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**माँ का सच | जब अतीत आया सामने**

मेरा नाम सुशीला है। मेरी एक 14 साल की बेटी है, जया। मैंने उसे अकेले ही पाला है। हम दोनों की एक छोटी-सी दुनिया है। वो स्कूल जाती है और मैं छोटा-सा पार्लर चलाती हूँ। हमारी ज़िंदगी सुकून से चल रही थी।

लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक राज़ था, जो मैंने जया से छुपा रखा था।

एक दिन मैं सामान लेने शहर गई थी। वहीं अचानक अजय से मुलाकात हो गई। बरसों बाद सामने खड़ा था वो इंसान, जिससे मैं कभी शादी करना चाहती थी। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया।

अजय आज भी मुझसे प्यार करता था। उसने कहा कि वो मुझसे शादी करना चाहता है और जया को भी अपनाएगा। मैं कुछ बोल नहीं पाई। धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। वो घर भी आने लगा, लेकिन मैं जया से उसे दूर रखना चाहती थी।

फिर वही हुआ, जिसका मुझे डर था।

एक दिन जया अचानक घर आ गई और उसने मुझे अजय के साथ देख लिया। उसका चेहरा बदल गया। वो चुप हो गई।

शाम को उसने खुद मुझसे पूछा,
“मम्मी, वो कौन थे? अगर कोई सच है, तो मुझे बता दीजिए।”

तभी अजय फिर आ गया। उसने कहा,
“आज सच बताना जरूरी है।”

उसने जया को बताया कि वो मेरी बेटी नहीं, बल्कि मेरे भाई की बेटी है। एक हादसे में मेरे भाई-भाभी चल बसे थे। तब जया सिर्फ 9 महीने की थी। मैं उसे लेकर दूसरे शहर आ गई और अपनी पूरी ज़िंदगी उसी के लिए समर्पित कर दी।

मैंने रोते हुए सच मान लिया।

जया मेरी तरफ दौड़ी और मुझसे लिपट गई।
“आप मेरी माँ हैं… बस यही सच है,” वो बोली।

मैंने कहा, “हाँ बेटा, तू मेरी बेटी है और मैं तेरी माँ।”

उस दिन हमें समझ आ गया कि रिश्ता खून से नहीं, प्यार से बनता है।

अजय आज भी शादी करना चाहता है, लेकिन मैंने कहा,
“अब हमारी तपस्या पूरी हो गई। इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।”

क्योंकि मेरी सबसे बड़ी खुशी… जया है।
**माँ का सच | जब अतीत आया सामने** मेरा नाम सुशीला है। मेरी एक 14 साल की बेटी है, जया। मैंने उसे अकेले ही पाला है। हम दोनों की एक छोटी-सी दुनिया है। वो स्कूल जाती है और मैं छोटा-सा पार्लर चलाती हूँ। हमारी ज़िंदगी सुकून से चल रही थी। लेकिन मेरी ज़िंदगी में एक राज़ था, जो मैंने जया से छुपा रखा था। एक दिन मैं सामान लेने शहर गई थी। वहीं अचानक अजय से मुलाकात हो गई। बरसों बाद सामने खड़ा था वो इंसान, जिससे मैं कभी शादी करना चाहती थी। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया। अजय आज भी मुझसे प्यार करता था। उसने कहा कि वो मुझसे शादी करना चाहता है और जया को भी अपनाएगा। मैं कुछ बोल नहीं पाई। धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ने लगीं। वो घर भी आने लगा, लेकिन मैं जया से उसे दूर रखना चाहती थी। फिर वही हुआ, जिसका मुझे डर था। एक दिन जया अचानक घर आ गई और उसने मुझे अजय के साथ देख लिया। उसका चेहरा बदल गया। वो चुप हो गई। शाम को उसने खुद मुझसे पूछा, “मम्मी, वो कौन थे? अगर कोई सच है, तो मुझे बता दीजिए।” तभी अजय फिर आ गया। उसने कहा, “आज सच बताना जरूरी है।” उसने जया को बताया कि वो मेरी बेटी नहीं, बल्कि मेरे भाई की बेटी है। एक हादसे में मेरे भाई-भाभी चल बसे थे। तब जया सिर्फ 9 महीने की थी। मैं उसे लेकर दूसरे शहर आ गई और अपनी पूरी ज़िंदगी उसी के लिए समर्पित कर दी। मैंने रोते हुए सच मान लिया। जया मेरी तरफ दौड़ी और मुझसे लिपट गई। “आप मेरी माँ हैं… बस यही सच है,” वो बोली। मैंने कहा, “हाँ बेटा, तू मेरी बेटी है और मैं तेरी माँ।” उस दिन हमें समझ आ गया कि रिश्ता खून से नहीं, प्यार से बनता है। अजय आज भी शादी करना चाहता है, लेकिन मैंने कहा, “अब हमारी तपस्या पूरी हो गई। इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए।” क्योंकि मेरी सबसे बड़ी खुशी… जया है।
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