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  • एक रात को संतासिंह सो रहे थे

    कि एक मच्छर उनके कान के पास आया और गुनगुन करने लगा।

    इससे संतासिंह की नींद खुल गई।

    फिर जैसे ही वो सोने की कोशिश करते मच्छर उनके कान के पास आवाज करने लगता।

    संतासिंह को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने मच्छर को पकड़ लिया।

    मच्छर मर गया लेकिन उसमें से खून नहीं निकला।

    संतासिंह बोले- सो जा मच्छर बेटे, सो जा।

    थोडी देर बाद उन्हें लगा कि मच्छर गहरी नींद में सो चुका है

    तो वे उसके पास गए और उसके कान के पास जाकर बोले- 'गुननननन-गुनननन।
    एक रात को संतासिंह सो रहे थे कि एक मच्छर उनके कान के पास आया और गुनगुन करने लगा। इससे संतासिंह की नींद खुल गई। फिर जैसे ही वो सोने की कोशिश करते मच्छर उनके कान के पास आवाज करने लगता। संतासिंह को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने मच्छर को पकड़ लिया। मच्छर मर गया लेकिन उसमें से खून नहीं निकला। संतासिंह बोले- सो जा मच्छर बेटे, सो जा। थोडी देर बाद उन्हें लगा कि मच्छर गहरी नींद में सो चुका है तो वे उसके पास गए और उसके कान के पास जाकर बोले- 'गुननननन-गुनननन।
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  • संतासिंह और बंतासिंह दोनों बहुत बडे दुश्मन थे।

    ये दोनों एक ही बिल्डिंग में रहते थे।

    बंतासिंह सातवें माले पर रहता था और संतासिंह पहले।

    एक बार बिल्डिंग की लिफ्ट खराब हो गई।

    बंतासिंह ने सोचा कि आज संता को सबक सिखाया जाए।

    उसने संतासिंह को फोन करके खाने पर बुलाया।

    बेचारा संतासिंह जैसे-तैसे सातवें माले पर पहुंचा और वहां जाकर देखा कि दरवाजे पर ताला लगा है और लिखा था कि कैसा उल्लू बनाया।

    संतासिंह को ये देखकर बहुत गुस्सा आया।

    उसने उस नोट के नीचे लिखा- मैं तो यहां आया ही नहीं था।
    संतासिंह और बंतासिंह दोनों बहुत बडे दुश्मन थे। ये दोनों एक ही बिल्डिंग में रहते थे। बंतासिंह सातवें माले पर रहता था और संतासिंह पहले। एक बार बिल्डिंग की लिफ्ट खराब हो गई। बंतासिंह ने सोचा कि आज संता को सबक सिखाया जाए। उसने संतासिंह को फोन करके खाने पर बुलाया। बेचारा संतासिंह जैसे-तैसे सातवें माले पर पहुंचा और वहां जाकर देखा कि दरवाजे पर ताला लगा है और लिखा था कि कैसा उल्लू बनाया। संतासिंह को ये देखकर बहुत गुस्सा आया। उसने उस नोट के नीचे लिखा- मैं तो यहां आया ही नहीं था।
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  • हिन्दोस्तान से ताजा-ताजा विलायत पहुंचा एक पंजाबी जाट लंदन के

    एक रेस्टोरेंट में वेटर की नौकरी पर लगा।

    वहां उसे काम करते कुछ ही दिन हुए थे कि एक

    रोज मैनेजर ने उसे अपने ऑफिस में बुलाया और बताया कि पंजाब से उसके भाई का फोन था।

    वेटर ने फोन रिसीव किया और काफी देर टूटी-फूटी अंग्रेजी में
    अपने भाई से बात करता रहा।

    आखिरकार उसने फोन रखा तो मैनेजर ने उससे पूछा - अपने भाई से अंग्रेजी में बात क्यों की ?

    अपनी जुबान में क्‍यों नहीं की ?

    साहब जी - वेटर हकबकाया-सा बोला - अब मुझे कया मालूम था कि आपका टेलीफोन पंजाबी भी बोलता है।
    हिन्दोस्तान से ताजा-ताजा विलायत पहुंचा एक पंजाबी जाट लंदन के एक रेस्टोरेंट में वेटर की नौकरी पर लगा। वहां उसे काम करते कुछ ही दिन हुए थे कि एक रोज मैनेजर ने उसे अपने ऑफिस में बुलाया और बताया कि पंजाब से उसके भाई का फोन था। वेटर ने फोन रिसीव किया और काफी देर टूटी-फूटी अंग्रेजी में अपने भाई से बात करता रहा। आखिरकार उसने फोन रखा तो मैनेजर ने उससे पूछा - अपने भाई से अंग्रेजी में बात क्यों की ? अपनी जुबान में क्‍यों नहीं की ? साहब जी - वेटर हकबकाया-सा बोला - अब मुझे कया मालूम था कि आपका टेलीफोन पंजाबी भी बोलता है।
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  • संता ट्रेन से कहीं जा रहा थे।

    उसके हाथ में एक दूरबीन थी।

    वह खिड़की से लगातार बाहर तो झाँक रहा था लेकिन दूरबीन कभी नहीं लगाता था।

    एक यात्री जो बगल मैं बैठा था संता को बार-बार ऐसा करते हुए देखा तो उस से रहा नहीं गया।

    उसने संता से पूछा कि भाई साहब, यह दूरबीन किस काम की है ?

    संता सिंह ने कहा कि इससे दूर की चीजें दे खी जाती हैं।

    यात्री को बड़ी उत्सुकता हुई। उसने पूछा कि आप यह दूरबीन क्यों लिए हुए हैं।

    दरअसल मैं अपने एक दूर के रिश्तेदार को देखने जा रहा हूं।
    संता ट्रेन से कहीं जा रहा थे। उसके हाथ में एक दूरबीन थी। वह खिड़की से लगातार बाहर तो झाँक रहा था लेकिन दूरबीन कभी नहीं लगाता था। एक यात्री जो बगल मैं बैठा था संता को बार-बार ऐसा करते हुए देखा तो उस से रहा नहीं गया। उसने संता से पूछा कि भाई साहब, यह दूरबीन किस काम की है ? संता सिंह ने कहा कि इससे दूर की चीजें दे खी जाती हैं। यात्री को बड़ी उत्सुकता हुई। उसने पूछा कि आप यह दूरबीन क्यों लिए हुए हैं। दरअसल मैं अपने एक दूर के रिश्तेदार को देखने जा रहा हूं।
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  • पड़ोसी का बच्चा


    एक दिन सुबह में

    संता सिंह अपने बेटे को बच्चागाड़ी में पास के बगीचे में घुमा रहे थे।

    वहाँ संता सिंह से जो मिलता एक ही सवाल पूछता -

    संता सिंह, अपने बेटे को घुमा रहे हो !

    कुछ देर बाद जब वो वापस आने लगा तो फिर से वही सवाल उसके सामने आया।

    बार-बार एक ही सवाल से तंग आकर संता सिंह ने उस व्यक्ति को जवाब दिया, जी नहीं पड़ोसी का बच्चा है।

    उस पर उस व्यक्ति ने जबाब दिया -

    "तभी मैं कहूं कि इसकी शक्ल आपके पड़ोसी से इतनी क्यों मिल रही है।
    पड़ोसी का बच्चा एक दिन सुबह में संता सिंह अपने बेटे को बच्चागाड़ी में पास के बगीचे में घुमा रहे थे। वहाँ संता सिंह से जो मिलता एक ही सवाल पूछता - संता सिंह, अपने बेटे को घुमा रहे हो ! कुछ देर बाद जब वो वापस आने लगा तो फिर से वही सवाल उसके सामने आया। बार-बार एक ही सवाल से तंग आकर संता सिंह ने उस व्यक्ति को जवाब दिया, जी नहीं पड़ोसी का बच्चा है। उस पर उस व्यक्ति ने जबाब दिया - "तभी मैं कहूं कि इसकी शक्ल आपके पड़ोसी से इतनी क्यों मिल रही है।
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  • जिसके हम मामा हैं


    एक सज्जन बनारस पहुँचे।

    स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता हुआ आया।

    “मामाजी ! मामाजी !”-लड़के ने लपक कर चरण छूए।

    वे पहचाने नहीं। बोले-“तुम कौन ?”

    “मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे ?”

    “मुन्ना ?” वे सोचने लगे।

    “हाँ, मुन्ना।

    भूल गये आप मामाजी ! खैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गये।”

    “तुम यहां कैसे ?”

    “मैं आजकल यहीं हूँ।”

    “अच्छा।”

    मामाजी अपने भानजे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर। फिर पहुँचे गंगाघाट। सोचा, नहा लें।

    “मुन्ना, नहा लें ?”

    “जरूर नहाइए मामाजी ! बनारस आये हैं और नहाएंगे नहीं, यह कैसे हो सकता है ?”

    मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे।

    बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब ! लड़का...मुन्ना भी गायब !

    “मुन्ना...ए मुन्ना !”

    मगर मुन्ना वहां हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं।

    “क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है ?”

    “कौन मुन्ना ?”

    “वही जिसके हम मामा हैं।”

    “मैं समझा नहीं।”

    “अरे, हम जिसके मामा हैं वो मुन्ना।”

    वे तौलिया लपेटे यहां से वहां दौड़ते रहे।

    मुन्ना नहीं मिला।
    जिसके हम मामा हैं एक सज्जन बनारस पहुँचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता हुआ आया। “मामाजी ! मामाजी !”-लड़के ने लपक कर चरण छूए। वे पहचाने नहीं। बोले-“तुम कौन ?” “मैं मुन्ना। आप पहचाने नहीं मुझे ?” “मुन्ना ?” वे सोचने लगे। “हाँ, मुन्ना। भूल गये आप मामाजी ! खैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गये।” “तुम यहां कैसे ?” “मैं आजकल यहीं हूँ।” “अच्छा।” मामाजी अपने भानजे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर। फिर पहुँचे गंगाघाट। सोचा, नहा लें। “मुन्ना, नहा लें ?” “जरूर नहाइए मामाजी ! बनारस आये हैं और नहाएंगे नहीं, यह कैसे हो सकता है ?” मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे। बाहर निकले तो सामान गायब, कपड़े गायब ! लड़का...मुन्ना भी गायब ! “मुन्ना...ए मुन्ना !” मगर मुन्ना वहां हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं। “क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है ?” “कौन मुन्ना ?” “वही जिसके हम मामा हैं।” “मैं समझा नहीं।” “अरे, हम जिसके मामा हैं वो मुन्ना।” वे तौलिया लपेटे यहां से वहां दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला।
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  • संता सिंह का ट्रक


    संता सिंह एक बार ट्रक लेकर कहीं जा रहे थे।

    रास्ते में उनका ट्रक खराब हो गया।

    संता ने ट्रक ले जाने के लिए एक दूसरे ट्रक की व्यवस्था की और अपने ट्रक को खींचकर गैराज ले जाने लगे।

    रास्ते में एक ढाबे पर बंता सिंह दिखाई दिए।

    बंता, संता सिंह को ट्रक ले आते देख जोर-जोर से हंसने लगा।

    संता ने गुस्से में पूछा, अबे कभी तूने ट्रक नहीं देखा क्या ?

    ट्रक तो देखा है, लेकिन ऐसा पहली बार देखा है कि दो ट्रक मिलकर एक रस्सी को ले जा रहे हैं।

    बंता ने जवाब दिया।
    संता सिंह का ट्रक संता सिंह एक बार ट्रक लेकर कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनका ट्रक खराब हो गया। संता ने ट्रक ले जाने के लिए एक दूसरे ट्रक की व्यवस्था की और अपने ट्रक को खींचकर गैराज ले जाने लगे। रास्ते में एक ढाबे पर बंता सिंह दिखाई दिए। बंता, संता सिंह को ट्रक ले आते देख जोर-जोर से हंसने लगा। संता ने गुस्से में पूछा, अबे कभी तूने ट्रक नहीं देखा क्या ? ट्रक तो देखा है, लेकिन ऐसा पहली बार देखा है कि दो ट्रक मिलकर एक रस्सी को ले जा रहे हैं। बंता ने जवाब दिया।
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  • तारों का जन्म

    'ओंगी' जनजाति के लोगों का मानना है कि सृष्टि के आरंभ में, जब धरती बनी ही थी आसमान बहुत नीचे था ।

    फिर एक दिन, सूर्य और चन्द्रमा की रचना हुई। लेकिन छलपूर्वक उन्होंने अपना- अपना स्थान बदल लिया । वे धरती के और निकट आ गए ।

    उनके इस कृत्य से धरती बुरी तरह गर्म हो गई । इसकी सतह पर गहरी दरारें पड़ गईं । लोगों ने घर से निकलना बन्द कर दिया । उन्हें डर था कि तेज धूप के कारण उनका शरीर झुलस जाएगा ।

    झरने और नदियाँ सब सूख गए। पानी का कहीं नामोनिशान न रहा । पशु-पक्षी यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ मारे-मारे फिरने लगे ।

    एक दिन बुजुर्गों ने विचार-विमर्श के लिए एक बैठक बुलाई । उसमें युवकों को भी बुलाया गया। तय पाया गया कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो कुछ ही दिनों में धरती पर जीवन नष्ट हो जाएगा । अन्त में, सभी की सहमति से ता-चोई (एक विशेष प्रकार की लकड़ी) तथा चा-लोक (नारियल की डंडी) से तीर-कमान तैयार करने का निर्णय लिया गया।

    निश्चय किया गया कि आसमान पर लगातार तब तक तीर मारते रहा जाए. जब तक कि उसे धरती से काफी दूर न धकेल दिया जाए। सूर्य और चन्द्रमा तब अपने- अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे और इस तरह धरती असह्य गर्मी से बच जाएगी ।

    तब, एक दिन उन्होंने आकाश को तीर मारना शुरू किया ।

    लेकिन उनके सारे तीर आकाश में अटक गए। उनमें से एक भी तीर वापस धरती पर नहीं गिरा । होता यह कि जैसे ही तीर आसमान से टकराता आग निकलती और तारा बन जाती ।

    आसमान में इस तरह अनगिनत तारे बन गए ।

    लेकिन ओंगी हताश नहीं हुए। आसमान के साथ-साथ उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा को भी पीछे धकेलने के लिए उन पर तीर मारना जारी रखा ।

    कुछ समय बाद सूर्य और चन्द्रमा वापस अपने-अपने स्थान पर चले गए। उसके बाद धरती की सतह भी ठंडी हो गई। वर्षा होने लगी । झरने और नदियाँ भरे-पूरे बहने लगे । वृक्ष ठग आए। पशु-पक्षियों में जीवन का संचार हो गया ।

    और इस तरह पूरे आकाश में टिमटिमाने वाले तारों का जन्म हुआ ।
    तारों का जन्म 'ओंगी' जनजाति के लोगों का मानना है कि सृष्टि के आरंभ में, जब धरती बनी ही थी आसमान बहुत नीचे था । फिर एक दिन, सूर्य और चन्द्रमा की रचना हुई। लेकिन छलपूर्वक उन्होंने अपना- अपना स्थान बदल लिया । वे धरती के और निकट आ गए । उनके इस कृत्य से धरती बुरी तरह गर्म हो गई । इसकी सतह पर गहरी दरारें पड़ गईं । लोगों ने घर से निकलना बन्द कर दिया । उन्हें डर था कि तेज धूप के कारण उनका शरीर झुलस जाएगा । झरने और नदियाँ सब सूख गए। पानी का कहीं नामोनिशान न रहा । पशु-पक्षी यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ मारे-मारे फिरने लगे । एक दिन बुजुर्गों ने विचार-विमर्श के लिए एक बैठक बुलाई । उसमें युवकों को भी बुलाया गया। तय पाया गया कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो कुछ ही दिनों में धरती पर जीवन नष्ट हो जाएगा । अन्त में, सभी की सहमति से ता-चोई (एक विशेष प्रकार की लकड़ी) तथा चा-लोक (नारियल की डंडी) से तीर-कमान तैयार करने का निर्णय लिया गया। निश्चय किया गया कि आसमान पर लगातार तब तक तीर मारते रहा जाए. जब तक कि उसे धरती से काफी दूर न धकेल दिया जाए। सूर्य और चन्द्रमा तब अपने- अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे और इस तरह धरती असह्य गर्मी से बच जाएगी । तब, एक दिन उन्होंने आकाश को तीर मारना शुरू किया । लेकिन उनके सारे तीर आकाश में अटक गए। उनमें से एक भी तीर वापस धरती पर नहीं गिरा । होता यह कि जैसे ही तीर आसमान से टकराता आग निकलती और तारा बन जाती । आसमान में इस तरह अनगिनत तारे बन गए । लेकिन ओंगी हताश नहीं हुए। आसमान के साथ-साथ उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा को भी पीछे धकेलने के लिए उन पर तीर मारना जारी रखा । कुछ समय बाद सूर्य और चन्द्रमा वापस अपने-अपने स्थान पर चले गए। उसके बाद धरती की सतह भी ठंडी हो गई। वर्षा होने लगी । झरने और नदियाँ भरे-पूरे बहने लगे । वृक्ष ठग आए। पशु-पक्षियों में जीवन का संचार हो गया । और इस तरह पूरे आकाश में टिमटिमाने वाले तारों का जन्म हुआ ।
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  • चोरी हुआ टापू


    बहुत समय पहले काकना गाँव के पास एक छोटा-सा टापू था ।

    छोटा होने पर भी वह एक दर्शनीय टापू था ।

    उस पर कोई रहता नहीं था। लोग उस पर सिर्फ घूमने और शिकार करने के लिए जाते थे ।

    टापू पर 'साका' नाम का एक पक्षी भी आता-जाता था। पूरी दूनिया में वह एक ही पक्षी था। वह छोटा परन्तु बहुत चतुर-चालाक था ।

    वर्षों तक साका टापू में उड़ान भरता रहा । उसको टापू इतना अधिक भाया कि उसने उसे अपने साथ ले जाने की योजना बनाई ताकि उसके रहने की जगह हमेशा खूबसूरत बनी रहे । उसके सिवा कोई औरं वहाँ न हो।

    एक रात, जब सारी दुनिया सोई हुई थी, साका ने सोचा--- अच्छा मौका है। ऐसे में

    मुझे इस टापू को ले उड़ना चाहिए।

    साका कल्पना में खो गया। उसे लगा कि पूरा टापू उसके घर में है और वह आराम से यपू में उड़ान भर रहा है। वहाँ उसका एक प्यारा घोंसला है। तरह-तरह के दूसरे पक्षी आसपास चहक रहे हैं ।

    सभी उस टापू की प्रशंसा कर रहे हैं और वहाँ रुक जाना चाहते है। अचानक उसकी तन्द्रा टूटी और वह उस छोटे टापू को पीठ पर लादकर अपने निवास की ओर उड़ चला।

    साका छोटा था। वह बड़ी सावधानी के साथ उस भारी-भरकम टापू को लेकर उड़ रहा था। दिन निकलने से पहले वह अपने निवास पर पहुँच जाना चाहता था। लेकिन समय उसकी उड़ान की तुलना में तेजी से गुजर रहा था।

    जैसा कि उसको डर था, रात समाप्त हो गई।

    दिन निकल आया ।

    लोग जाग उठे। उन्होंने साका को टापू लेकर जाते हुए देख लिया ।

    पूरब की ओर से आती सूरज की पहली किरण पड़ते ही साका ने टापू को नीचे फेंक दिया और तेजी से अपने निवास की ओर उड़ गया ।

    टापू उलटकर समुद्र में जा गिरा ।

    लोगों का मानना है कि चौरा के रास्ते में सागर के बीच झाँकता 'छोटा टापू' ही वह चोरी गया टापू है ।
    चोरी हुआ टापू बहुत समय पहले काकना गाँव के पास एक छोटा-सा टापू था । छोटा होने पर भी वह एक दर्शनीय टापू था । उस पर कोई रहता नहीं था। लोग उस पर सिर्फ घूमने और शिकार करने के लिए जाते थे । टापू पर 'साका' नाम का एक पक्षी भी आता-जाता था। पूरी दूनिया में वह एक ही पक्षी था। वह छोटा परन्तु बहुत चतुर-चालाक था । वर्षों तक साका टापू में उड़ान भरता रहा । उसको टापू इतना अधिक भाया कि उसने उसे अपने साथ ले जाने की योजना बनाई ताकि उसके रहने की जगह हमेशा खूबसूरत बनी रहे । उसके सिवा कोई औरं वहाँ न हो। एक रात, जब सारी दुनिया सोई हुई थी, साका ने सोचा--- अच्छा मौका है। ऐसे में मुझे इस टापू को ले उड़ना चाहिए। साका कल्पना में खो गया। उसे लगा कि पूरा टापू उसके घर में है और वह आराम से यपू में उड़ान भर रहा है। वहाँ उसका एक प्यारा घोंसला है। तरह-तरह के दूसरे पक्षी आसपास चहक रहे हैं । सभी उस टापू की प्रशंसा कर रहे हैं और वहाँ रुक जाना चाहते है। अचानक उसकी तन्द्रा टूटी और वह उस छोटे टापू को पीठ पर लादकर अपने निवास की ओर उड़ चला। साका छोटा था। वह बड़ी सावधानी के साथ उस भारी-भरकम टापू को लेकर उड़ रहा था। दिन निकलने से पहले वह अपने निवास पर पहुँच जाना चाहता था। लेकिन समय उसकी उड़ान की तुलना में तेजी से गुजर रहा था। जैसा कि उसको डर था, रात समाप्त हो गई। दिन निकल आया । लोग जाग उठे। उन्होंने साका को टापू लेकर जाते हुए देख लिया । पूरब की ओर से आती सूरज की पहली किरण पड़ते ही साका ने टापू को नीचे फेंक दिया और तेजी से अपने निवास की ओर उड़ गया । टापू उलटकर समुद्र में जा गिरा । लोगों का मानना है कि चौरा के रास्ते में सागर के बीच झाँकता 'छोटा टापू' ही वह चोरी गया टापू है ।
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  • चमगादड़ का जन्म


    बहुत समय पहले की बात है ।

    एक विदेशी जलपोत कहीं दूर से आया । लेकिन इससे पहले कि वह किनारे पर लग पाता - तूफान में फँँस गया। नाविकों ने उसे बचाने की भरपूर कोशिश की लेकिन वह एक चट्टान से टकरा गया और चकनाचूर हो गया ।

    नाविकों और यात्रियों ने तैरकर किनारे पहुँचने की भरपूर कोशिश की लेकिन उनमें से अधिकांश डूब गए। बचे हुए लोगों में से कुछ किमिओस द्वीप पर जा पहुँचे । उन सभी के कपड़े फट चुके थे।

    शरीर घायल थे। सभी की हालत दयनीय थी। काफी समय तक वे सागर-किनारे बेहोश पड़े रहे ।

    होश आने पर वे भोजन और आवास की तलाश में भटकने लगे। उस समय तक तूफान थम चुका था और मौसम शान्त हो गया था ।

    बिना कुछ खाए-पिए वे लोग जंगल में घुस पड़े। वहाँ उन्हें ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ नजर आए वे उन पर चढ़ गए उन्होंने 'फलों को तोड़कर पानी पिया और गूदा खाया ।

    चारों ओर अंधेरा छा गया था। आसपास की चीजें दिखाई देनी बन्द हो गई थीं । किसी तरह उन्होंने पेड़ों की शाखाओं को पकड़ा और उन पर लटक गए ।

    कपड़े फट चुके थे। शरीर घायल थे। सभी की हालत दयनीय थी। काफी समय तक वे सागर-किनारे बेहोश पड़े रहे।

    होश आने पर वे भोजन और आवास की तलाश में भटकने लगे ।

    उस समय तक तूफान थम चुका था और मौसम शान्त हो गया था ।

    बिना कुछ खाए-पिए वे लोग जंगल में घुस पड़े। वहाँ उन्हें ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ नजर आए वे उन पर चढ़ गए उन्होंने फलों को तोड़कर पानी पिया और गूदा खाया ।

    चारों ओर अंधेरा छा गया था। आसपास की चीजें दिखाई देनी बन्द हो गई थीं । किसी तरह उन्होंने पेड़ों की शाखाओं को पकड़ा और उन पर लटक गए ।

    अण्डमानी आदिम जनजाति के लोगों का मानना है कि शाखाओं से लटके वे लोग रात भर में ही चमगादड़ बन गए । युवा लोग छोटे चमगादड़ और वृद्ध लोग बड़े चमगादड़ बने । इससे पहले उस द्वीप पर एक भी चमगादड़ नहीं था ।

    यही चमगादड़ बाद में बाकी द्वीपों के जंगलों में भी फैल गए ।
    चमगादड़ का जन्म बहुत समय पहले की बात है । एक विदेशी जलपोत कहीं दूर से आया । लेकिन इससे पहले कि वह किनारे पर लग पाता - तूफान में फँँस गया। नाविकों ने उसे बचाने की भरपूर कोशिश की लेकिन वह एक चट्टान से टकरा गया और चकनाचूर हो गया । नाविकों और यात्रियों ने तैरकर किनारे पहुँचने की भरपूर कोशिश की लेकिन उनमें से अधिकांश डूब गए। बचे हुए लोगों में से कुछ किमिओस द्वीप पर जा पहुँचे । उन सभी के कपड़े फट चुके थे। शरीर घायल थे। सभी की हालत दयनीय थी। काफी समय तक वे सागर-किनारे बेहोश पड़े रहे । होश आने पर वे भोजन और आवास की तलाश में भटकने लगे। उस समय तक तूफान थम चुका था और मौसम शान्त हो गया था । बिना कुछ खाए-पिए वे लोग जंगल में घुस पड़े। वहाँ उन्हें ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ नजर आए वे उन पर चढ़ गए उन्होंने 'फलों को तोड़कर पानी पिया और गूदा खाया । चारों ओर अंधेरा छा गया था। आसपास की चीजें दिखाई देनी बन्द हो गई थीं । किसी तरह उन्होंने पेड़ों की शाखाओं को पकड़ा और उन पर लटक गए । कपड़े फट चुके थे। शरीर घायल थे। सभी की हालत दयनीय थी। काफी समय तक वे सागर-किनारे बेहोश पड़े रहे। होश आने पर वे भोजन और आवास की तलाश में भटकने लगे । उस समय तक तूफान थम चुका था और मौसम शान्त हो गया था । बिना कुछ खाए-पिए वे लोग जंगल में घुस पड़े। वहाँ उन्हें ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ नजर आए वे उन पर चढ़ गए उन्होंने फलों को तोड़कर पानी पिया और गूदा खाया । चारों ओर अंधेरा छा गया था। आसपास की चीजें दिखाई देनी बन्द हो गई थीं । किसी तरह उन्होंने पेड़ों की शाखाओं को पकड़ा और उन पर लटक गए । अण्डमानी आदिम जनजाति के लोगों का मानना है कि शाखाओं से लटके वे लोग रात भर में ही चमगादड़ बन गए । युवा लोग छोटे चमगादड़ और वृद्ध लोग बड़े चमगादड़ बने । इससे पहले उस द्वीप पर एक भी चमगादड़ नहीं था । यही चमगादड़ बाद में बाकी द्वीपों के जंगलों में भी फैल गए ।
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  • जब पेड़ चलते थे
    अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ

    बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे।

    उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था ।

    आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे ।

    आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था ।

    पेड़ उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता ।

    पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है ।

    उन दिनों 'इलपमन' नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी । पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खूब आनन्द करते थे । वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे ।

    लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर बुराइयाँ पनप उठीं ।

    एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे।

    पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगते ।

    पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्‍न हो उठे | वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है।

    उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया ।

    अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना कौ। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे ।

    इस तरह आदमी के भददे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया
    जब पेड़ चलते थे अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे। उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था । आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे । आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था । पेड़ उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता । पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है । उन दिनों 'इलपमन' नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी । पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खूब आनन्द करते थे । वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे । लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर बुराइयाँ पनप उठीं । एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे। पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगते । पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्‍न हो उठे | वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है। उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया । अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना कौ। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे । इस तरह आदमी के भददे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया
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  • " हर अँधेरा रास्ता रोके तो क्या हुआ,
    दिल में जली उम्मीद ही सुबह बन जाती है।
    ठोकरें तो बस इम्तिहान हैं हौसलों का,
    जो गिरकर भी मुस्कुराए, वही ज़िंदगी जीत जाती है… "💛

    =============== END ===============

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    " हर अँधेरा रास्ता रोके तो क्या हुआ, दिल में जली उम्मीद ही सुबह बन जाती है। ठोकरें तो बस इम्तिहान हैं हौसलों का, जो गिरकर भी मुस्कुराए, वही ज़िंदगी जीत जाती है… "💛 =============== END =============== #HindiShayari, #ShayariLovers, #MotivationalShayari, #InspirationalWords, #PositiveVibesOnly, #LifeQuotesHindi, #DeepThoughts, #SelfGrowthJourney, #MindsetMatters, #DailyMotivation, #SuccessMindset, #InnerStrength, #NeverGiveUp, #HopeAndStrength, #EmotionalWellness, #SoulfulWords, #PoetryOfInstagram, #WritersCommunity, #InstaShayari, #FeelTheWords
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