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यही सोचता हूँ मैं हर दफ़ा, अंजाम क्या होगा,
मेरी ज़िंदगी के सफ़र का मुक़ाम क्या होगा।
न मैं बदला, न हालातों ने करवट ली अब तक,
वही किस्से, वही अख़बार — ये पैग़ाम क्या होगा।
ख़ुशियों के ख़्वाबों में दिन यूँ ही ढल जाते हैं,
ग़म की बढ़ती हुई इस शाम का नाम क्या होगा।
ऐ नई पीढ़ी, ज़रा तुम ही बता दो मुझको,
तुम्हारे जीने का असली आयाम क्या होगा।
न झुक सका मैं कभी, न सौदा कर पाया,
इस सच्चाई भरे दिल का दाम क्या होगा।यही सोचता हूँ मैं हर दफ़ा, अंजाम क्या होगा, मेरी ज़िंदगी के सफ़र का मुक़ाम क्या होगा। न मैं बदला, न हालातों ने करवट ली अब तक, वही किस्से, वही अख़बार — ये पैग़ाम क्या होगा। ख़ुशियों के ख़्वाबों में दिन यूँ ही ढल जाते हैं, ग़म की बढ़ती हुई इस शाम का नाम क्या होगा। ऐ नई पीढ़ी, ज़रा तुम ही बता दो मुझको, तुम्हारे जीने का असली आयाम क्या होगा। न झुक सका मैं कभी, न सौदा कर पाया, इस सच्चाई भरे दिल का दाम क्या होगा।0 Commentarii 0 Distribuiri 201 Views 0 previzualizare2
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