Upgrade to Pro

आत्मा

ईश्वर ने पंचभूत देवों (पृथ्वी, जल, अग्नि, गगन और वायु) की रचना की।

देवताओं ने उनसे अनुरोध किया, “हम चाहते हैं कि कोई हमें अन्न और जल उपलब्ध करवाए,

हमारा पोषण करे..." यह सुनकर ईश्वर ने पंचभूतों से मानव की रचना की

और देवताओं को उसमें प्रवेश करने के लिए कहा।

सर्वप्रथम उन्होंने अग्नि से प्रवेश करने के लिए कहा।

अग्नि देव मनुष्य के मुख में वाणी बने, वायु देव नासिका से प्रवेश कर जीवनदायिनी श्वास बने, सूर्यदेव ने चक्षु बन दृष्टि प्रदान की।

चारों दिशाओं ने कान से प्रवेश किया और श्रवण शक्ति दी।

पृथ्वी की दिव्य जड़ी-बूटियाँ शरीर के चर्म भाग पर रोम के रूप में समा गईं।

अंत में 'मन' मनुष्य मस्तिष्क में विचार रूप में स्थापित हुआ।

इस प्रकार ईश्वर ने सभी देवों को मनुष्य के भीतर ज्ञानेन्द्रिय रूप में स्थापित कर दिया।

अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने मनुष्य के सिर के ऊपरी भाग में एक ‘ब्रह्मरंध्र' बनाया।

वहीं से आत्मा मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है।

आत्मा अविनाशी है, इस पर किसी भी प्राकृतिक भाव का असर नहीं होता।

इसका एक ही स्वाभाविक गुण है- स्वाभाविक रूप से प्रसार करना और ईश्वर में विलीन होना।

जब तक आत्मा ईश्वर के अपने मुख्य बिन्दु तक नहीं पहुँचती, तब तक शरीर बदलता रहता है।
आत्मा ईश्वर ने पंचभूत देवों (पृथ्वी, जल, अग्नि, गगन और वायु) की रचना की। देवताओं ने उनसे अनुरोध किया, “हम चाहते हैं कि कोई हमें अन्न और जल उपलब्ध करवाए, हमारा पोषण करे..." यह सुनकर ईश्वर ने पंचभूतों से मानव की रचना की और देवताओं को उसमें प्रवेश करने के लिए कहा। सर्वप्रथम उन्होंने अग्नि से प्रवेश करने के लिए कहा। अग्नि देव मनुष्य के मुख में वाणी बने, वायु देव नासिका से प्रवेश कर जीवनदायिनी श्वास बने, सूर्यदेव ने चक्षु बन दृष्टि प्रदान की। चारों दिशाओं ने कान से प्रवेश किया और श्रवण शक्ति दी। पृथ्वी की दिव्य जड़ी-बूटियाँ शरीर के चर्म भाग पर रोम के रूप में समा गईं। अंत में 'मन' मनुष्य मस्तिष्क में विचार रूप में स्थापित हुआ। इस प्रकार ईश्वर ने सभी देवों को मनुष्य के भीतर ज्ञानेन्द्रिय रूप में स्थापित कर दिया। अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने मनुष्य के सिर के ऊपरी भाग में एक ‘ब्रह्मरंध्र' बनाया। वहीं से आत्मा मनुष्य के शरीर में प्रवेश करती है। आत्मा अविनाशी है, इस पर किसी भी प्राकृतिक भाव का असर नहीं होता। इसका एक ही स्वाभाविक गुण है- स्वाभाविक रूप से प्रसार करना और ईश्वर में विलीन होना। जब तक आत्मा ईश्वर के अपने मुख्य बिन्दु तक नहीं पहुँचती, तब तक शरीर बदलता रहता है।
1
·140 Views ·0 Προεπισκόπηση
Talkfever - Growing worldwide https://talkfever.com