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माँ का संदूक | 20 साल का रहस्य**

सावित्री देवी अब 75 साल की हो चुकी थीं। पति के गुजरने के बाद वो अपने पुराने छोटे-से घर में अकेली रहती थीं। उनके तीन बेटे थे। तीनों अलग-अलग घरों में रहते थे, लेकिन रोज़ माँ से मिलने आते थे। उनकी पत्नियाँ भी आती थीं। घर कभी खाली नहीं रहता था।

देखने में लगता था कि तीनों बेटे बहुत संस्कारी हैं। माँ की खूब सेवा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और थी।

घर में एक पुराना बड़ा संदूक था, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। सावित्री जी उसे अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखती थीं। बेटे और बहुएँ समझते थे कि उसमें बहुत सारा सोना-चाँदी है।

सबकी नज़र उसी पर थी।

कई बार उन्होंने माँ को अपने घर ले जाने की कोशिश की, ताकि संदूक भी साथ आ जाए। लेकिन माँ हमेशा मना कर देतीं। वो जानती थीं कि उनकी सेवा प्यार से नहीं, लालच से हो रही है।

बीस साल यूँ ही बीत गए।

एक दिन सावित्री जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने को कहा। बाहर बेटे-बहुएँ आपस में बात करने लगे कि अब संदूक का बँटवारा कैसे होगा।

माँ ने सब सुन लिया।

उन्होंने सबको कमरे में बुलाया।

“जिसके लिए तुम इतने सालों से घूम रहे हो, पहले उसे देख लो,” माँ बोलीं।

उन्होंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और संदूक खोला।

अंदर तीन कपड़ों में लिपटी चीज़ें रखी थीं।

तीनों बेटों ने एक-एक उठाया और खोला।

सबके हाथ में भारी पत्थर था।

“ये क्या माँ?” बेटे चौंक गए।

माँ बोलीं, “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, तब तुम सबने मुँह फेर लिया था। मैंने गहने बेचकर घर चलाया। ये पत्थर उन्होंने इसलिए रखवाए, ताकि तुम लोग लालच में मेरे पास आते रहो। वो चाहते थे कि मैं अकेली न रहूँ।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सब गुस्से में बाहर चले गए।

माँ बिस्तर पर लेटी सब सुनती रहीं।

संदूक में दौलत नहीं थी,
लेकिन एक माँ का आखिरी सबक जरूर था।
माँ का संदूक | 20 साल का रहस्य** सावित्री देवी अब 75 साल की हो चुकी थीं। पति के गुजरने के बाद वो अपने पुराने छोटे-से घर में अकेली रहती थीं। उनके तीन बेटे थे। तीनों अलग-अलग घरों में रहते थे, लेकिन रोज़ माँ से मिलने आते थे। उनकी पत्नियाँ भी आती थीं। घर कभी खाली नहीं रहता था। देखने में लगता था कि तीनों बेटे बहुत संस्कारी हैं। माँ की खूब सेवा करते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और थी। घर में एक पुराना बड़ा संदूक था, जिस पर हमेशा ताला लगा रहता था। सावित्री जी उसे अपनी जान से ज्यादा संभालकर रखती थीं। बेटे और बहुएँ समझते थे कि उसमें बहुत सारा सोना-चाँदी है। सबकी नज़र उसी पर थी। कई बार उन्होंने माँ को अपने घर ले जाने की कोशिश की, ताकि संदूक भी साथ आ जाए। लेकिन माँ हमेशा मना कर देतीं। वो जानती थीं कि उनकी सेवा प्यार से नहीं, लालच से हो रही है। बीस साल यूँ ही बीत गए। एक दिन सावित्री जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती होने को कहा। बाहर बेटे-बहुएँ आपस में बात करने लगे कि अब संदूक का बँटवारा कैसे होगा। माँ ने सब सुन लिया। उन्होंने सबको कमरे में बुलाया। “जिसके लिए तुम इतने सालों से घूम रहे हो, पहले उसे देख लो,” माँ बोलीं। उन्होंने तकिए के नीचे से चाबी निकाली और संदूक खोला। अंदर तीन कपड़ों में लिपटी चीज़ें रखी थीं। तीनों बेटों ने एक-एक उठाया और खोला। सबके हाथ में भारी पत्थर था। “ये क्या माँ?” बेटे चौंक गए। माँ बोलीं, “जब तुम्हारे पिता बीमार थे, तब तुम सबने मुँह फेर लिया था। मैंने गहने बेचकर घर चलाया। ये पत्थर उन्होंने इसलिए रखवाए, ताकि तुम लोग लालच में मेरे पास आते रहो। वो चाहते थे कि मैं अकेली न रहूँ।” कमरे में सन्नाटा छा गया। सब गुस्से में बाहर चले गए। माँ बिस्तर पर लेटी सब सुनती रहीं। संदूक में दौलत नहीं थी, लेकिन एक माँ का आखिरी सबक जरूर था।
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