हर रोज़ यही सवाल दिल में उठता है,
मेरे कल की राहों का पता क्या होगा।

न मैं ढला वक़्त के साँचे में अब तक,
इन जमे हुए हालातों का फ़ैसला क्या होगा।

सपनों की रोशनी में कटती रही रातें,
हक़ीक़त की इस सहर का रंग क्या होगा।

ऐ दौर-ए-नया, तू ही बता दे मुझको,
तेरे सच का आख़िर सबब क्या होगा।

न चापलूसी सीखी, न समझौते किए,
मेरी सादगी का यहाँ मोल क्या होगा।

यूँ ही सोचता हूँ तन्हा बैठा अक्सर,
मेरी ज़िंदगी का आख़िरी सफ़ा क्या होगा।
हर रोज़ यही सवाल दिल में उठता है, मेरे कल की राहों का पता क्या होगा। न मैं ढला वक़्त के साँचे में अब तक, इन जमे हुए हालातों का फ़ैसला क्या होगा। सपनों की रोशनी में कटती रही रातें, हक़ीक़त की इस सहर का रंग क्या होगा। ऐ दौर-ए-नया, तू ही बता दे मुझको, तेरे सच का आख़िर सबब क्या होगा। न चापलूसी सीखी, न समझौते किए, मेरी सादगी का यहाँ मोल क्या होगा। यूँ ही सोचता हूँ तन्हा बैठा अक्सर, मेरी ज़िंदगी का आख़िरी सफ़ा क्या होगा।
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