**बस एक फोटो…**
वो सड़क और वो फुटपाथ कब से उसका घर बन गए थे, ये उसे खुद भी याद नहीं था। दुनिया उसे “कालू” कहती थी। किसी ने कभी उसका असली नाम नहीं पूछा, शायद उसे खुद भी याद नहीं था।
उम्र करीब दस साल थी, लेकिन आँखों में बहुत समझ थी। भूख और हालात ने उसे जल्दी बड़ा कर दिया था। सुबह ठंडी ज़मीन उसे जगा देती। आसमान उसकी छत था और सड़क उसकी दुनिया।
दिन भर लोग आते-जाते रहते। कोई मोबाइल में खोया रहता, कोई हँसता, कोई ग़ुस्से में। वो सबको चुपचाप देखता। उसे समझ आ गया था कि इस दुनिया से उम्मीद रखना बेकार है।
लेकिन उस दिन उसके मन में एक छोटी-सी ख्वाहिश जागी।
वो चौराहे पर बैठा था। लोग सेल्फी ले रहे थे, वीडियो बना रहे थे। वो सबको देखता रहा। उसने कभी खुद को ठीक से नहीं देखा था। दुकानों के काँच में उसका चेहरा धुंधला दिखता था।
उसके मन में बस एक सवाल था—
“मैं फोटो में कैसा लगता हूँ?”
हिम्मत करके उसने एक आदमी से कहा,
“भैया, मेरी एक फोटो ले दोगे?”
“हट जा, काम है,” आदमी बोला।
फिर एक महिला से पूछा।
“दूर रहो,” उसने फोन बचाते हुए कहा।
एक लड़का हँसा, “पहले कपड़े बदल के आ।”
हर जवाब उसके दिल को तोड़ रहा था।
वो फुटपाथ पर बैठ गया। सिर झुका लिया। शायद उसकी ख्वाहिश ही गलत थी।
तभी किसी ने पूछा,
“बेटे, उदास क्यों हो?”
सामने एक सज्जन खड़े थे, आँखों में अपनापन था।
“फोटो चाहिए?” उन्होंने पूछा।
वो धीरे से बोला, “बस देखना था… मैं कैसा लगता हूँ।”
उन्होंने मोबाइल निकाला।
“इधर खड़े हो जाओ।”
क्लिक।
“देखो।”
स्क्रीन पर वही चेहरा था। लेकिन पहली बार उसे लगा कि वो भी किसी से कम नहीं है।
थोड़ी देर बाद सज्जन एक छपी हुई फोटो लेकर आए।
“ये लो।”
उसने कांपते हाथों से पकड़ी। अपनी पहली तस्वीर।
आँखें भर आईं।
“धन्यवाद…”
वो खुशी-खुशी लौट गया।
उस रात वो फोटो सीने से लगाकर सोया।
उसके लिए वही उसकी सबसे बड़ी दौलत थी।
**मुझे ज़माने की दौलत नहीं चाहिए,
मेरी तस्वीर ही काफी है।**
वो सड़क और वो फुटपाथ कब से उसका घर बन गए थे, ये उसे खुद भी याद नहीं था। दुनिया उसे “कालू” कहती थी। किसी ने कभी उसका असली नाम नहीं पूछा, शायद उसे खुद भी याद नहीं था।
उम्र करीब दस साल थी, लेकिन आँखों में बहुत समझ थी। भूख और हालात ने उसे जल्दी बड़ा कर दिया था। सुबह ठंडी ज़मीन उसे जगा देती। आसमान उसकी छत था और सड़क उसकी दुनिया।
दिन भर लोग आते-जाते रहते। कोई मोबाइल में खोया रहता, कोई हँसता, कोई ग़ुस्से में। वो सबको चुपचाप देखता। उसे समझ आ गया था कि इस दुनिया से उम्मीद रखना बेकार है।
लेकिन उस दिन उसके मन में एक छोटी-सी ख्वाहिश जागी।
वो चौराहे पर बैठा था। लोग सेल्फी ले रहे थे, वीडियो बना रहे थे। वो सबको देखता रहा। उसने कभी खुद को ठीक से नहीं देखा था। दुकानों के काँच में उसका चेहरा धुंधला दिखता था।
उसके मन में बस एक सवाल था—
“मैं फोटो में कैसा लगता हूँ?”
हिम्मत करके उसने एक आदमी से कहा,
“भैया, मेरी एक फोटो ले दोगे?”
“हट जा, काम है,” आदमी बोला।
फिर एक महिला से पूछा।
“दूर रहो,” उसने फोन बचाते हुए कहा।
एक लड़का हँसा, “पहले कपड़े बदल के आ।”
हर जवाब उसके दिल को तोड़ रहा था।
वो फुटपाथ पर बैठ गया। सिर झुका लिया। शायद उसकी ख्वाहिश ही गलत थी।
तभी किसी ने पूछा,
“बेटे, उदास क्यों हो?”
सामने एक सज्जन खड़े थे, आँखों में अपनापन था।
“फोटो चाहिए?” उन्होंने पूछा।
वो धीरे से बोला, “बस देखना था… मैं कैसा लगता हूँ।”
उन्होंने मोबाइल निकाला।
“इधर खड़े हो जाओ।”
क्लिक।
“देखो।”
स्क्रीन पर वही चेहरा था। लेकिन पहली बार उसे लगा कि वो भी किसी से कम नहीं है।
थोड़ी देर बाद सज्जन एक छपी हुई फोटो लेकर आए।
“ये लो।”
उसने कांपते हाथों से पकड़ी। अपनी पहली तस्वीर।
आँखें भर आईं।
“धन्यवाद…”
वो खुशी-खुशी लौट गया।
उस रात वो फोटो सीने से लगाकर सोया।
उसके लिए वही उसकी सबसे बड़ी दौलत थी।
**मुझे ज़माने की दौलत नहीं चाहिए,
मेरी तस्वीर ही काफी है।**
**बस एक फोटो…**
वो सड़क और वो फुटपाथ कब से उसका घर बन गए थे, ये उसे खुद भी याद नहीं था। दुनिया उसे “कालू” कहती थी। किसी ने कभी उसका असली नाम नहीं पूछा, शायद उसे खुद भी याद नहीं था।
उम्र करीब दस साल थी, लेकिन आँखों में बहुत समझ थी। भूख और हालात ने उसे जल्दी बड़ा कर दिया था। सुबह ठंडी ज़मीन उसे जगा देती। आसमान उसकी छत था और सड़क उसकी दुनिया।
दिन भर लोग आते-जाते रहते। कोई मोबाइल में खोया रहता, कोई हँसता, कोई ग़ुस्से में। वो सबको चुपचाप देखता। उसे समझ आ गया था कि इस दुनिया से उम्मीद रखना बेकार है।
लेकिन उस दिन उसके मन में एक छोटी-सी ख्वाहिश जागी।
वो चौराहे पर बैठा था। लोग सेल्फी ले रहे थे, वीडियो बना रहे थे। वो सबको देखता रहा। उसने कभी खुद को ठीक से नहीं देखा था। दुकानों के काँच में उसका चेहरा धुंधला दिखता था।
उसके मन में बस एक सवाल था—
“मैं फोटो में कैसा लगता हूँ?”
हिम्मत करके उसने एक आदमी से कहा,
“भैया, मेरी एक फोटो ले दोगे?”
“हट जा, काम है,” आदमी बोला।
फिर एक महिला से पूछा।
“दूर रहो,” उसने फोन बचाते हुए कहा।
एक लड़का हँसा, “पहले कपड़े बदल के आ।”
हर जवाब उसके दिल को तोड़ रहा था।
वो फुटपाथ पर बैठ गया। सिर झुका लिया। शायद उसकी ख्वाहिश ही गलत थी।
तभी किसी ने पूछा,
“बेटे, उदास क्यों हो?”
सामने एक सज्जन खड़े थे, आँखों में अपनापन था।
“फोटो चाहिए?” उन्होंने पूछा।
वो धीरे से बोला, “बस देखना था… मैं कैसा लगता हूँ।”
उन्होंने मोबाइल निकाला।
“इधर खड़े हो जाओ।”
क्लिक।
“देखो।”
स्क्रीन पर वही चेहरा था। लेकिन पहली बार उसे लगा कि वो भी किसी से कम नहीं है।
थोड़ी देर बाद सज्जन एक छपी हुई फोटो लेकर आए।
“ये लो।”
उसने कांपते हाथों से पकड़ी। अपनी पहली तस्वीर।
आँखें भर आईं।
“धन्यवाद…”
वो खुशी-खुशी लौट गया।
उस रात वो फोटो सीने से लगाकर सोया।
उसके लिए वही उसकी सबसे बड़ी दौलत थी।
**मुझे ज़माने की दौलत नहीं चाहिए,
मेरी तस्वीर ही काफी है।**
·117 Ansichten
·0 Bewertungen