पैरों में नई नाल बंधवा देता तो आज इस विपात्त में क्यों फंसता।
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  • एक सिपाही बहुत बलवान था, बहुत बहादुर था और बहुत लड़ने वाला था। उसका घोडा भी वैसा ही बलवान, बहादुर और लड़ने का हौसला रखने वाला था। एक दिन सिपाही अपने लड़ने घोड़े पर बैठकर किसी पहाड़ी रास्ते से जा रहा था। अचानक घोड़े का पैर पत्थर से टकराया और उसकी नाल निकल गई। नाल निकल जाने से घोडा को बहुत कष्ट हुआ और वह लंगड़ाकर चलने लगा। सिपाही ने घोड़े का कष्ट तो समझ ही लिया परन्तु उसकी विशेष चिंता नहीं की। बस वह उसी सोच में डूबा रहा। नाल बंधवा देगा। इस प्रकार आज-काल के चक्कर में दिन निकलते गए और घोड़े का कष्ट दूर न हुआ। अचानक देश पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया। राजा की ओर से सिपाही को आज्ञा मिली। बस! चल फ़ौरन पर। अब सिपाही क्या करता। इतना समय ही कहाँ था की जो घोड़े के पैर में नाल बंधवा पाता। परन्तु लड़ाई पर तो जाना ही था इसलिए वह उसी लंगड़ाते हुए घोड़े पर बैठा और दूसरे सिपाहियों के साथ चल पड़ा। दुर्भाग्यवश घोड़े के दूसरे पैर से भी नाल निकल गई। पहले वह तीन पैर से कुछ चल भी लेता था। परन्तु अब तो पैर क्या करता। किस तरह आगे बढ़ता। देखते-देखते शत्रु सामने आ पहुंचे। वे संख्या में इतने अधिक थे कि उनके सामने सिपाही के साथ ठहर भी न सके। वे फ़ौरन अपने-अपने घोड़े दौड़ाकर लड़ाई के मैदान से भाग निकले। परन्तु वह सिपाही कैसे भागता। उनका लंगड़ा घोडा जहाँ का तहाँ खड़ा रह गया। सिपाही ने दुःख से हाथ मलते हुए कहा यदि मैं आज-कल के चक्कर में न पड़ा

    रहता और उसी दिन अपने घोड़े के पैरों में नई नाल बंधवा देता तो आज इस

    विपात्त में क्यों फंसता।

    एक सिपाही बहुत बलवान था, बहुत बहादुर था और बहुत लड़ने वाला था। उसका घोडा भी वैसा ही बलवान, बहादुर और लड़ने का हौसला रखने वाला था। एक दिन सिपाही अपने लड़ने घोड़े पर बैठकर किसी पहाड़ी रास्ते से जा रहा था। अचानक घोड़े का पैर पत्थर से टकराया और उसकी नाल निकल गई। नाल निकल जाने से घोडा को बहुत कष्ट हुआ और वह लंगड़ाकर चलने लगा। सिपाही ने घोड़े का कष्ट तो समझ ही लिया परन्तु उसकी विशेष चिंता नहीं की। बस वह उसी सोच में डूबा रहा। नाल बंधवा देगा। इस प्रकार आज-काल के चक्कर में दिन निकलते गए और घोड़े का कष्ट दूर न हुआ। अचानक देश पर शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया। राजा की ओर से सिपाही को आज्ञा मिली। बस! चल फ़ौरन पर। अब सिपाही क्या करता। इतना समय ही कहाँ था की जो घोड़े के पैर में नाल बंधवा पाता। परन्तु लड़ाई पर तो जाना ही था इसलिए वह उसी लंगड़ाते हुए घोड़े पर बैठा और दूसरे सिपाहियों के साथ चल पड़ा। दुर्भाग्यवश घोड़े के दूसरे पैर से भी नाल निकल गई। पहले वह तीन पैर से कुछ चल भी लेता था। परन्तु अब तो पैर क्या करता। किस तरह आगे बढ़ता। देखते-देखते शत्रु सामने आ पहुंचे। वे संख्या में इतने अधिक थे कि उनके सामने सिपाही के साथ ठहर भी न सके। वे फ़ौरन अपने-अपने घोड़े दौड़ाकर लड़ाई के मैदान से भाग निकले। परन्तु वह सिपाही कैसे भागता। उनका लंगड़ा घोडा जहाँ का तहाँ खड़ा रह गया। सिपाही ने दुःख से हाथ मलते हुए कहा यदि मैं आज-कल के चक्कर में न पड़ा रहता और उसी दिन अपने घोड़े के पैरों में नई नाल बंधवा देता तो आज इस विपात्त में क्यों फंसता।
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  • एक 20-22 साल का नौजवान सुपर मार्केट में दाखिल हुआ ।कुछ ख़रीदारी कर ही रहा था कि उसे महसूस हुआ कि कोई औरत उसका पीछा कर रही है ।मगर उसने अपना शक समझते हुए नज़रअंदाज़ किया और ख़रीदारी में मसरूफ हो गया ।लेकिन वह औरत लगातार उसका पीछा कर रही थी, अबकी बार उस नौजवान से रहा न गया ।वह अचानक उस औरत की तरफ मुड़ा और पूछा,


    माँ जी खैरियत है ? औरत बोली बेटा आपकी शक्ल मेरे मरहूम बेटे से बहुत ज्यादा मिलती जुलती है ।मैं ना चाहते हुए भी आपको अपना बेटा समझते हुए आपके पीछे चल पड़ी,


    और आप ने मुझे माँ जी कहा तो मेरे दिल के जज़्बात और खुशी बयां करने लायक नही।


    औरत ने यह कहा और उसकी आँखों से आँसू बहने शुरू हो गये। नौजवान कहता है कोई बात नहीं माँ जी आप मुझे अपना बेटा ही समझें।वह औरत बोली कि बेटा क्या आप मुझे एक बार फिर माँ जी कहोगे


    नौजवान ने ऊँची आवाज़ से कहा, जी माँ जीपर उस औरत ने ऐसा बर्ताव किया जैसे उसने सुना ही ना हो,


    नौजवान ने फिर ऊंची आवाज़ में कहा जी माँ जी.... ।औरत ने सुना और नौजवान के दोनों हाथ पकड़ कर चूमे ,


    अपने आंखों से लगाऐ और रोते हुए वहां से रुखसत हो गई।नौजवान उस मंज़र को देख कर अपने आप पर काबू नहीं कर सका और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे,वह अपनी खरीदारी पूरी करे बगैर ही वापस चल दिया।काउंटर पर पहुँचा तो कैशियर ने दस हज़ार का बिल थमा दिया....


    नौजवान ने पूछा दस हज़ार कैसे ? कैशियर ने कहा आठ सौ का बिल आपका है ।और नौ हजार दो सौ का आपकी माँ के हैं,


    जिन्हें आप अभी माँ जी माँ जी कह रहे थे।वह दिन और आज का दिन,


    नौजवान अपनी असली मां को भी मौसी कहता है।

    एक 20-22 साल का नौजवान सुपर मार्केट में दाखिल हुआ ।कुछ ख़रीदारी कर ही रहा था कि उसे महसूस हुआ कि कोई औरत उसका पीछा कर रही है ।मगर उसने अपना शक समझते हुए नज़रअंदाज़ किया और ख़रीदारी में मसरूफ हो गया ।लेकिन वह औरत लगातार उसका पीछा कर रही थी, अबकी बार उस नौजवान से रहा न गया ।वह अचानक उस औरत की तरफ मुड़ा और पूछा, माँ जी खैरियत है ? औरत बोली बेटा आपकी शक्ल मेरे मरहूम बेटे से बहुत ज्यादा मिलती जुलती है ।मैं ना चाहते हुए भी आपको अपना बेटा समझते हुए आपके पीछे चल पड़ी, और आप ने मुझे माँ जी कहा तो मेरे दिल के जज़्बात और खुशी बयां करने लायक नही।औरत ने यह कहा और उसकी आँखों से आँसू बहने शुरू हो गये। नौजवान कहता है कोई बात नहीं माँ जी आप मुझे अपना बेटा ही समझें।वह औरत बोली कि बेटा क्या आप मुझे एक बार फिर माँ जी कहोगेनौजवान ने ऊँची आवाज़ से कहा, जी माँ जीपर उस औरत ने ऐसा बर्ताव किया जैसे उसने सुना ही ना हो,नौजवान ने फिर ऊंची आवाज़ में कहा जी माँ जी.... ।औरत ने सुना और नौजवान के दोनों हाथ पकड़ कर चूमे ,अपने आंखों से लगाऐ और रोते हुए वहां से रुखसत हो गई।नौजवान उस मंज़र को देख कर अपने आप पर काबू नहीं कर सका और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे,वह अपनी खरीदारी पूरी करे बगैर ही वापस चल दिया।काउंटर पर पहुँचा तो कैशियर ने दस हज़ार का बिल थमा दिया....नौजवान ने पूछा दस हज़ार कैसे ? कैशियर ने कहा आठ सौ का बिल आपका है ।और नौ हजार दो सौ का आपकी माँ के हैं,जिन्हें आप अभी माँ जी माँ जी कह रहे थे।वह दिन और आज का दिन,नौजवान अपनी असली मां को भी मौसी कहता है।
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  • एक बार बीरबल के दरबार में पहुँचते ही अकबर ने कहा, “बीरबल मैं तुमसे नाराज हूँ। तुम सबके प्रति न्याय करते हो फिर भी मोहनलाल (पास बैठे व्यक्ति की ओर

    इशारा करते हुए) से उधार ली हुई दस हज़ार स्वर्ण अशर्फ़ियाँ तुमने नहीं

    लौटाईं" बीरबल ने उत्तर दिया, “मैंने उनसे कोई पैसा उधार नहीं लिया।" मोहनलाल ने कहा, "महाराज, बीरबल ने छह माह पहले मुझसे उधार लिया था। जब मैंने पैसे वापस माँगे, तो उन्होंने देने से मना कर दिया। छह दरबारियों के सामने उधार के दस्तावेज़ भी फाड़ डाले।" गवाहों को सुनने के बाद बीरबल ने कहा, “ छह दरबारियों की नज़रों के सामने क्या मैंमूर्ख हूँ, जो दस्तावेज़ फाड़ दूँ?" अकबर समझ गए कि बीरबलनिर्दोष है। उन्होंने मोहनलाल से सच्ची बात बताने को कहा। मोहनलाल ने कहा, “क्षमा करें महाराज, बीरबल के विरुद्ध झूठी शिकायत करने के लिए छह दरबारियों ने मुझे धन देने का प्रलोभन दिया था।" अकबर ने मोहनलाल को चेतावनी देकर छोड़ दिया पर उन छह दरबारियों को कैद में डलवा दिया तथा नुकसान की भरपाई के रूप में दो हज़ार अशर्फ़ियाँ बीरबल को देने के लिए कहा। बीरबल ने कहा, “सत्य की सदा जीत होती है।”

    एक बार बीरबल के दरबार में पहुँचते ही अकबर ने कहा, “बीरबल मैं तुमसे नाराज हूँ। तुम सबके प्रति न्याय करते हो फिर भी मोहनलाल (पास बैठे व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए) से उधार ली हुई दस हज़ार स्वर्ण अशर्फ़ियाँ तुमने नहीं लौटाईं" बीरबल ने उत्तर दिया, “मैंने उनसे कोई पैसा उधार नहीं लिया।" मोहनलाल ने कहा, "महाराज, बीरबल ने छह माह पहले मुझसे उधार लिया था। जब मैंने पैसे वापस माँगे, तो उन्होंने देने से मना कर दिया। छह दरबारियों के सामने उधार के दस्तावेज़ भी फाड़ डाले।" गवाहों को सुनने के बाद बीरबल ने कहा, “ छह दरबारियों की नज़रों के सामने क्या मैंमूर्ख हूँ, जो दस्तावेज़ फाड़ दूँ?" अकबर समझ गए कि बीरबलनिर्दोष है। उन्होंने मोहनलाल से सच्ची बात बताने को कहा। मोहनलाल ने कहा, “क्षमा करें महाराज, बीरबल के विरुद्ध झूठी शिकायत करने के लिए छह दरबारियों ने मुझे धन देने का प्रलोभन दिया था।" अकबर ने मोहनलाल को चेतावनी देकर छोड़ दिया पर उन छह दरबारियों को कैद में डलवा दिया तथा नुकसान की भरपाई के रूप में दो हज़ार अशर्फ़ियाँ बीरबल को देने के लिए कहा। बीरबल ने कहा, “सत्य की सदा जीत होती है।”
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  • तारों का जन्म

    'ओंगी' जनजाति के लोगों का मानना है कि सृष्टि के आरंभ में, जब धरती बनी ही थी आसमान बहुत नीचे था ।

    फिर एक दिन, सूर्य और चन्द्रमा की रचना हुई। लेकिन छलपूर्वक उन्होंने अपना- अपना स्थान बदल लिया । वे धरती के और निकट आ गए ।

    उनके इस कृत्य से धरती बुरी तरह गर्म हो गई । इसकी सतह पर गहरी दरारें पड़ गईं । लोगों ने घर से निकलना बन्द कर दिया । उन्हें डर था कि तेज धूप के कारण उनका शरीर झुलस जाएगा ।

    झरने और नदियाँ सब सूख गए। पानी का कहीं नामोनिशान न रहा । पशु-पक्षी यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ मारे-मारे फिरने लगे ।

    एक दिन बुजुर्गों ने विचार-विमर्श के लिए एक बैठक बुलाई । उसमें युवकों को भी बुलाया गया। तय पाया गया कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो कुछ ही दिनों में धरती पर जीवन नष्ट हो जाएगा । अन्त में, सभी की सहमति से ता-चोई (एक विशेष प्रकार की लकड़ी) तथा चा-लोक (नारियल की डंडी) से तीर-कमान तैयार करने का निर्णय लिया गया।

    निश्चय किया गया कि आसमान पर लगातार तब तक तीर मारते रहा जाए. जब तक कि उसे धरती से काफी दूर न धकेल दिया जाए। सूर्य और चन्द्रमा तब अपने- अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे और इस तरह धरती असह्य गर्मी से बच जाएगी ।

    तब, एक दिन उन्होंने आकाश को तीर मारना शुरू किया ।

    लेकिन उनके सारे तीर आकाश में अटक गए। उनमें से एक भी तीर वापस धरती पर नहीं गिरा । होता यह कि जैसे ही तीर आसमान से टकराता आग निकलती और तारा बन जाती ।

    आसमान में इस तरह अनगिनत तारे बन गए ।

    लेकिन ओंगी हताश नहीं हुए। आसमान के साथ-साथ उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा को भी पीछे धकेलने के लिए उन पर तीर मारना जारी रखा ।

    कुछ समय बाद सूर्य और चन्द्रमा वापस अपने-अपने स्थान पर चले गए। उसके बाद धरती की सतह भी ठंडी हो गई। वर्षा होने लगी । झरने और नदियाँ भरे-पूरे बहने लगे । वृक्ष ठग आए। पशु-पक्षियों में जीवन का संचार हो गया ।

    और इस तरह पूरे आकाश में टिमटिमाने वाले तारों का जन्म हुआ ।
    तारों का जन्म 'ओंगी' जनजाति के लोगों का मानना है कि सृष्टि के आरंभ में, जब धरती बनी ही थी आसमान बहुत नीचे था । फिर एक दिन, सूर्य और चन्द्रमा की रचना हुई। लेकिन छलपूर्वक उन्होंने अपना- अपना स्थान बदल लिया । वे धरती के और निकट आ गए । उनके इस कृत्य से धरती बुरी तरह गर्म हो गई । इसकी सतह पर गहरी दरारें पड़ गईं । लोगों ने घर से निकलना बन्द कर दिया । उन्हें डर था कि तेज धूप के कारण उनका शरीर झुलस जाएगा । झरने और नदियाँ सब सूख गए। पानी का कहीं नामोनिशान न रहा । पशु-पक्षी यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ मारे-मारे फिरने लगे । एक दिन बुजुर्गों ने विचार-विमर्श के लिए एक बैठक बुलाई । उसमें युवकों को भी बुलाया गया। तय पाया गया कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो कुछ ही दिनों में धरती पर जीवन नष्ट हो जाएगा । अन्त में, सभी की सहमति से ता-चोई (एक विशेष प्रकार की लकड़ी) तथा चा-लोक (नारियल की डंडी) से तीर-कमान तैयार करने का निर्णय लिया गया। निश्चय किया गया कि आसमान पर लगातार तब तक तीर मारते रहा जाए. जब तक कि उसे धरती से काफी दूर न धकेल दिया जाए। सूर्य और चन्द्रमा तब अपने- अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे और इस तरह धरती असह्य गर्मी से बच जाएगी । तब, एक दिन उन्होंने आकाश को तीर मारना शुरू किया । लेकिन उनके सारे तीर आकाश में अटक गए। उनमें से एक भी तीर वापस धरती पर नहीं गिरा । होता यह कि जैसे ही तीर आसमान से टकराता आग निकलती और तारा बन जाती । आसमान में इस तरह अनगिनत तारे बन गए । लेकिन ओंगी हताश नहीं हुए। आसमान के साथ-साथ उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा को भी पीछे धकेलने के लिए उन पर तीर मारना जारी रखा । कुछ समय बाद सूर्य और चन्द्रमा वापस अपने-अपने स्थान पर चले गए। उसके बाद धरती की सतह भी ठंडी हो गई। वर्षा होने लगी । झरने और नदियाँ भरे-पूरे बहने लगे । वृक्ष ठग आए। पशु-पक्षियों में जीवन का संचार हो गया । और इस तरह पूरे आकाश में टिमटिमाने वाले तारों का जन्म हुआ ।
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  • जब पेड़ चलते थे
    अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ

    बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे।

    उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था ।

    आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे ।

    आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था ।

    पेड़ उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता ।

    पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है ।

    उन दिनों 'इलपमन' नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी । पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खूब आनन्द करते थे । वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे ।

    लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर बुराइयाँ पनप उठीं ।

    एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे।

    पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगते ।

    पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्‍न हो उठे | वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है।

    उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया ।

    अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना कौ। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे ।

    इस तरह आदमी के भददे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया
    जब पेड़ चलते थे अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे। उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था । आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे । आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था । पेड़ उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता । पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है । उन दिनों 'इलपमन' नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी । पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खूब आनन्द करते थे । वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे । लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर बुराइयाँ पनप उठीं । एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे। पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगते । पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्‍न हो उठे | वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है। उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया । अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना कौ। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे । इस तरह आदमी के भददे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया
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  • जो होता है अच्छा होता है

    एक दिन शिकार करते समय अकबर की अँगुली कट गई।

    बीरबल ने यह देखा तो कहा, “जो होता है अच्छा होता है।”

    बीरबल की बात सुनकर अकबर नाराज हो उठा और उसे अपनी नज़रों से दूर कर राज्य से

    निकाल दिया। जाते-जाते बीरबल ने कहा, "यह भी अच्छा ही हुआ।" कई दिनों बाद

    अकबर पुनः शिकार करने गया।

    जंगल में कबीलियों ने उसे पकड़ लिया। वे

    अपने देवता को अकबर की बलि देने ले गए।

    वह बुरी तरह डर गया।

    कबीले वाले अकबर की बलि देने की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्होंने उसकी कटी हुई अँगुली देखी।

    उसने कहा, “ओह! हम इसकी बलि नहीं दे सकते।

    देखो, इसकी अँगुली कटी हुई है।

    दोषपूर्ण शरीर की बलि अपने भगवान को नहीं दी जा सकती है।"

    उन लोगों ने यह कहकर अकबर को छोड़ दिया।

    घर वापस आकर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उसे सारा किस्सा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए कहा, "तुम्हारा कथन सत्य हो गया।

    पर तुम्हें राज्य से निकालने की मेरी आज्ञा तुम्हारे लिए अच्छी कैसे हुई?"

    बीरबल ने कहा, "यदि आपने मुझे जाने के लिए नहीं कहा होता तो शायद मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता ।

    वहाँ आपकी जगह मुझे पकड़कर कबीले वाले मेरी बलि चढ़ा देते।

    आपकी आज्ञा ने तो मेरी जान बचा दी।"
    जो होता है अच्छा होता है एक दिन शिकार करते समय अकबर की अँगुली कट गई। बीरबल ने यह देखा तो कहा, “जो होता है अच्छा होता है।” बीरबल की बात सुनकर अकबर नाराज हो उठा और उसे अपनी नज़रों से दूर कर राज्य से निकाल दिया। जाते-जाते बीरबल ने कहा, "यह भी अच्छा ही हुआ।" कई दिनों बाद अकबर पुनः शिकार करने गया। जंगल में कबीलियों ने उसे पकड़ लिया। वे अपने देवता को अकबर की बलि देने ले गए। वह बुरी तरह डर गया। कबीले वाले अकबर की बलि देने की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्होंने उसकी कटी हुई अँगुली देखी। उसने कहा, “ओह! हम इसकी बलि नहीं दे सकते। देखो, इसकी अँगुली कटी हुई है। दोषपूर्ण शरीर की बलि अपने भगवान को नहीं दी जा सकती है।" उन लोगों ने यह कहकर अकबर को छोड़ दिया। घर वापस आकर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उसे सारा किस्सा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए कहा, "तुम्हारा कथन सत्य हो गया। पर तुम्हें राज्य से निकालने की मेरी आज्ञा तुम्हारे लिए अच्छी कैसे हुई?" बीरबल ने कहा, "यदि आपने मुझे जाने के लिए नहीं कहा होता तो शायद मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता । वहाँ आपकी जगह मुझे पकड़कर कबीले वाले मेरी बलि चढ़ा देते। आपकी आज्ञा ने तो मेरी जान बचा दी।"
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  • बीरबल की चतुराई का घड़ा

    एक दिन, अकबर ने बीरबल से क्रुद्ध होकर उसे राज्य छोड़कर चले जाने के लिए कह दिया।

    सम्राट की आज्ञा मानकर बीरबल चला गया।

    कुछ दिनों के बाद अकबर को बीरबल की याद सताने लगी।

    अकबर ने अपने दूतों को बीरबल को ढूँढ़ने भेजा पर बीरबल उन्हें कहीं नहीं मिला।

    अंततः अकबर को एक युक्ति सूझी।

    अपने राज्य के गाँवों में उसने एक संदेश भेजा, “तीन माह के भीतर आपको चतुराई से भरा घड़ा भेजना होगा अगर असफल रहे,

    तो हीरे-जवाहरातों से भरा घड़ा आपको राजा के पास भेजना होगा।"

    राजा का संदेश पाकर गाँव के मुखिया परेशान हो उठे।

    बीरबल एक गाँव में छिपा हुआ था।

    गाँव के मुखिया से जाकर उसने कहा, “मैं राजा को चतुराई भरा घड़ा भेजूँगा।”

    बीरबल एक घड़ा लेकर अपने बगीचे में गया।

    लता में लगे हुए एक छोटे तरबुज को उसने घड़े में रख दिया।

    तीन माह बाद तरबूज ने बड़े होकर घड़े को भर दिया।

    उसने घड़े को

    अकबर के पास यह लिखकर भेजा, “घड़े को तोड़े बिना चतुराई को निकाल लें।”

    अकबर ने तुरंत पहचान लिया कि यह बीरबल की ही करतूत है।

    वह स्वयं उस गाँव में जाकर बीरबल को अपने साथ वापस ले आया।
    बीरबल की चतुराई का घड़ा एक दिन, अकबर ने बीरबल से क्रुद्ध होकर उसे राज्य छोड़कर चले जाने के लिए कह दिया। सम्राट की आज्ञा मानकर बीरबल चला गया। कुछ दिनों के बाद अकबर को बीरबल की याद सताने लगी। अकबर ने अपने दूतों को बीरबल को ढूँढ़ने भेजा पर बीरबल उन्हें कहीं नहीं मिला। अंततः अकबर को एक युक्ति सूझी। अपने राज्य के गाँवों में उसने एक संदेश भेजा, “तीन माह के भीतर आपको चतुराई से भरा घड़ा भेजना होगा अगर असफल रहे, तो हीरे-जवाहरातों से भरा घड़ा आपको राजा के पास भेजना होगा।" राजा का संदेश पाकर गाँव के मुखिया परेशान हो उठे। बीरबल एक गाँव में छिपा हुआ था। गाँव के मुखिया से जाकर उसने कहा, “मैं राजा को चतुराई भरा घड़ा भेजूँगा।” बीरबल एक घड़ा लेकर अपने बगीचे में गया। लता में लगे हुए एक छोटे तरबुज को उसने घड़े में रख दिया। तीन माह बाद तरबूज ने बड़े होकर घड़े को भर दिया। उसने घड़े को अकबर के पास यह लिखकर भेजा, “घड़े को तोड़े बिना चतुराई को निकाल लें।” अकबर ने तुरंत पहचान लिया कि यह बीरबल की ही करतूत है। वह स्वयं उस गाँव में जाकर बीरबल को अपने साथ वापस ले आया।
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  • त्रिदेव

    एक बार ब्रह्मा और विष्णु में कौन अधिक श्रेष्ठ है?

    इस बात को लेकर विवाद हो गया।

    अचानक उनके समक्ष एक प्रकाश स्तम्भ प्रकट हुआ।

    दोनों में सहमति बनी कि जो भी उसके छोर को ढूँढेगा वही श्रेष्ठ होगा।

    ब्रह्मा स्तम्भ का छोर ढूँढने के लिए आकाश की ओर गए जबकि विष्णु भूतल की ओर छोर ढूँढने गए।

    किन्तु दोनों ही छोर न ढूँढ सके।

    इसी बीच आकाश से गिरते हुए केतकी के फूल को पकड़कर ब्रह्मा विष्णु से मिलने गए।

    विष्णु ने छोर को ढूँढ पाने में अपनी असमर्थता बताई।

    तब ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को दिखाते हुए असत्य कहा कि यह उन्हें स्तम्भ के ऊपर मिला था।

    ब्रह्मा के असत्य से शिव रुष्ट हो गए।

    वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक दूसरे के पूरक हैं।

    जिस प्रकार अ, उ, म एक साथ मिलकर ‘ओऽम्’ बनता है उसी प्रकार ब्रह्मा सृष्टिकर्ता,

    विष्णु-पालनकर्ता और महेश-संहारक हैं जो एक साथ त्रिदेव कहलाते हैं।
    त्रिदेव एक बार ब्रह्मा और विष्णु में कौन अधिक श्रेष्ठ है? इस बात को लेकर विवाद हो गया। अचानक उनके समक्ष एक प्रकाश स्तम्भ प्रकट हुआ। दोनों में सहमति बनी कि जो भी उसके छोर को ढूँढेगा वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्मा स्तम्भ का छोर ढूँढने के लिए आकाश की ओर गए जबकि विष्णु भूतल की ओर छोर ढूँढने गए। किन्तु दोनों ही छोर न ढूँढ सके। इसी बीच आकाश से गिरते हुए केतकी के फूल को पकड़कर ब्रह्मा विष्णु से मिलने गए। विष्णु ने छोर को ढूँढ पाने में अपनी असमर्थता बताई। तब ब्रह्मा ने केतकी के पुष्प को दिखाते हुए असत्य कहा कि यह उन्हें स्तम्भ के ऊपर मिला था। ब्रह्मा के असत्य से शिव रुष्ट हो गए। वस्तुतः ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार अ, उ, म एक साथ मिलकर ‘ओऽम्’ बनता है उसी प्रकार ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु-पालनकर्ता और महेश-संहारक हैं जो एक साथ त्रिदेव कहलाते हैं।
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  • मत देख ऐ हसीना मुझको यु हँसते हँसते.
    मेरे दोस्त बड़े नालायक है कह देंगे भाभी नमस्ते!
    मत देख ऐ हसीना मुझको यु हँसते हँसते. मेरे दोस्त बड़े नालायक है कह देंगे भाभी नमस्ते!
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