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  • मटके में क्या है?

    एक बार सुदूर गाँव से एक विद्वान् अकबर के दरबार में आया।

    उसने अपनी विद्वता की खूब तारीफ़ की।

    उसने राजा से पूछा कि क्या उसके दरबारी विद्वान हैं और उसकी चुनौती को स्वीकार कर सकते हैं?" अकबर ने

    चुनौती स्वीकार कर ली और उस विद्वान् को अगले दिन आने के लिए कहा।

    अगले दिन दरबार सजा

    हुआ था। बादशाह अपने दरबारियों के साथ बैठे थे।

    तभी विद्वान आया।

    उसने घोषणा की, “यह एक मटका है, जो कपड़े से ढंका हुआ है। यदि आप में

    से कोई भी यह बता देगा कि इसके भीतर क्या है?

    तो मैं अपनी हार स्वीकार कर लूँगा।"

    किसी भी दरबारी का कुछ भी कहने का साहस नहीं हुआ।

    मटके के भीतर क्या है यह उनकी कल्पना से परे था।

    तब बीरबल उठा, आगे बढ़ा, मटके को खोलकर भीतर झाँका और बोला, “मटके में कुछ भी नहीं है।

    वह खाली है।" विद्वान् चिल्लाया, “तुमने धोखा किया है, तुमने मटके को खोल दिया है।"

    बीरबल ने कहा, "किन्तु श्रीमान्, आपने यह तो नहीं कहा था कि मटके को खोलना नहीं है।

    " विद्वान् ने बीरबल की समझदारी का लोहा मान लिया।

    उसने बादशाह के सामने सिर झुकाया और चला गया।
    मटके में क्या है? एक बार सुदूर गाँव से एक विद्वान् अकबर के दरबार में आया। उसने अपनी विद्वता की खूब तारीफ़ की। उसने राजा से पूछा कि क्या उसके दरबारी विद्वान हैं और उसकी चुनौती को स्वीकार कर सकते हैं?" अकबर ने चुनौती स्वीकार कर ली और उस विद्वान् को अगले दिन आने के लिए कहा। अगले दिन दरबार सजा हुआ था। बादशाह अपने दरबारियों के साथ बैठे थे। तभी विद्वान आया। उसने घोषणा की, “यह एक मटका है, जो कपड़े से ढंका हुआ है। यदि आप में से कोई भी यह बता देगा कि इसके भीतर क्या है? तो मैं अपनी हार स्वीकार कर लूँगा।" किसी भी दरबारी का कुछ भी कहने का साहस नहीं हुआ। मटके के भीतर क्या है यह उनकी कल्पना से परे था। तब बीरबल उठा, आगे बढ़ा, मटके को खोलकर भीतर झाँका और बोला, “मटके में कुछ भी नहीं है। वह खाली है।" विद्वान् चिल्लाया, “तुमने धोखा किया है, तुमने मटके को खोल दिया है।" बीरबल ने कहा, "किन्तु श्रीमान्, आपने यह तो नहीं कहा था कि मटके को खोलना नहीं है। " विद्वान् ने बीरबल की समझदारी का लोहा मान लिया। उसने बादशाह के सामने सिर झुकाया और चला गया।
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  • लालची कुम्हार

    एक बार एक धोबी के गधे ने पड़ोस में रहने वाले कुम्हार के बनाए हुए बर्तन तोड़ दिए।

    हालांकि धोबी ने गधे से हुए नुकसान की भरपाई कर दी थी पर कुम्हार असंतुष्ट था।

    उसने धोबी को परेशान करने की एक योजना बनाई।

    राजा अकबर के पास जाकर उसने कहा, “मेरे रिश्तेदार कहते हैं कि उनके यहाँ सफ़ेद हाथी हैं।”

    यह सुनकर अकबर को बहुत आश्चर्य हुआ।

    उसने अपने सभी हाथियों को अच्छी तरह से साफ़ करने की आज्ञा दी।

    यह कार्य धोबी को सौंपा गया।

    धोबी कितना भी हाथियों को साफ़ करता, रगड़ता, वे स्याह ही रहते।

    वह डर गया और राजा के भय से बीरबल के पास सहायता माँगने गया।

    बीरबल ने उसे एक उपाय सुझाया।

    धोबी ने राजा से कहा, “महाराज! हाथियों को नहलाकर सफ़ेद करने के लिए आप कुम्हार से एक बड़ा-सा हौदा बनवा दीजिए।"

    अकबर ने तुरंत कुम्हार को एक बड़ा-सा गया।

    हौदा, हाथियों को नहलाने के लिए, बनाने की आज्ञा दी।

    हौदा बना पर हाथी के उसमें जाते ही हौदा टूट कुम्हार को और मज़बूत हौदा बनाने का आदेश दिया पर वह भी टूट गया।

    कुम्हार ने अपना सिर पीट लिया।

    धोबी को परेशान करने की इच्छा उसे बहुत भारी पड़ रही थी।

    उसने धोबी से क्षमा माँगी।
    लालची कुम्हार एक बार एक धोबी के गधे ने पड़ोस में रहने वाले कुम्हार के बनाए हुए बर्तन तोड़ दिए। हालांकि धोबी ने गधे से हुए नुकसान की भरपाई कर दी थी पर कुम्हार असंतुष्ट था। उसने धोबी को परेशान करने की एक योजना बनाई। राजा अकबर के पास जाकर उसने कहा, “मेरे रिश्तेदार कहते हैं कि उनके यहाँ सफ़ेद हाथी हैं।” यह सुनकर अकबर को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने अपने सभी हाथियों को अच्छी तरह से साफ़ करने की आज्ञा दी। यह कार्य धोबी को सौंपा गया। धोबी कितना भी हाथियों को साफ़ करता, रगड़ता, वे स्याह ही रहते। वह डर गया और राजा के भय से बीरबल के पास सहायता माँगने गया। बीरबल ने उसे एक उपाय सुझाया। धोबी ने राजा से कहा, “महाराज! हाथियों को नहलाकर सफ़ेद करने के लिए आप कुम्हार से एक बड़ा-सा हौदा बनवा दीजिए।" अकबर ने तुरंत कुम्हार को एक बड़ा-सा गया। हौदा, हाथियों को नहलाने के लिए, बनाने की आज्ञा दी। हौदा बना पर हाथी के उसमें जाते ही हौदा टूट कुम्हार को और मज़बूत हौदा बनाने का आदेश दिया पर वह भी टूट गया। कुम्हार ने अपना सिर पीट लिया। धोबी को परेशान करने की इच्छा उसे बहुत भारी पड़ रही थी। उसने धोबी से क्षमा माँगी।
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  • दिव्य खरगोश

    एक बार एक शिकारी रंगीन खरगोश लेकर बादशाह के दरबार में उपस्थित हुआ।

    उसने अकबर से कहा, "महाराज! कल मुझे जंगल में यह रंगीन खरगोश मिला था।

    मेरे बड़े दादा ने बताया कि यह

    खरगोश दिव्य शक्तियों से भरपूर है।

    उन्होंने इस खरगोश को आपको देने की सलाह

    दी जिससे आप इसका सही उपयोग कर सकें।"

    अकबर प्रसन्न

    हो गए पर बीरबल को कुछ शंका थी।

    बीरबल ने कहा,

    'श्रीमान्! यह खरगोश सीधा जंगल से आ रहा है, धूल

    से सना होगा। कृपया शिकारी से कहें कि वह उसे स्नान करा दे और फिर उसे पुरस्कृत भी किया जाएगा।"

    बीरबल की बातें सुनकर शिकारी भयभीत हो उठा।

    पर वह राजा की आज्ञा की अवहेलना न कर सका।

    सेवक एक बड़े से पात्र में पानी भरकर लाए।

    ज्यों-ही शिकारी ने खरगोश को नहलाना प्रारम्भ किया, सारा रंग पानी में घुल कर निकल गया।

    खरगोश अब पूरी तरह सफेद हो चुका था।

    बीरबल ने कहा, “इस व्यक्ति ने पुरस्कार के लोभ में खरगोश को रंग दिया था।

    वस्तुतः वह आपको धोखा दे रहा था ।

    " क्रुद्ध अकबर ने शिकारी को दण्ड दिया।
    दिव्य खरगोश एक बार एक शिकारी रंगीन खरगोश लेकर बादशाह के दरबार में उपस्थित हुआ। उसने अकबर से कहा, "महाराज! कल मुझे जंगल में यह रंगीन खरगोश मिला था। मेरे बड़े दादा ने बताया कि यह खरगोश दिव्य शक्तियों से भरपूर है। उन्होंने इस खरगोश को आपको देने की सलाह दी जिससे आप इसका सही उपयोग कर सकें।" अकबर प्रसन्न हो गए पर बीरबल को कुछ शंका थी। बीरबल ने कहा, 'श्रीमान्! यह खरगोश सीधा जंगल से आ रहा है, धूल से सना होगा। कृपया शिकारी से कहें कि वह उसे स्नान करा दे और फिर उसे पुरस्कृत भी किया जाएगा।" बीरबल की बातें सुनकर शिकारी भयभीत हो उठा। पर वह राजा की आज्ञा की अवहेलना न कर सका। सेवक एक बड़े से पात्र में पानी भरकर लाए। ज्यों-ही शिकारी ने खरगोश को नहलाना प्रारम्भ किया, सारा रंग पानी में घुल कर निकल गया। खरगोश अब पूरी तरह सफेद हो चुका था। बीरबल ने कहा, “इस व्यक्ति ने पुरस्कार के लोभ में खरगोश को रंग दिया था। वस्तुतः वह आपको धोखा दे रहा था । " क्रुद्ध अकबर ने शिकारी को दण्ड दिया।
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  • एक कठिन प्रश्न

    एक बार अकबर के दरबार में एक विद्वान् आया।

    उसकी इच्छा अपनी विद्वता सिद्ध कर राजा से पुरस्कार पाने की थी।

    उसने कहा, “मैंने बहुत ज्ञानार्जन किया है।

    यहाँ उपस्थित सभी लोगों से मैं अधिक ज्ञानी हूँ।

    आप मुझसे कुछ भी प्रश्न पूछ सकते हैं और मैं बदले में आपसे कुछ प्रश्न करूँगा।

    क्या किसी को मेरी चुनौती स्वीकार है?”

    अकबर ने पल भर कुछ सोचा।

    उस समय बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं था।

    एक दूत भेजकर तुरंत अकबर ने बीरबल को बुलवाया।

    बीरबल के दरबार में आते ही अकबर ने उसे उस विद्वान् की बात बताई।

    बीरबल ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।

    विद्वान् ने कहा, “मैं आपसे सौ सरल प्रश्न पूछूं या एक कठिन प्रश्न?”

    बीरबल ने उत्तर दिया, “कृपया आप एक कठिन प्रश्न पूछें।”

    विद्वान् ने पूछा, “पहले मुर्गी आई या अंडा?"

    बीरबल ने उत्तर दिया, “मुर्गी।”

    आश्चर्यचकित विद्वान् ने पूछा, “ओह! पर आपको इसका पता कैसे चला?"

    बीरबल ने कहा, “आपको एक

    प्रश्न पूछना था, आप दूसरा प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं?

    " विद्वान् ने तुरंत समझ लिया कि बीरबल अत्यंत चतुर उसने अपनी हार स्वीकार कर ली।
    एक कठिन प्रश्न एक बार अकबर के दरबार में एक विद्वान् आया। उसकी इच्छा अपनी विद्वता सिद्ध कर राजा से पुरस्कार पाने की थी। उसने कहा, “मैंने बहुत ज्ञानार्जन किया है। यहाँ उपस्थित सभी लोगों से मैं अधिक ज्ञानी हूँ। आप मुझसे कुछ भी प्रश्न पूछ सकते हैं और मैं बदले में आपसे कुछ प्रश्न करूँगा। क्या किसी को मेरी चुनौती स्वीकार है?” अकबर ने पल भर कुछ सोचा। उस समय बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं था। एक दूत भेजकर तुरंत अकबर ने बीरबल को बुलवाया। बीरबल के दरबार में आते ही अकबर ने उसे उस विद्वान् की बात बताई। बीरबल ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। विद्वान् ने कहा, “मैं आपसे सौ सरल प्रश्न पूछूं या एक कठिन प्रश्न?” बीरबल ने उत्तर दिया, “कृपया आप एक कठिन प्रश्न पूछें।” विद्वान् ने पूछा, “पहले मुर्गी आई या अंडा?" बीरबल ने उत्तर दिया, “मुर्गी।” आश्चर्यचकित विद्वान् ने पूछा, “ओह! पर आपको इसका पता कैसे चला?" बीरबल ने कहा, “आपको एक प्रश्न पूछना था, आप दूसरा प्रश्न क्यों पूछ रहे हैं? " विद्वान् ने तुरंत समझ लिया कि बीरबल अत्यंत चतुर उसने अपनी हार स्वीकार कर ली।
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  • मूँगफली और उसके छिलके

    एक दिन एक किसान ने अपने खेत की मूँगफली बादशाह अकबर को लाकर दी।

    शाही रसोइए ने उन्हें छिलके सहित उबाला और शाही बगीचे में बैठे बादशाह और उनकी रानी को खाने के

    लिए दी। रानी अकबर से दिल्लगी करना चाहती थी।

    वह मूँगफली छीलकर दाना

    रखती जाती और छिलके अकबर की ओर डालती जाती।

    अकबर

    के सेवकों ने दूर से यह देखकर सोचा कि राजा ने सारी मूँगफली खाई है

    और रानी ने तो कुछ खाई ही नहीं है।

    इसी बीच बीरबल वहाँ आया।

    उसने राजा-रानी का अभिवादन किया।

    रानी ने बीरबल को भी मूँगफली खाने के लिए कहा।

    बीरबल के बैठते ही रानी ने कहा, “देखो, बीरबल, बादशाह ने कितनी सारी स्वादिष्ट मूँगफलियाँ खाई हैं...

    देखो, छिलकों का “हाँ, मुझे पहाड़ बन गया है।"

    बीरबल ने कहा, पता है कि वे अत्यंत सुस्वादु हैं।

    महारानी जी, वे इतनी स्वादिष्ट हैं कि आपने छिलके भी खा लिए ।

    " बीरबल के चतुरतापूर्ण उत्तर पर अकबर रानी के साथ ठहाका मारकर हँस पड़े।
    मूँगफली और उसके छिलके एक दिन एक किसान ने अपने खेत की मूँगफली बादशाह अकबर को लाकर दी। शाही रसोइए ने उन्हें छिलके सहित उबाला और शाही बगीचे में बैठे बादशाह और उनकी रानी को खाने के लिए दी। रानी अकबर से दिल्लगी करना चाहती थी। वह मूँगफली छीलकर दाना रखती जाती और छिलके अकबर की ओर डालती जाती। अकबर के सेवकों ने दूर से यह देखकर सोचा कि राजा ने सारी मूँगफली खाई है और रानी ने तो कुछ खाई ही नहीं है। इसी बीच बीरबल वहाँ आया। उसने राजा-रानी का अभिवादन किया। रानी ने बीरबल को भी मूँगफली खाने के लिए कहा। बीरबल के बैठते ही रानी ने कहा, “देखो, बीरबल, बादशाह ने कितनी सारी स्वादिष्ट मूँगफलियाँ खाई हैं... देखो, छिलकों का “हाँ, मुझे पहाड़ बन गया है।" बीरबल ने कहा, पता है कि वे अत्यंत सुस्वादु हैं। महारानी जी, वे इतनी स्वादिष्ट हैं कि आपने छिलके भी खा लिए । " बीरबल के चतुरतापूर्ण उत्तर पर अकबर रानी के साथ ठहाका मारकर हँस पड़े।
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  • अशुभ चेहरा

    एक बार की बात है अकबर ने एक गरीब ब्राह्मण के विषय सुना।

    लोगों का विश्वास था कि सुबह-सुबह उसका चेहरा देख लेने से उनका दिन दुर्भाग्यपूर्ण हो जाता है।

    सच का पता लगाने के लिए अकबर ने ब्राह्मण को महल में रात बिताने के लिए बुलाया।

    सुबह-सुबह उठते ही अकबर के भोजन करते समय उसकी कुर्सी टूट गई और वह गिर पड़ा।

    तब अकबर को सुबह-सुबह ब्राह्मण का चेहरा देखना याद आया।

    अकबर ने तुरंत ब्राह्मण को फाँसी की सजा दे दी।

    बीरबल को इस बात का पता चला।

    उसने ब्राह्मण से कहा कि वह उसके सुझाए अनुसा

    र ही करे।

    फाँसी से पहले ब्राह्मण की अंतिम इच्छा पूछी गई।

    ब्राह्मण ने अकबर से बात करने की इच्छा जताई।

    अकबर आया। ब्राह्मण ने कहा, "हे महाराज!

    आपने मेरा चेहरा देखा तो आप का दोपहर का भोजन छूटा, किन्तु आपका चेहरा देखने से मेरा तो जीवन ही छूट रहा है।"

    अकबर को अपनी मूर्खता समझ

    में आ गई। उसने ब्राह्मण को बुलवाकर उससे क्षमा-याचना की तथा सिक्कों से भरा थैला उसे उपहार में दिया।
    अशुभ चेहरा एक बार की बात है अकबर ने एक गरीब ब्राह्मण के विषय सुना। लोगों का विश्वास था कि सुबह-सुबह उसका चेहरा देख लेने से उनका दिन दुर्भाग्यपूर्ण हो जाता है। सच का पता लगाने के लिए अकबर ने ब्राह्मण को महल में रात बिताने के लिए बुलाया। सुबह-सुबह उठते ही अकबर के भोजन करते समय उसकी कुर्सी टूट गई और वह गिर पड़ा। तब अकबर को सुबह-सुबह ब्राह्मण का चेहरा देखना याद आया। अकबर ने तुरंत ब्राह्मण को फाँसी की सजा दे दी। बीरबल को इस बात का पता चला। उसने ब्राह्मण से कहा कि वह उसके सुझाए अनुसा र ही करे। फाँसी से पहले ब्राह्मण की अंतिम इच्छा पूछी गई। ब्राह्मण ने अकबर से बात करने की इच्छा जताई। अकबर आया। ब्राह्मण ने कहा, "हे महाराज! आपने मेरा चेहरा देखा तो आप का दोपहर का भोजन छूटा, किन्तु आपका चेहरा देखने से मेरा तो जीवन ही छूट रहा है।" अकबर को अपनी मूर्खता समझ में आ गई। उसने ब्राह्मण को बुलवाकर उससे क्षमा-याचना की तथा सिक्कों से भरा थैला उसे उपहार में दिया।
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  • छद्म वेष में बादशाह

    अकबर अपने राज्य के गाँवों में अकसर रूप बदलकर घूमा करते थे।

    बीरबल ने कई बार उन्हें सचेत करते हुए अपने साथ सैनिक ले जाने के लिए कहा था पर अकबर अपनी जिद से अकेले ही जाया करते थे।

    एक बार इसी तरह एक साधारण ग्रामीण के रूप में अकबर घूम रहे थे।

    तभी एक दाढ़ी वाले आदमी ने आकर उन्हें रोका और कहा, “तुम कौन हो?

    हमारे गाँव में क्या कर रहे हो?"

    अकबर ने उत्तर दिया,

    'ओह! मैं एक बंजारा हूँ.. छोटे-मोटे काम करके पैसा कमाता हूँ। मुझे

    जहाँ भी चाहूँ रहने का अधिकार है।"

    उस व्यक्ति ने कहा, “अरे हाँ, तुम जहाँ चाहे रह सकते हो किन्तु तुम्हारे हाथ में यह राजा की अँगूठी कैसे और क्यों है?

    क्या तुमने चुराई है?"

    यह कहकर उस दाढ़ी वाले ने अकबर के हाथ से अँगूठी खींची और भाग खड़ा हुआ।

    अगले दिन अकबर ने अपने दरबारियों को उस दाढ़ी वाले के विषय में बताकर सारा किस्सा सुनाया।

    अँगूठी छीने जाने की बात भी बताई।

    तभी बीरबल ने खड़े होकर कहा, “क्षमा करें महाराज !

    मैं ही वह दाढ़ी वाला व्यक्ति था।

    सिपाहियों के बिना अकेले जाने से आने वाली परेशानियों से मैं आपको अवगत करवाना चाहता था।"

    उस दिन के बाद से अकबर ने बीरबल की सलाह माननी शुरू कर दी।
    छद्म वेष में बादशाह अकबर अपने राज्य के गाँवों में अकसर रूप बदलकर घूमा करते थे। बीरबल ने कई बार उन्हें सचेत करते हुए अपने साथ सैनिक ले जाने के लिए कहा था पर अकबर अपनी जिद से अकेले ही जाया करते थे। एक बार इसी तरह एक साधारण ग्रामीण के रूप में अकबर घूम रहे थे। तभी एक दाढ़ी वाले आदमी ने आकर उन्हें रोका और कहा, “तुम कौन हो? हमारे गाँव में क्या कर रहे हो?" अकबर ने उत्तर दिया, 'ओह! मैं एक बंजारा हूँ.. छोटे-मोटे काम करके पैसा कमाता हूँ। मुझे जहाँ भी चाहूँ रहने का अधिकार है।" उस व्यक्ति ने कहा, “अरे हाँ, तुम जहाँ चाहे रह सकते हो किन्तु तुम्हारे हाथ में यह राजा की अँगूठी कैसे और क्यों है? क्या तुमने चुराई है?" यह कहकर उस दाढ़ी वाले ने अकबर के हाथ से अँगूठी खींची और भाग खड़ा हुआ। अगले दिन अकबर ने अपने दरबारियों को उस दाढ़ी वाले के विषय में बताकर सारा किस्सा सुनाया। अँगूठी छीने जाने की बात भी बताई। तभी बीरबल ने खड़े होकर कहा, “क्षमा करें महाराज ! मैं ही वह दाढ़ी वाला व्यक्ति था। सिपाहियों के बिना अकेले जाने से आने वाली परेशानियों से मैं आपको अवगत करवाना चाहता था।" उस दिन के बाद से अकबर ने बीरबल की सलाह माननी शुरू कर दी।
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  • स्वतंत्रता आवश्यक है

    एक दिन अकबर बीरबल के साथ शाही उद्यान में सैर कर रहे थे।

    तभी उन दोनों ने पक्षियों को अपने घोंसलों में लौटते देखा।

    अकबर ने कहा, “इन बेचारे पक्षियों को प्रतिदिन भोजन की खोज में दूर जाना पड़ता है।

    मेरे पक्षी अपने सुनहरे पिंजरे में प्रसन्न हैं।

    उन्हें अच्छा भोजन भी प्राप्त होता है।"

    बीरबल ने कहा, “क्या मैं आपके तोते को अपने हाथ में ले सकता हूँ?"

    अकबर सहमत हो गए।

    बीरबल ने पिंजरा खोला और तोते को अपने हाथ में ले लिया।

    तोते के नहीं उड़ने से वह आश्चर्यचकित था।

    अकबर ने उसे उड़ाने की बहुत चेष्टा की पर तोता हाथ से नहीं उड़ा।

    पक्षी के इस व्यवहार से अकबर परेशान हो उठा।

    बीरबल ने तब कहा, "महाराज, पक्षियों का स्वभाव चारों ओर उड़ना है।

    वे अपना भोजन स्वयं ढूँढते हैं।

    उन्हें पिंजरे में रखकर आप उनके

    उड़ने की क्षमता और स्वतंत्रता समाप्त कर रहे हैं।

    अब तोते की आदत पिंजरे में बैठे रहने की हो गई है

    और वह उड़ना ही भूल गया है।"

    बीरबल की बातें सुनकर अकबर उदास हो गया।

    शाही पशु चिकित्सक को बुलाकर अपने सभी पक्षियों का इलाज करवाया।

    उनके स्वस्थ हो जाने पर अकबर ने बड़े ही प्रेमपूर्वक उन्हें अपने हाथों में लिया।

    वे सभी उड़कर खुले आसमान में विचरने लगे।
    स्वतंत्रता आवश्यक है एक दिन अकबर बीरबल के साथ शाही उद्यान में सैर कर रहे थे। तभी उन दोनों ने पक्षियों को अपने घोंसलों में लौटते देखा। अकबर ने कहा, “इन बेचारे पक्षियों को प्रतिदिन भोजन की खोज में दूर जाना पड़ता है। मेरे पक्षी अपने सुनहरे पिंजरे में प्रसन्न हैं। उन्हें अच्छा भोजन भी प्राप्त होता है।" बीरबल ने कहा, “क्या मैं आपके तोते को अपने हाथ में ले सकता हूँ?" अकबर सहमत हो गए। बीरबल ने पिंजरा खोला और तोते को अपने हाथ में ले लिया। तोते के नहीं उड़ने से वह आश्चर्यचकित था। अकबर ने उसे उड़ाने की बहुत चेष्टा की पर तोता हाथ से नहीं उड़ा। पक्षी के इस व्यवहार से अकबर परेशान हो उठा। बीरबल ने तब कहा, "महाराज, पक्षियों का स्वभाव चारों ओर उड़ना है। वे अपना भोजन स्वयं ढूँढते हैं। उन्हें पिंजरे में रखकर आप उनके उड़ने की क्षमता और स्वतंत्रता समाप्त कर रहे हैं। अब तोते की आदत पिंजरे में बैठे रहने की हो गई है और वह उड़ना ही भूल गया है।" बीरबल की बातें सुनकर अकबर उदास हो गया। शाही पशु चिकित्सक को बुलाकर अपने सभी पक्षियों का इलाज करवाया। उनके स्वस्थ हो जाने पर अकबर ने बड़े ही प्रेमपूर्वक उन्हें अपने हाथों में लिया। वे सभी उड़कर खुले आसमान में विचरने लगे।
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  • वे क्या सोच रहे हैं?

    एक बार अकबर ने घोषणा की, कि “जो भी व्यक्ति मेरे दरबारियों के मन में

    चल रहे भावों को बता देगा उसे उपहार स्वरूप पाँच हज़ार स्वर्ण मुद्राएं दी जाएँगी।”

    कई ज्योतिषियों, भविष्य वक्ताओं तथा साधारण लोगों

    ने प्रयत्न किया पर दरबारी सदा यही कहते कि उनके मन में कुछ और ही भाव थे। एक

    गरीब ब्राह्मण दिल्ली से अपना भाग्य आजमाने आया।

    हार जाने पर वह बीरबल से मिलने गया।

    उसने बीरबल को सारी बात बताई।

    बीरबल ने उसकी बुद्धिमता को समझकर कहा, “कल फिर प्रयत्न करना और मैं जो कहूँ वही कहना।”

    अगले दिन ब्राह्मण ने अकबर से एक ओर अवसर माँगा।

    राजा ने उसे अवसर प्रदान कर दिया।

    ब्राह्मण ने कहा, “मैं केवल एक दरबारी के

    मन की बात ही नहीं वरन् आप सभी दरबारियों के मन में क्या चल रहा है वह बताऊँगा।

    उन सभी की इच्छा है कि बादशाह दीर्घायु हों तथा उनके राज्य में समृद्धि तथा यश हो।"

    ब्राह्मण की बात को कोई भी दरबारी काट न सका।

    तब अकबर ने कहा, “अच्छा बताओ, मेरे मन में क्या है?”

    “ आपकी इच्छा है कि आपके सभी पूर्वज स्वर्ग के उत्तराधिकारी हों। "

    अकबर प्रभावित हो गया और उसने पाँच हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ ब्राह्मण को दे दीं।
    वे क्या सोच रहे हैं? एक बार अकबर ने घोषणा की, कि “जो भी व्यक्ति मेरे दरबारियों के मन में चल रहे भावों को बता देगा उसे उपहार स्वरूप पाँच हज़ार स्वर्ण मुद्राएं दी जाएँगी।” कई ज्योतिषियों, भविष्य वक्ताओं तथा साधारण लोगों ने प्रयत्न किया पर दरबारी सदा यही कहते कि उनके मन में कुछ और ही भाव थे। एक गरीब ब्राह्मण दिल्ली से अपना भाग्य आजमाने आया। हार जाने पर वह बीरबल से मिलने गया। उसने बीरबल को सारी बात बताई। बीरबल ने उसकी बुद्धिमता को समझकर कहा, “कल फिर प्रयत्न करना और मैं जो कहूँ वही कहना।” अगले दिन ब्राह्मण ने अकबर से एक ओर अवसर माँगा। राजा ने उसे अवसर प्रदान कर दिया। ब्राह्मण ने कहा, “मैं केवल एक दरबारी के मन की बात ही नहीं वरन् आप सभी दरबारियों के मन में क्या चल रहा है वह बताऊँगा। उन सभी की इच्छा है कि बादशाह दीर्घायु हों तथा उनके राज्य में समृद्धि तथा यश हो।" ब्राह्मण की बात को कोई भी दरबारी काट न सका। तब अकबर ने कहा, “अच्छा बताओ, मेरे मन में क्या है?” “ आपकी इच्छा है कि आपके सभी पूर्वज स्वर्ग के उत्तराधिकारी हों। " अकबर प्रभावित हो गया और उसने पाँच हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ ब्राह्मण को दे दीं।
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  • खोया हुआ माणिक

    एक बार की बात है, तेकचंद ने अपने मित्र से हज़ारों रुपए धोखे से ले लिए।

    तेकचंद के भाई मोहनलाल को इन सभी बातों की जानकारी थी।

    तेकचंद भयभीत था कि कहीं उसकी कुटिल योजना के विषय में मोहनलाल अकबर को सूचित न कर दे।

    यह विचार कर तेकचंद ने मोहनलाल पर हज़ारों रुपए की माणिक को चुराने का आरोप उस पर लगा दिया।

    साथ ही उसने चार लोगों को मोहनलाल के विरुद्ध झूठी गवाही देने के लिए रिश्वत भी दी।

    बीरबल को इस बात का पता चला।

    उसने चारों गवाहों को बुलाया और उन सभी से अलग-अलग बात की।

    बीरबल ने उनसे बस एक सवाल किया, “माणिक कितना बड़ा था?”

    पहला गवाह एक मोची था। उसने कहा, “ माणिक मेरे हाथों जितना बड़ा था।”

    दूसरे गवाह दर्जी ने कहा, “ओह! वह तो सूई के बराबर था।”

    तीसरा गवाह एक नाई था। उसने कहा, “वह मेरे उस्तरे के बराबर था।”

    चौथे गवाह बढ़ई ने कहा, “हूँऽऽऽ.......... वह तो हथौड़ी के बराबर था।”

    बीरबल ने उनकी झूठी गवाही सुनकर सभी गवाहों को दो-दो कोड़े लगाने के लिए कहा।

    कोड़े खाकर उन्होंने सच्चाई बताई कि उन्होंने अपने जीवन में माणिक देखा ही नहीं था।

    तेकचंद ने उन्हें झूठ बोलने के लिए रिश्वत दी थी।

    तेकचंद को उसकी करतूतों के लिए कड़ा दंड मिला।
    खोया हुआ माणिक एक बार की बात है, तेकचंद ने अपने मित्र से हज़ारों रुपए धोखे से ले लिए। तेकचंद के भाई मोहनलाल को इन सभी बातों की जानकारी थी। तेकचंद भयभीत था कि कहीं उसकी कुटिल योजना के विषय में मोहनलाल अकबर को सूचित न कर दे। यह विचार कर तेकचंद ने मोहनलाल पर हज़ारों रुपए की माणिक को चुराने का आरोप उस पर लगा दिया। साथ ही उसने चार लोगों को मोहनलाल के विरुद्ध झूठी गवाही देने के लिए रिश्वत भी दी। बीरबल को इस बात का पता चला। उसने चारों गवाहों को बुलाया और उन सभी से अलग-अलग बात की। बीरबल ने उनसे बस एक सवाल किया, “माणिक कितना बड़ा था?” पहला गवाह एक मोची था। उसने कहा, “ माणिक मेरे हाथों जितना बड़ा था।” दूसरे गवाह दर्जी ने कहा, “ओह! वह तो सूई के बराबर था।” तीसरा गवाह एक नाई था। उसने कहा, “वह मेरे उस्तरे के बराबर था।” चौथे गवाह बढ़ई ने कहा, “हूँऽऽऽ.......... वह तो हथौड़ी के बराबर था।” बीरबल ने उनकी झूठी गवाही सुनकर सभी गवाहों को दो-दो कोड़े लगाने के लिए कहा। कोड़े खाकर उन्होंने सच्चाई बताई कि उन्होंने अपने जीवन में माणिक देखा ही नहीं था। तेकचंद ने उन्हें झूठ बोलने के लिए रिश्वत दी थी। तेकचंद को उसकी करतूतों के लिए कड़ा दंड मिला।
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  • बेईमान साधु

    एक बार एक महिला ने एक साधु को अपनी सारी जमा पूँजी सुरक्षित रखने के लिए दी।

    साधु ने कहा, मेरे घर के किसी भी कोने में तुम इसे छिपा सकती हो।”

    कई महीनों बाद जब वह महिला अपनी जमा पूँजी वापस लेने आई तब वह उसे वहाँ नहीं पाकर अचंभित रह गई।

    साधु ने कहा कि उसने उस पूँजी को

    हाथ भी नहीं लगाया था।

    महिला ने इसके लिए बीरबल से सहायता माँगी। बीरबल ने अपने

    सेवक से कहा, “साधु के पास इन रत्नों को लेकर जाओ और सुरक्षित रखने के लिए

    कहो। उससे कहना कि ये रत्न तुम्हारे भाई के हैं, जो कुछ दिनों के लिए शहर छोड़कर जा रहा है।"

    बीरबल ने उस स्त्री से कहा, "जब मेरा सेवक साधु

    से बात कर रहा हो तभी तुम अपनी जमा पूँजी वापस माँगना।"

    उस महिला को देखते ही साधु भयभीत हो उठा।

    उसे लगा कि इस दूत को कहीं वह अपने खोए पैसे की बात न बता दे।

    यह सोचकर उसने कहा, “तुमने अपनी पूँजी दबाई कहीं थी और उसे ढूँढ कहीं ओर रही थी।

    तुम्हारी पूँजी उस कोने में है।”

    ज्यों-ही महिला को अपनी पूँजी मिली, बीरबल के दूसरे सेवक ने वहाँ पहुँचकर पहले सेवक से कहा, “तुम्हारे भाई ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है।"

    पहले सेवक ने कहा, “तब तो मुझे साधु की सहायता की आवश्यकता नहीं है।"

    यह कहकर वह चला गया।
    बेईमान साधु एक बार एक महिला ने एक साधु को अपनी सारी जमा पूँजी सुरक्षित रखने के लिए दी। साधु ने कहा, मेरे घर के किसी भी कोने में तुम इसे छिपा सकती हो।” कई महीनों बाद जब वह महिला अपनी जमा पूँजी वापस लेने आई तब वह उसे वहाँ नहीं पाकर अचंभित रह गई। साधु ने कहा कि उसने उस पूँजी को हाथ भी नहीं लगाया था। महिला ने इसके लिए बीरबल से सहायता माँगी। बीरबल ने अपने सेवक से कहा, “साधु के पास इन रत्नों को लेकर जाओ और सुरक्षित रखने के लिए कहो। उससे कहना कि ये रत्न तुम्हारे भाई के हैं, जो कुछ दिनों के लिए शहर छोड़कर जा रहा है।" बीरबल ने उस स्त्री से कहा, "जब मेरा सेवक साधु से बात कर रहा हो तभी तुम अपनी जमा पूँजी वापस माँगना।" उस महिला को देखते ही साधु भयभीत हो उठा। उसे लगा कि इस दूत को कहीं वह अपने खोए पैसे की बात न बता दे। यह सोचकर उसने कहा, “तुमने अपनी पूँजी दबाई कहीं थी और उसे ढूँढ कहीं ओर रही थी। तुम्हारी पूँजी उस कोने में है।” ज्यों-ही महिला को अपनी पूँजी मिली, बीरबल के दूसरे सेवक ने वहाँ पहुँचकर पहले सेवक से कहा, “तुम्हारे भाई ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है।" पहले सेवक ने कहा, “तब तो मुझे साधु की सहायता की आवश्यकता नहीं है।" यह कहकर वह चला गया।
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  • चिराग तले अंधेरा

    सुहानी सुबह थी।

    अकबर और बीरबल छज्जे पर बैठे सूर्योदय देख रहे थे।

    धीरे-धीरे आकाश से अंधकार समाप्त हो रहा था और सूर्य की किरणें बिखर रही थीं।

    यमुना नदी के कज्जल जल पर सूर्य की किरणें पड़ रही थीं और जल सुनहरा दिखने लगा था।

    वे दोनों ध्यानमग्न होकर इस मनोहर दृश्य का आनंद ले रहे थे तभी उन्हें महल के फाटक के बाहर कुछ शोर सुनाई दिया।

    दोनों ने उस दिशा में देखा। कुछ चोर यात्रियों को लूट रहे थे।

    अकबर ने तुरंत अपने पहरेदारों को चोर को पकड़ने के लिए भेजा किन्तु पहरेदारों के पहुँचने से पहले ही चोर वहाँ से भाग खड़े हुए।

    अकबर आग बबूला हो उठा। बीरबल की ओर मुड़कर उसने कहा, “प्रशासन की लापरवाही से ही ऐसी घटना घटती है।

    एक बादशाह के लिए क्या यह शर्म की बात नहीं

    है कि उसकी नज़रों के सामने लोगों को लूटा जाए और वह कुछ न कर सके?"

    बीरबल ने अकबर को शांत करते हुए कहा, "महाराज !

    एक चिराग चारों ओर रोशनी बिखेरता है पर उसके नीचे अंधेरा ही रहता है।”

    अकबर बीरबल के सूझपूर्ण उत्तर को सुनकर संतुष्ट हो गया।

    उसने यात्रियों को हरजाना दिया।

    हरजाना पाकर यात्री अपने रास्ते चले गए।
    चिराग तले अंधेरा सुहानी सुबह थी। अकबर और बीरबल छज्जे पर बैठे सूर्योदय देख रहे थे। धीरे-धीरे आकाश से अंधकार समाप्त हो रहा था और सूर्य की किरणें बिखर रही थीं। यमुना नदी के कज्जल जल पर सूर्य की किरणें पड़ रही थीं और जल सुनहरा दिखने लगा था। वे दोनों ध्यानमग्न होकर इस मनोहर दृश्य का आनंद ले रहे थे तभी उन्हें महल के फाटक के बाहर कुछ शोर सुनाई दिया। दोनों ने उस दिशा में देखा। कुछ चोर यात्रियों को लूट रहे थे। अकबर ने तुरंत अपने पहरेदारों को चोर को पकड़ने के लिए भेजा किन्तु पहरेदारों के पहुँचने से पहले ही चोर वहाँ से भाग खड़े हुए। अकबर आग बबूला हो उठा। बीरबल की ओर मुड़कर उसने कहा, “प्रशासन की लापरवाही से ही ऐसी घटना घटती है। एक बादशाह के लिए क्या यह शर्म की बात नहीं है कि उसकी नज़रों के सामने लोगों को लूटा जाए और वह कुछ न कर सके?" बीरबल ने अकबर को शांत करते हुए कहा, "महाराज ! एक चिराग चारों ओर रोशनी बिखेरता है पर उसके नीचे अंधेरा ही रहता है।” अकबर बीरबल के सूझपूर्ण उत्तर को सुनकर संतुष्ट हो गया। उसने यात्रियों को हरजाना दिया। हरजाना पाकर यात्री अपने रास्ते चले गए।
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