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  • " हर दिये को आखिर राख में मिल जाना होता है,
    पर उससे पहले अँधेरों को हराना होता है;
    मिटती है हर लकीर वक़्त की बारिशों में,
    पर उससे पहले नाम आसमान पर लिख जाना होता है। "

    =============== END ===============

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    " हर दिये को आखिर राख में मिल जाना होता है, पर उससे पहले अँधेरों को हराना होता है; मिटती है हर लकीर वक़्त की बारिशों में, पर उससे पहले नाम आसमान पर लिख जाना होता है। " =============== END =============== #PremiumAudience, #HighNetWorth, #LuxuryMarketing, #AffluentAudience, #EliteClients, #PremiumBranding, #LuxuryBrandStrategy, #HighEndMarketing, #WealthManagement, #LuxuryLifestyle, #ExclusiveServices, #UpscaleLiving, #PremiumClients, #LuxuryBusiness, #AffluentMarketing, #BrandPositioning, #LuxuryExperience, #HighValueCustomers, #EliteMarketing, #PremiumServices
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  • ज़िंदगी में कभी ये मत सोचो
    कि कौन कब, कैसे, कहाँ बदल गया…

    बस इतना देखो
    वह तुम्हें *सिखा कर क्या गया।*

    ✨ यही जीवन का सच्चा ज्ञान है।

    पीड़ाएँ केवल दुःख नहीं देतीं,
    वे हमें *समझदार, मजबूत और जागरूक* भी बनाती हैं।" 🌸
    ज़िंदगी में कभी ये मत सोचो कि कौन कब, कैसे, कहाँ बदल गया… बस इतना देखो वह तुम्हें *सिखा कर क्या गया।* ✨ यही जीवन का सच्चा ज्ञान है। पीड़ाएँ केवल दुःख नहीं देतीं, वे हमें *समझदार, मजबूत और जागरूक* भी बनाती हैं।" 🌸
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  • आम का पेड़ और बीरबल

    राम और श्याम नामक दो मित्रों में आपस में लड़ाई हो गई।

    दोनों ही एक आम के पेड़ को अपना बता रहे थे।

    जब दोनों का झगड़ा नहीं सुलझा तब वे बीरबल के पास गए।

    बीरबल ने उनसे पूछा, “मुझे सच-सच बताओ, आम के पेड़ का मालिक कौन है?"

    उत्तर देने की जगह उन्होंने फिर से लड़ना शुरू कर दिया।

    बीरबल ने चिढ़कर कहा, “रुको, इस फ़साद को सुलझाने का बस एक ही उपाय हैं

    इस पेड़ का सारा फल तोड़कर तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँट दिया जाए।

    फिर पेड़ को काटकर उसके तने के दो बराबर भाग कर दिए जाएँ।

    इस प्रकार तुम दोनों के पास आम का पेड़ हो जाएगा।

    यही मेरा सुझाव है।

    राम इस सुझाव से अति प्रसन्न हुआ पर श्याम रोने लगा।

    उसने कहा, “नहीं, नहीं, कृपया आम के पेड़ को मत कटवाइएगा।

    मैंने वर्षों इसकी देखभाल की है।

    राम पेड़ ले सकता है पर उसे काटिए मत।"

    बीरबल ने कहा, “श्याम तुम इस पेड़ के असली मालिक हो ।

    राम को इसमें से कुछ भी नहीं मिलेगा।"
    आम का पेड़ और बीरबल राम और श्याम नामक दो मित्रों में आपस में लड़ाई हो गई। दोनों ही एक आम के पेड़ को अपना बता रहे थे। जब दोनों का झगड़ा नहीं सुलझा तब वे बीरबल के पास गए। बीरबल ने उनसे पूछा, “मुझे सच-सच बताओ, आम के पेड़ का मालिक कौन है?" उत्तर देने की जगह उन्होंने फिर से लड़ना शुरू कर दिया। बीरबल ने चिढ़कर कहा, “रुको, इस फ़साद को सुलझाने का बस एक ही उपाय हैं इस पेड़ का सारा फल तोड़कर तुम दोनों में बराबर-बराबर बाँट दिया जाए। फिर पेड़ को काटकर उसके तने के दो बराबर भाग कर दिए जाएँ। इस प्रकार तुम दोनों के पास आम का पेड़ हो जाएगा। यही मेरा सुझाव है। राम इस सुझाव से अति प्रसन्न हुआ पर श्याम रोने लगा। उसने कहा, “नहीं, नहीं, कृपया आम के पेड़ को मत कटवाइएगा। मैंने वर्षों इसकी देखभाल की है। राम पेड़ ले सकता है पर उसे काटिए मत।" बीरबल ने कहा, “श्याम तुम इस पेड़ के असली मालिक हो । राम को इसमें से कुछ भी नहीं मिलेगा।"
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  • रुई का चोर

    सूत कातने के लिए रुई अकबर बाहर से मँगवाते थे कई लोगों की आजीविका उससे चलती थी।

    शुरू में तो सब अच्छा चला पर फिर रुई की चोर बाज़ारी होने लगी।

    चोर बाज़ारी कौन कर रहा था, पता ही नहीं चल रहा था।

    अकबर ने और अधिक रुई मँगवाई जिससे जुलाहों को नुकसान न हो और उनकी आजीविका चलती रहे।

    पर कोई लाभ न हुआ। चोर बाज़ारी के कारण रुई का अभाव ही रहा।

    क्रोधित होकर बादशाह ने रुई मँगवाना ही बंद कर दिया।

    बेचारे जुलाहे परेशान हो गए। वे बीरबल के पास सहायता लेने गए।

    बीरबल ने उन्हें आश्वासन देकर लौटा दिया। बीरबल ने अकबर से कहा, “महाराज! आप

    रुई का आयात न रोकें। रुई के चोरों को मैं पकडूंगा।”

    बीरबल को पता था कि बिचौलिया ही रुई को दबा कर अधिक दामों में बेचते हैं।

    उसने रुई के आढ़तियों को बुलाकर कहा, “जितनी रुई मँगवाई गई वह कातने वालों तक नहीं पहुँची।

    कुछ चोर रुई को अपनी पगड़ी में छिपा लेते हैं।

    मैं जानता हूँ चोर यहीं हैं पगड़ी स्वयं ही मुझे चोर का पता बता देगी।"

    दोषी आढ़तियों ने एक-दूसरे को देखा।

    एक आदमी डर के मारे अपनी पगड़ी ठीक करने लगा कि कहीं पगड़ी पर रुई तो नहीं लगी है...

    बीरबल की नज़रों ने तुरंत ताड़ लिया। बस फिर क्या था... चोर पकड़ा गया।

    उसके गोदाम से रुई की गाठें बरामद की गईं।

    रुई का काम फिर से प्रारम्भ हो गया और गरीबों को आजीविका मिलने लगी।
    रुई का चोर सूत कातने के लिए रुई अकबर बाहर से मँगवाते थे कई लोगों की आजीविका उससे चलती थी। शुरू में तो सब अच्छा चला पर फिर रुई की चोर बाज़ारी होने लगी। चोर बाज़ारी कौन कर रहा था, पता ही नहीं चल रहा था। अकबर ने और अधिक रुई मँगवाई जिससे जुलाहों को नुकसान न हो और उनकी आजीविका चलती रहे। पर कोई लाभ न हुआ। चोर बाज़ारी के कारण रुई का अभाव ही रहा। क्रोधित होकर बादशाह ने रुई मँगवाना ही बंद कर दिया। बेचारे जुलाहे परेशान हो गए। वे बीरबल के पास सहायता लेने गए। बीरबल ने उन्हें आश्वासन देकर लौटा दिया। बीरबल ने अकबर से कहा, “महाराज! आप रुई का आयात न रोकें। रुई के चोरों को मैं पकडूंगा।” बीरबल को पता था कि बिचौलिया ही रुई को दबा कर अधिक दामों में बेचते हैं। उसने रुई के आढ़तियों को बुलाकर कहा, “जितनी रुई मँगवाई गई वह कातने वालों तक नहीं पहुँची। कुछ चोर रुई को अपनी पगड़ी में छिपा लेते हैं। मैं जानता हूँ चोर यहीं हैं पगड़ी स्वयं ही मुझे चोर का पता बता देगी।" दोषी आढ़तियों ने एक-दूसरे को देखा। एक आदमी डर के मारे अपनी पगड़ी ठीक करने लगा कि कहीं पगड़ी पर रुई तो नहीं लगी है... बीरबल की नज़रों ने तुरंत ताड़ लिया। बस फिर क्या था... चोर पकड़ा गया। उसके गोदाम से रुई की गाठें बरामद की गईं। रुई का काम फिर से प्रारम्भ हो गया और गरीबों को आजीविका मिलने लगी।
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  • फ़कीर

    एक दिन एक फ़कीर अकबर के महल में आया।

    वह महल की चारदीवारी पर बैठकर प्रार्थना करने लगा।

    सिपाहियों ने सोचा कि वह थोड़ी देर बाद स्वतः चला जाएगा, किन्तु वह वहीं

    बैठा रहा। घंटों बीत गए।

    फ़कीर की इस अनाधिकार चेष्टा से अकबर

    खीझ उठा और फ़कीर से जाकर बोला,

    “हे पवित्रात्मा! यह महल है, आश्रम या धर्मशाला नहीं। आप जहाँ चाहें वहाँ बैठकर इस प्रकार ध्यान नहीं लगा सकते।"

    फ़कीर ने पूछा, “आपसे पहले इस महल में कौन रहता था?"

    "पहले मेरे दादा जी, फिर मेरे पिता और अब मैं रहता हूँ।

    मेरे बाद मेरा पुत्र और फिर मेरा पोता..." अकबर ने उत्तर दिया।

    अर्थात् लोग आते और चले जाते हैं।

    यहाँ कोई भी सदा नहीं रहता है।

    तब क्या आपको लगता नहीं कि यह एक आश्रम है?

    उसी प्रकार से यह संसार एक आश्रम है जहाँ हम कुछ समय तक रहते हैं

    और फिर चले जाते हैं।" अकबर निरुत्तर हो गया था।

    फ़कीर को लगा कि सम्राट् को बात समझ आ चुकी थी इसलिए उसने अपनी पगड़ी और दाढ़ी उतार दी।

    अकबर यह देखकर हैरान रह गया कि फ़कीर और

    कोई नहीं पर छद्म वेष में बीरबल ही था ।
    फ़कीर एक दिन एक फ़कीर अकबर के महल में आया। वह महल की चारदीवारी पर बैठकर प्रार्थना करने लगा। सिपाहियों ने सोचा कि वह थोड़ी देर बाद स्वतः चला जाएगा, किन्तु वह वहीं बैठा रहा। घंटों बीत गए। फ़कीर की इस अनाधिकार चेष्टा से अकबर खीझ उठा और फ़कीर से जाकर बोला, “हे पवित्रात्मा! यह महल है, आश्रम या धर्मशाला नहीं। आप जहाँ चाहें वहाँ बैठकर इस प्रकार ध्यान नहीं लगा सकते।" फ़कीर ने पूछा, “आपसे पहले इस महल में कौन रहता था?" "पहले मेरे दादा जी, फिर मेरे पिता और अब मैं रहता हूँ। मेरे बाद मेरा पुत्र और फिर मेरा पोता..." अकबर ने उत्तर दिया। अर्थात् लोग आते और चले जाते हैं। यहाँ कोई भी सदा नहीं रहता है। तब क्या आपको लगता नहीं कि यह एक आश्रम है? उसी प्रकार से यह संसार एक आश्रम है जहाँ हम कुछ समय तक रहते हैं और फिर चले जाते हैं।" अकबर निरुत्तर हो गया था। फ़कीर को लगा कि सम्राट् को बात समझ आ चुकी थी इसलिए उसने अपनी पगड़ी और दाढ़ी उतार दी। अकबर यह देखकर हैरान रह गया कि फ़कीर और कोई नहीं पर छद्म वेष में बीरबल ही था ।
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  • दामादों के लिए प्राणदण्ड

    एक दिन अकबर ने अपने दामाद को संदेश भेजा,

    "कृपया कुछ दिनों के लिए मेरी पुत्री को भेज दें।”

    किन्तु दामाद ने अपनी पत्नी को भेजने से मना कर दिया।

    आग बबूला हुए अकबर ने बीरबल से कहा, “राज्य के

    सभी दामादों को फाँसी पर चढ़ाने की व्यवस्था करो।

    " बीरबल मान गया।

    कुछ दिनों के बाद उसने अकबर को सारी तैयारी का निरीक्षण करने के लिए बुलाया।

    अकबर ने देखा कि ढेर

    सारे फाँसी के फंदे लगे हुए थे।

    वहाँ पर दो विशेष फंदे भी थे- एक

    "वह सोने का था और दूसरा चाँदी का।

    अकबर ने बीरबल से पूछा, सोने और चाँदी का फंदा किसके लिए है?"

    बीरबल ने उत्तर दिया, "ओह! महाराज, वह मेरे और आपके लिए है।"

    “क्या? किसने कहा कि मैं फाँसी पर चढ़ने जा रहा हूँ?"

    "महाराज! आपने...' बीरबल ने कहा, "आपने ही कहा था

    कि राज्य के सभी दामादों को फाँसी दे दी जाए।

    आप भी तो किसी के दामाद हैं।

    कल सबसे पहले आप जाएँगे, आपके पीछे मैं और फिर दूसरे लोग।

    " अकबर अत्यधिक शर्मिंदा हुआ।

    अकबर ने तुरंत अपना आदेश वापस ले लिया।
    दामादों के लिए प्राणदण्ड एक दिन अकबर ने अपने दामाद को संदेश भेजा, "कृपया कुछ दिनों के लिए मेरी पुत्री को भेज दें।” किन्तु दामाद ने अपनी पत्नी को भेजने से मना कर दिया। आग बबूला हुए अकबर ने बीरबल से कहा, “राज्य के सभी दामादों को फाँसी पर चढ़ाने की व्यवस्था करो। " बीरबल मान गया। कुछ दिनों के बाद उसने अकबर को सारी तैयारी का निरीक्षण करने के लिए बुलाया। अकबर ने देखा कि ढेर सारे फाँसी के फंदे लगे हुए थे। वहाँ पर दो विशेष फंदे भी थे- एक "वह सोने का था और दूसरा चाँदी का। अकबर ने बीरबल से पूछा, सोने और चाँदी का फंदा किसके लिए है?" बीरबल ने उत्तर दिया, "ओह! महाराज, वह मेरे और आपके लिए है।" “क्या? किसने कहा कि मैं फाँसी पर चढ़ने जा रहा हूँ?" "महाराज! आपने...' बीरबल ने कहा, "आपने ही कहा था कि राज्य के सभी दामादों को फाँसी दे दी जाए। आप भी तो किसी के दामाद हैं। कल सबसे पहले आप जाएँगे, आपके पीछे मैं और फिर दूसरे लोग। " अकबर अत्यधिक शर्मिंदा हुआ। अकबर ने तुरंत अपना आदेश वापस ले लिया।
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  • सबसे अच्छा कौन?

    एक बार बादशाह अकबर ने अपने दरबारियों से तीन प्रश्न पूछेः-

    1. किसका पुत्र सबसे अच्छा है?

    2. किसका दाँत सबसे अच्छा है?

    3. कौन-सा गुण सबसे अच्छा है?

    कुछ देर सोचने के बाद दरबारियों ने उत्तर दिया, “हुजूर, एक राजा का पुत्र अच्छा है,

    हाथी का दाँत अच्छा है, ज्ञान होना अच्छा गुण है।"

    पर बादशाह इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। जब बीरबल

    आया तब उन्होंने यही सवाल बीरबल से किया।

    कुछ पल विचारकर बीरबल

    ने कहा, “बादशाह हुजूर, गाय का बछड़ा सबसे अच्छा है।

    वह खेत जोतता है और उसके गोबर से खाद बनता है।

    जब फ़सल तैयार होती है तब सभी को भोजन मिलता है।"

    "दूसरे प्रश्न के उत्तर के रूप में हल का दाँत (हल का अगला भाग) सबसे अच्छा है।

    वह धरती को जोतता है, मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और अन्न उपजाता है।

    अंततः साहस सबसे अच्छा गुण है।

    बुद्धिमान होने पर भी साहस के अभाव में व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है...' बीरबल ने अपनी बात पूरी की।

    अकबर और दरबारी बीरबल के उत्तर से प्रसन्न हो गए और उन्होंने बीरबल की खूब प्रशंसा की।
    सबसे अच्छा कौन? एक बार बादशाह अकबर ने अपने दरबारियों से तीन प्रश्न पूछेः- 1. किसका पुत्र सबसे अच्छा है? 2. किसका दाँत सबसे अच्छा है? 3. कौन-सा गुण सबसे अच्छा है? कुछ देर सोचने के बाद दरबारियों ने उत्तर दिया, “हुजूर, एक राजा का पुत्र अच्छा है, हाथी का दाँत अच्छा है, ज्ञान होना अच्छा गुण है।" पर बादशाह इस उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। जब बीरबल आया तब उन्होंने यही सवाल बीरबल से किया। कुछ पल विचारकर बीरबल ने कहा, “बादशाह हुजूर, गाय का बछड़ा सबसे अच्छा है। वह खेत जोतता है और उसके गोबर से खाद बनता है। जब फ़सल तैयार होती है तब सभी को भोजन मिलता है।" "दूसरे प्रश्न के उत्तर के रूप में हल का दाँत (हल का अगला भाग) सबसे अच्छा है। वह धरती को जोतता है, मिट्टी को उपजाऊ बनाता है और अन्न उपजाता है। अंततः साहस सबसे अच्छा गुण है। बुद्धिमान होने पर भी साहस के अभाव में व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है...' बीरबल ने अपनी बात पूरी की। अकबर और दरबारी बीरबल के उत्तर से प्रसन्न हो गए और उन्होंने बीरबल की खूब प्रशंसा की।
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  • अकबर का पलंग

    एक दिन की बात है, अकबर का कमरा साफ़ करने के बाद

    सेवक का मन अकबर के नरम बिस्तर पर लेटने का हुआ।

    उसने एक झपकी लेने की सोची।

    पर लेटते ही वह उठ बैठा, उसे भय था कि ऐसा करते हुए उसे कोई देख न ले।

    किंतु एक सेवक ने उसे ऐसा करते देख लिया और अकबर को

    शिकायत पहुँचा दी।

    नाराज होकर अकबर ने आदेश दिया, “कल प्रातः सेवक को पच्चीस कोड़े लगाए जाएँ।”

    यह सुनकर सेवक भागा हुआ बीरबल के पास गया और सहायता माँगी।

    बीरबल ने कहा, “जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो। "

    आधी रात को किसी की चीख-पुकार सुनकर महल में जाग हो गई।

    लोगों ने अकबर के सेवक को चिल्लाते हुए सुना।

    उसने अकबर को देखते ही कहा, “महाराज! आपकी सजा की तुलना में मेरी सजा तो कुछ भी नहीं है।

    " आश्चर्यचकित अकबर ने पूछा, “कैसी सजा?"

    सेवक ने बताया, “महाराज, मैंने स्वप्न में देखा कि यमदूत आपको कोड़े लगा रहा था।

    जब मैंने कहा कि मेरे महाराज की जगह मुझे कोड़े लगा दो,

    तब उसने कहा कि मैं तो कुछ पल के लिए ही महाराज के बिस्तर पर सोया था

    पर राजा तो वर्षों से उस बिस्तर पर सो रहे हैं इसलिए उन्हें हज़ार कोड़े लगने चाहिए।"

    अकबर शांत रहे और उन्होंने सेवक को दी हुई सजा वापस ले ली।
    अकबर का पलंग एक दिन की बात है, अकबर का कमरा साफ़ करने के बाद सेवक का मन अकबर के नरम बिस्तर पर लेटने का हुआ। उसने एक झपकी लेने की सोची। पर लेटते ही वह उठ बैठा, उसे भय था कि ऐसा करते हुए उसे कोई देख न ले। किंतु एक सेवक ने उसे ऐसा करते देख लिया और अकबर को शिकायत पहुँचा दी। नाराज होकर अकबर ने आदेश दिया, “कल प्रातः सेवक को पच्चीस कोड़े लगाए जाएँ।” यह सुनकर सेवक भागा हुआ बीरबल के पास गया और सहायता माँगी। बीरबल ने कहा, “जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करो। " आधी रात को किसी की चीख-पुकार सुनकर महल में जाग हो गई। लोगों ने अकबर के सेवक को चिल्लाते हुए सुना। उसने अकबर को देखते ही कहा, “महाराज! आपकी सजा की तुलना में मेरी सजा तो कुछ भी नहीं है। " आश्चर्यचकित अकबर ने पूछा, “कैसी सजा?" सेवक ने बताया, “महाराज, मैंने स्वप्न में देखा कि यमदूत आपको कोड़े लगा रहा था। जब मैंने कहा कि मेरे महाराज की जगह मुझे कोड़े लगा दो, तब उसने कहा कि मैं तो कुछ पल के लिए ही महाराज के बिस्तर पर सोया था पर राजा तो वर्षों से उस बिस्तर पर सो रहे हैं इसलिए उन्हें हज़ार कोड़े लगने चाहिए।" अकबर शांत रहे और उन्होंने सेवक को दी हुई सजा वापस ले ली।
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  • बीरबल के गुरु

    एक दिन अकबर ने कहा, “बीरबल, मैं तुम्हारे गुरु से मिलना चाहता हूँ।”

    बीरबल का कोई गुरु था ही नहीं पर वह बादशाह को यह बताना नहीं चाहता था।

    उसने झूठ बोलते हुए कहा कि उसके गए हुए हैं।

    फिर भी अकबर गुरु से मिलने पर जोर देते रहे।

    बीरबल ने एक गरीब गड़रिए तीर्थाटन पर गुरु को अपना गुरु बनने का प्रशिक्षण दिया।

    इस कार्य को करने के लिए बीरबल

    ने उसे पचास स्वर्ण मुद्राएँ दीं।

    गड़रिए ने अपना रूप बदलकर एक साधु

    का रूप धर लिया। कई माह बाद बीरबल अकबर को अपने

    कहा,

    गुरु से मिलाने ले गया।

    अकबर ने गुरु का अभिनन्दन कर 'आपका अभिनन्दन है गुरु जी, मैं आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ।”

    गुरु मौन रहे। अकबर ने सोचा कि शायद उन्हें धन चाहिए... उन्होंने अशर्फ़ियों का कटोरा उनके सामने रखा।

    फिर भी गुरु जी ने कुछ नहीं कहा।

    रुष्ट होकर अकबर अपने महल लौट आए।

    उन्होंने बीरबल को बुलाकर पूछा, "एक मूर्ख से मिलने पर हमें क्या करना चाहिए?"

    छूटते ही बीरबल ने कहा, " शांत

    रहें।" अकबर को एक झटका लगा।

    उन्होंने सोचा... स्वर्ण मुद्राएँ देने के कारण अवश्य ही गुरु जी ने मुझे मूर्ख समझ लिया होगा इसीलिए वे शांत रहे।
    बीरबल के गुरु एक दिन अकबर ने कहा, “बीरबल, मैं तुम्हारे गुरु से मिलना चाहता हूँ।” बीरबल का कोई गुरु था ही नहीं पर वह बादशाह को यह बताना नहीं चाहता था। उसने झूठ बोलते हुए कहा कि उसके गए हुए हैं। फिर भी अकबर गुरु से मिलने पर जोर देते रहे। बीरबल ने एक गरीब गड़रिए तीर्थाटन पर गुरु को अपना गुरु बनने का प्रशिक्षण दिया। इस कार्य को करने के लिए बीरबल ने उसे पचास स्वर्ण मुद्राएँ दीं। गड़रिए ने अपना रूप बदलकर एक साधु का रूप धर लिया। कई माह बाद बीरबल अकबर को अपने कहा, गुरु से मिलाने ले गया। अकबर ने गुरु का अभिनन्दन कर 'आपका अभिनन्दन है गुरु जी, मैं आपसे कुछ बातें करना चाहता हूँ।” गुरु मौन रहे। अकबर ने सोचा कि शायद उन्हें धन चाहिए... उन्होंने अशर्फ़ियों का कटोरा उनके सामने रखा। फिर भी गुरु जी ने कुछ नहीं कहा। रुष्ट होकर अकबर अपने महल लौट आए। उन्होंने बीरबल को बुलाकर पूछा, "एक मूर्ख से मिलने पर हमें क्या करना चाहिए?" छूटते ही बीरबल ने कहा, " शांत रहें।" अकबर को एक झटका लगा। उन्होंने सोचा... स्वर्ण मुद्राएँ देने के कारण अवश्य ही गुरु जी ने मुझे मूर्ख समझ लिया होगा इसीलिए वे शांत रहे।
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  • जो होता है अच्छा होता है

    एक दिन शिकार करते समय अकबर की अँगुली कट गई।

    बीरबल ने यह देखा तो कहा, “जो होता है अच्छा होता है।”

    बीरबल की बात सुनकर अकबर नाराज हो उठा और उसे अपनी नज़रों से दूर कर राज्य से

    निकाल दिया। जाते-जाते बीरबल ने कहा, "यह भी अच्छा ही हुआ।" कई दिनों बाद

    अकबर पुनः शिकार करने गया।

    जंगल में कबीलियों ने उसे पकड़ लिया। वे

    अपने देवता को अकबर की बलि देने ले गए।

    वह बुरी तरह डर गया।

    कबीले वाले अकबर की बलि देने की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्होंने उसकी कटी हुई अँगुली देखी।

    उसने कहा, “ओह! हम इसकी बलि नहीं दे सकते।

    देखो, इसकी अँगुली कटी हुई है।

    दोषपूर्ण शरीर की बलि अपने भगवान को नहीं दी जा सकती है।"

    उन लोगों ने यह कहकर अकबर को छोड़ दिया।

    घर वापस आकर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उसे सारा किस्सा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए कहा, "तुम्हारा कथन सत्य हो गया।

    पर तुम्हें राज्य से निकालने की मेरी आज्ञा तुम्हारे लिए अच्छी कैसे हुई?"

    बीरबल ने कहा, "यदि आपने मुझे जाने के लिए नहीं कहा होता तो शायद मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता ।

    वहाँ आपकी जगह मुझे पकड़कर कबीले वाले मेरी बलि चढ़ा देते।

    आपकी आज्ञा ने तो मेरी जान बचा दी।"
    जो होता है अच्छा होता है एक दिन शिकार करते समय अकबर की अँगुली कट गई। बीरबल ने यह देखा तो कहा, “जो होता है अच्छा होता है।” बीरबल की बात सुनकर अकबर नाराज हो उठा और उसे अपनी नज़रों से दूर कर राज्य से निकाल दिया। जाते-जाते बीरबल ने कहा, "यह भी अच्छा ही हुआ।" कई दिनों बाद अकबर पुनः शिकार करने गया। जंगल में कबीलियों ने उसे पकड़ लिया। वे अपने देवता को अकबर की बलि देने ले गए। वह बुरी तरह डर गया। कबीले वाले अकबर की बलि देने की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्होंने उसकी कटी हुई अँगुली देखी। उसने कहा, “ओह! हम इसकी बलि नहीं दे सकते। देखो, इसकी अँगुली कटी हुई है। दोषपूर्ण शरीर की बलि अपने भगवान को नहीं दी जा सकती है।" उन लोगों ने यह कहकर अकबर को छोड़ दिया। घर वापस आकर अकबर ने बीरबल को बुलाया और उसे सारा किस्सा विस्तारपूर्वक सुनाते हुए कहा, "तुम्हारा कथन सत्य हो गया। पर तुम्हें राज्य से निकालने की मेरी आज्ञा तुम्हारे लिए अच्छी कैसे हुई?" बीरबल ने कहा, "यदि आपने मुझे जाने के लिए नहीं कहा होता तो शायद मैं भी आपके साथ शिकार पर जाता । वहाँ आपकी जगह मुझे पकड़कर कबीले वाले मेरी बलि चढ़ा देते। आपकी आज्ञा ने तो मेरी जान बचा दी।"
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  • किसी ने अकबर की मूँछ खींची

    एक दिन की बात है, दरबार के मंत्री अकबर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

    लम्बी प्रतीक्षा के बाद अकबर

    ने आकर कहा, “मैं आप लोगों की सलाह चाहता हूँ। कल शाम किसी ने

    मेरी मूँछ खींचने का साहस किया।

    बताइए, उसे कैसी सजा दी जानी चाहिए ?”

    दरबार में चारों ओर काना-फूसी होने लगी।

    “ओह! कौन हो सकता है भला! राजा के साथ ऐसा करने की हिम्मत किसकी हुई?"

    एक मंत्री ने कहा, “उसे कोड़े लगाने चाहिए।"

    दूसरे ने कहा, “मेरी समझ से उसे कैद में डाल देना चाहिए।"

    एक और दरबारी ने कहा, “उसे राज्य से ही निकाल देना चाहिए।

    " बीरबल को शांत देख अकबर ने कहा, "बीरबल, तुम्हें कुछ नहीं कहना है?"

    "जी महाराज, जिसने आपकी मूँछ खींची उसे मिठाई दी जानी चाहिए।"

    चारों ओर शांति छा गई।

    उन्होंने बीरबल से ऐसे उत्तर की आशा नहीं की थी।

    अकबर ने पूछा, "क्यों बीरबल, जिसने मेरी मूँछ खींचने का साहस किया उसे मैं पारितोषिक कैसे दे सकता हूँ?”

    “श्रीमान्, केवल आपका पोता ही आपकी मूँछ खींचने का साहस कर सकता है।

    मुझे नहीं लगता है कि उसे मिठाई देने में आपको कोई आपत्ति होगी।"

    अकबर हँसने लगे।

    उन्हें बीरबल की हाज़िरजवाबी पर अचरज हो रहा था।
    किसी ने अकबर की मूँछ खींची एक दिन की बात है, दरबार के मंत्री अकबर के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लम्बी प्रतीक्षा के बाद अकबर ने आकर कहा, “मैं आप लोगों की सलाह चाहता हूँ। कल शाम किसी ने मेरी मूँछ खींचने का साहस किया। बताइए, उसे कैसी सजा दी जानी चाहिए ?” दरबार में चारों ओर काना-फूसी होने लगी। “ओह! कौन हो सकता है भला! राजा के साथ ऐसा करने की हिम्मत किसकी हुई?" एक मंत्री ने कहा, “उसे कोड़े लगाने चाहिए।" दूसरे ने कहा, “मेरी समझ से उसे कैद में डाल देना चाहिए।" एक और दरबारी ने कहा, “उसे राज्य से ही निकाल देना चाहिए। " बीरबल को शांत देख अकबर ने कहा, "बीरबल, तुम्हें कुछ नहीं कहना है?" "जी महाराज, जिसने आपकी मूँछ खींची उसे मिठाई दी जानी चाहिए।" चारों ओर शांति छा गई। उन्होंने बीरबल से ऐसे उत्तर की आशा नहीं की थी। अकबर ने पूछा, "क्यों बीरबल, जिसने मेरी मूँछ खींचने का साहस किया उसे मैं पारितोषिक कैसे दे सकता हूँ?” “श्रीमान्, केवल आपका पोता ही आपकी मूँछ खींचने का साहस कर सकता है। मुझे नहीं लगता है कि उसे मिठाई देने में आपको कोई आपत्ति होगी।" अकबर हँसने लगे। उन्हें बीरबल की हाज़िरजवाबी पर अचरज हो रहा था।
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  • बीरबल ने अकबर को मूर्ख कहा

    एक दिन अरब का एक सौदागर अकबर के दरबार में अपने घोड़े बेचने आया।

    उसने कहा कि

    उसके पास सभी जाति और सभी उम्र के घोड़े थे।

    अकबर उससे अत्यंत प्रभावित हुआ

    और उसको कई घोड़े देने के लिए कहा।

    सौदागर ने अरब पहुँचते ही घोड़े भेज

    देने का वादा किया। अकबर मान गया और दो लाख रुपए उसे घोड़े के लिए दे दिए।

    इधर अकबर ने बीरबल से कहा, “राज्य के दस बड़े मूर्खों की सूची मुझे दो।”

    कुछ दिनों के बाद बीरबल ने अकबर को मूर्खों की सूची दी।

    सूची देखकर अकबर आग बबूला हो उठा, “इस सूची में मेरा नाम लिखने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?"

    शांतिपूर्वक बीरबल ने कहा, “महाराज, आपने अरब के सौदागर को बिना किसी जमानत के ढेर सारे पैसे घोड़ों के लिए दे दिए।

    आपने यह भी नहीं सोचा कि वादे के अनुसार वह घोड़े लाएगा भी या नहीं।

    इसी कारण मैंने आपका नाम सूची में सबसे ऊपर रखा।

    अकबर ने कहा, “यदि वह घोड़े ले आया तो?"

    “तब मैं सूची में से आपका नाम हटाकर उसका नाम लिख दूँगा।”

    अचानक अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ।

    बीरबल की हाज़िरजवाबी पर अकबर हँस दिए ।
    बीरबल ने अकबर को मूर्ख कहा एक दिन अरब का एक सौदागर अकबर के दरबार में अपने घोड़े बेचने आया। उसने कहा कि उसके पास सभी जाति और सभी उम्र के घोड़े थे। अकबर उससे अत्यंत प्रभावित हुआ और उसको कई घोड़े देने के लिए कहा। सौदागर ने अरब पहुँचते ही घोड़े भेज देने का वादा किया। अकबर मान गया और दो लाख रुपए उसे घोड़े के लिए दे दिए। इधर अकबर ने बीरबल से कहा, “राज्य के दस बड़े मूर्खों की सूची मुझे दो।” कुछ दिनों के बाद बीरबल ने अकबर को मूर्खों की सूची दी। सूची देखकर अकबर आग बबूला हो उठा, “इस सूची में मेरा नाम लिखने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?" शांतिपूर्वक बीरबल ने कहा, “महाराज, आपने अरब के सौदागर को बिना किसी जमानत के ढेर सारे पैसे घोड़ों के लिए दे दिए। आपने यह भी नहीं सोचा कि वादे के अनुसार वह घोड़े लाएगा भी या नहीं। इसी कारण मैंने आपका नाम सूची में सबसे ऊपर रखा। अकबर ने कहा, “यदि वह घोड़े ले आया तो?" “तब मैं सूची में से आपका नाम हटाकर उसका नाम लिख दूँगा।” अचानक अकबर को अपनी गलती का एहसास हुआ। बीरबल की हाज़िरजवाबी पर अकबर हँस दिए ।
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