Mise à niveau vers Pro

  • 1
    ·176 Vue ·0 Aperçu
  • 1
    ·186 Vue ·0 Aperçu
  • 3
    1 Commentaires ·192 Vue ·0 Aperçu
  • 1
    1 Commentaires ·207 Vue ·0 Aperçu
  • 1
    1 Commentaires ·178 Vue ·0 Aperçu
  • 2
    1 Commentaires ·206 Vue ·0 Aperçu
  • 3
    1 Commentaires ·210 Vue ·0 Aperçu
  • 👉👉गागरोन दुर्ग में 2 शाके हुए :- पहला शाका 1423 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान अलपखां गौरी (होशंगशाह) ने आक्रमण किया। गागरोन के शासक वीर अचलदास खींची ने अलप खां से युद्ध लड़ा व दुर्ग में जौहर हुआ।

    👉👉दूसरा शाका 1444 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने आक्रमण किया। इस समय गागरोन के शासक पल्हणसी खींची थे। वीरांगनाओं ने जौहर किया।

    महमूद खिलजी ने गागरोन का नाम मुस्तफाबाद रख दिया था, लेकिन आज भी यह दुर्ग गागरोन नाम से ही जाना जाता है।
    👉👉गागरोन दुर्ग में 2 शाके हुए :- पहला शाका 1423 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान अलपखां गौरी (होशंगशाह) ने आक्रमण किया। गागरोन के शासक वीर अचलदास खींची ने अलप खां से युद्ध लड़ा व दुर्ग में जौहर हुआ। 👉👉दूसरा शाका 1444 ई. में हुआ, जब मांडू के सुल्तान महमूद खिलजी ने आक्रमण किया। इस समय गागरोन के शासक पल्हणसी खींची थे। वीरांगनाओं ने जौहर किया। महमूद खिलजी ने गागरोन का नाम मुस्तफाबाद रख दिया था, लेकिन आज भी यह दुर्ग गागरोन नाम से ही जाना जाता है।
    1
    ·2KB Vue ·1 Parts ·0 Aperçu
  • ·208 Vue ·0 Aperçu
  • 👉👉होटल पर बैठे एक शख्स ने दूसरे से कहा यह होटल पर काम करने वाला बच्चा इतना बेवकूफ है कि मैं पाँच सौ और पचास का नोट रखूंगा तो यह पचास का ही नोट उठाएगा। और साथ ही बच्चे को आवाज़ दी और दो नोट सामने रखते हुए बोला इन मे से ज़्यादा पैसों वाला नोट उठा लो, बच्चे ने पचास का नोट उठा लिया।

    👉👉दोनों ने क़हक़हे लगाए और बच्चा अपने काम मे लग गया पास बैठे शख्स ने उन दोनों के जाने के बाद बच्चे को बुलाया और पूछा तुम इतने बड़े हो गए तुम को पचास और पाँच सौ के नोट में फर्क नही पता।

    👉👉यह सुनकर बच्चा मुस्कुराया और बोला-- यह आदमी अक्सर किसी न किसी दोस्त को मेरी बेवक़ूफ़ी दिखाकर एन्जॉय करने के लिए यह काम करता है और मैं पचास का नोट उठा लेता हूँ, वह खुश हो जाते है और मुझे पचास रुपये मिल जाते है, जिस दिन मैंने पाँच सौ उठा लिया उस दिन यह खेल भी खत्म हो जाएगा और मेरी आमदनी भी।
    ज़िन्दगी भी इस खेल की ही तरह है हर जगह समझदार बनने की जरूरत नही होती, "जहां समझदार बनने से अपनी ही खुशियां मुतासिर होती हो वहां बेवक़ूफ़ बन जाना समझदारी है।"
    👉👉होटल पर बैठे एक शख्स ने दूसरे से कहा यह होटल पर काम करने वाला बच्चा इतना बेवकूफ है कि मैं पाँच सौ और पचास का नोट रखूंगा तो यह पचास का ही नोट उठाएगा। और साथ ही बच्चे को आवाज़ दी और दो नोट सामने रखते हुए बोला इन मे से ज़्यादा पैसों वाला नोट उठा लो, बच्चे ने पचास का नोट उठा लिया। 👉👉दोनों ने क़हक़हे लगाए और बच्चा अपने काम मे लग गया पास बैठे शख्स ने उन दोनों के जाने के बाद बच्चे को बुलाया और पूछा तुम इतने बड़े हो गए तुम को पचास और पाँच सौ के नोट में फर्क नही पता। 👉👉यह सुनकर बच्चा मुस्कुराया और बोला-- यह आदमी अक्सर किसी न किसी दोस्त को मेरी बेवक़ूफ़ी दिखाकर एन्जॉय करने के लिए यह काम करता है और मैं पचास का नोट उठा लेता हूँ, वह खुश हो जाते है और मुझे पचास रुपये मिल जाते है, जिस दिन मैंने पाँच सौ उठा लिया उस दिन यह खेल भी खत्म हो जाएगा और मेरी आमदनी भी। ज़िन्दगी भी इस खेल की ही तरह है हर जगह समझदार बनने की जरूरत नही होती, "जहां समझदार बनने से अपनी ही खुशियां मुतासिर होती हो वहां बेवक़ूफ़ बन जाना समझदारी है।"
    1
    ·803 Vue ·0 Aperçu
Talkfever - Growing worldwide https://talkfever.com