• समय की बात है एक गुरु जी के 3 शिस्य थे। गुरु जी ने अपने 3 शिष्यों को एक पोटली में कुछ दाल के दाने बांधकर दिए और कहा इन तीनो दानो को अपने अनुसार उपयोग करे। और मुझसे 1 साल बाद आकर मिले। तीनो शिष्यों ने अपनी अपनी पोटली ली और चल दिए। पहले शिष्य ने पोटली खोली की उसने देखा इसमें तो मात्र चने के दाने है

    उसने वो दाने लिए और पूजा में रख लिया की ये गुरु जी हमें प्रसाद दिया है

    और रोज़ उसकी पूजा करता। दूसरे शिष्य ने देखा इसमें चने के दाने हैं तो उसने उसकी दाल बनायीं और उसने दाल खुद खायी और और उसने अपने परिवार को खिला ली। उधर तीसरे शिष्य ने देखा और सोचा की गुरु जी ने ये दाल के दाने दिए है

    तो इसमें कुछ रहस्य होगा उसने वो दाने जमीन में गाड़ दिए जिससे 1 साल में

    बहुत खेत हो गया की और उसमे खूब दाल लगी जिससे जो भी आता तो उसे खूब दाल

    रोटी खिलाते। 1 साल बाद तीनो शिष्य गुरु जी के पास आये। और तीनो ने एक एक कर गुरु जी को बताया की क्या क्या उन्होंने किया उस पोटली के साथ। गुरु जी ने बताया की की मैंने एक जैसा ज्ञान दिया है सब को पर सब ने अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्ञान को उठाया। यही सब हमारे साथ भी होता है एक क्लास में टीचर सब बच्चो को एक साथ

    पढ़ाते हैं एक जैसा पढ़ते हैं पर कोई बच्चा टॉप करता है कोई फ़ैल हो जाता है । हम अपनी बुद्धि को कितना स्थिर करते हैं , कैसे अपने दिमाग को उपयोग करते हैं यही हमरे जीवन की दिशा को निश्चित करता है। इसलिए हमेशा सीखने की जिज्ञासा रखे , सीखते चले और जीवन को अच्छा बनाये।

    समय की बात है एक गुरु जी के 3 शिस्य थे। गुरु जी ने अपने 3 शिष्यों को एक पोटली में कुछ दाल के दाने बांधकर दिए और कहा इन तीनो दानो को अपने अनुसार उपयोग करे। और मुझसे 1 साल बाद आकर मिले। तीनो शिष्यों ने अपनी अपनी पोटली ली और चल दिए। पहले शिष्य ने पोटली खोली की उसने देखा इसमें तो मात्र चने के दाने है उसने वो दाने लिए और पूजा में रख लिया की ये गुरु जी हमें प्रसाद दिया है और रोज़ उसकी पूजा करता। दूसरे शिष्य ने देखा इसमें चने के दाने हैं तो उसने उसकी दाल बनायीं और उसने दाल खुद खायी और और उसने अपने परिवार को खिला ली। उधर तीसरे शिष्य ने देखा और सोचा की गुरु जी ने ये दाल के दाने दिए है तो इसमें कुछ रहस्य होगा उसने वो दाने जमीन में गाड़ दिए जिससे 1 साल में बहुत खेत हो गया की और उसमे खूब दाल लगी जिससे जो भी आता तो उसे खूब दाल रोटी खिलाते। 1 साल बाद तीनो शिष्य गुरु जी के पास आये। और तीनो ने एक एक कर गुरु जी को बताया की क्या क्या उन्होंने किया उस पोटली के साथ। गुरु जी ने बताया की की मैंने एक जैसा ज्ञान दिया है सब को पर सब ने अपनी श्रद्धा के अनुसार ज्ञान को उठाया। यही सब हमारे साथ भी होता है एक क्लास में टीचर सब बच्चो को एक साथ पढ़ाते हैं एक जैसा पढ़ते हैं पर कोई बच्चा टॉप करता है कोई फ़ैल हो जाता है । हम अपनी बुद्धि को कितना स्थिर करते हैं , कैसे अपने दिमाग को उपयोग करते हैं यही हमरे जीवन की दिशा को निश्चित करता है। इसलिए हमेशा सीखने की जिज्ञासा रखे , सीखते चले और जीवन को अच्छा बनाये।
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  • एक बार की बात है, यूनानी राजा मिडास था । वह बहुत अमीर था और उसके पास बहुत सारा सोना था । उसकी एक बेटी थी, जिसे वह बहुत प्यार करता था । एक दिन मिदास को एक फरिश्ता मिला जिसे मदद की जरूरत थी । उसने उसकी मदद की और बदले में वह एक इच्छा देने को तैयार हो गई । मिडास की इच्छा थी कि वह जिस चीज को छूए वह सोना बन जाए। उनकी इच्छा दी गई थी अपने घर के रास्ते में उसने चट्टानों और पौधों को छुआ और वे सोने में बदल गए । जैसे ही वह घर पहुँचा, उत्साह में उसने अपनी बेटी को गले से लगा लिया, जो सोने में बदल गई थी । मिडास तबाह हो गया था और उसने अपना सबक सीख लिया था ।

    अपना पाठ सीखने के बाद, मिदास ने देवदूत से उसकी इच्छा को दूर करने के लिए कहा ।

    कहानी की नीति लालच आपके लिए अच्छा नहीं है। सुखी और पूर्ण जीवन जीने के लिए संतुष्ट और संतुष्ट रहें।

    एक बार की बात है, यूनानी राजा मिडास था । वह बहुत अमीर था और उसके पास बहुत सारा सोना था । उसकी एक बेटी थी, जिसे वह बहुत प्यार करता था । एक दिन मिदास को एक फरिश्ता मिला जिसे मदद की जरूरत थी । उसने उसकी मदद की और बदले में वह एक इच्छा देने को तैयार हो गई । मिडास की इच्छा थी कि वह जिस चीज को छूए वह सोना बन जाए। उनकी इच्छा दी गई थी अपने घर के रास्ते में उसने चट्टानों और पौधों को छुआ और वे सोने में बदल गए । जैसे ही वह घर पहुँचा, उत्साह में उसने अपनी बेटी को गले से लगा लिया, जो सोने में बदल गई थी । मिडास तबाह हो गया था और उसने अपना सबक सीख लिया था । अपना पाठ सीखने के बाद, मिदास ने देवदूत से उसकी इच्छा को दूर करने के लिए कहा । कहानी की नीति लालच आपके लिए अच्छा नहीं है। सुखी और पूर्ण जीवन जीने के लिए संतुष्ट और संतुष्ट रहें।
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  • किसी गांव में राम और श्याम नाम के दो कुबड़े साथ-साथ रहते थे।


    राम गरीब और श्याम अमीर था, किन्तु दोनों में अच्छी मित्रता थी। एक दिन राम ने श्याम से कहा - भाई मैं कब तक तुम्हारे ऊपर बोझ बनकर रहूंगा ?


    यह सुनकर श्याम ने कहा - तुम मेरे कामों में मेरा हाथ बांटने लगो। ताकि तुम्हारे मन में ग्लानि न रहे। अगले दिन से राम श्याम के कार्यों में सहयोग करने लगा। कुछ दिनों तक सब

    कुछ ठीक रहा किन्तु धीरे-धीरे श्याम राम से अधिकाधिक काम करने लगा और उसे

    अपमानित भी करने लगा। उसके रूखे व्यवहार से दुखी हो राम ने उसका घर छोड़ दिया और जंगल की तरफ चल पड़ा। जंगल में राम की भेंट एक वृक्ष यक्ष से हुई। उसकी दुखभरी कहानी सुनकर यक्ष को उस पर दया आ गई। उसने राम के कूबड़ पर हाथ फिराया तो वह ठीक हो गया।

    फिर यक्ष ने उसे एक थैली देते हुए कहा - इसमें सोने की मुहरें हैं यदि

    तुम सदैव सदाचरण करोगे तो यह थैली कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगी। राम जब वापस गाँव लौटा, तो श्याम के मन में लोभ जाग्रत हुआ और वह भी जंगल पहुंच गया। यक्ष के पास जाकर अपना दुखड़ा रोने लगा। लेकिन यक्ष अपनी शक्ति शक्ति से श्याम के झूठ को समझ गया। श्याम का लालच देखकर यक्ष ने उसकी पीठ पर एक और कूबर पैदा कर दिया और उसे भगा दिया। कथासार यह है कि व्यक्ति के कर्मों से ही उसका वर्तमान और भविष्य तय

    होता है। अतः कभी झूठ से आगे बढ़ने की मत सोचो, सदा सतकर्मों की राह पर चलो।

    किसी गांव में राम और श्याम नाम के दो कुबड़े साथ-साथ रहते थे। राम गरीब और श्याम अमीर था, किन्तु दोनों में अच्छी मित्रता थी। एक दिन राम ने श्याम से कहा - भाई मैं कब तक तुम्हारे ऊपर बोझ बनकर रहूंगा ?यह सुनकर श्याम ने कहा - तुम मेरे कामों में मेरा हाथ बांटने लगो। ताकि तुम्हारे मन में ग्लानि न रहे। अगले दिन से राम श्याम के कार्यों में सहयोग करने लगा। कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक रहा किन्तु धीरे-धीरे श्याम राम से अधिकाधिक काम करने लगा और उसे अपमानित भी करने लगा। उसके रूखे व्यवहार से दुखी हो राम ने उसका घर छोड़ दिया और जंगल की तरफ चल पड़ा। जंगल में राम की भेंट एक वृक्ष यक्ष से हुई। उसकी दुखभरी कहानी सुनकर यक्ष को उस पर दया आ गई। उसने राम के कूबड़ पर हाथ फिराया तो वह ठीक हो गया।फिर यक्ष ने उसे एक थैली देते हुए कहा - इसमें सोने की मुहरें हैं यदि तुम सदैव सदाचरण करोगे तो यह थैली कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगी। राम जब वापस गाँव लौटा, तो श्याम के मन में लोभ जाग्रत हुआ और वह भी जंगल पहुंच गया। यक्ष के पास जाकर अपना दुखड़ा रोने लगा। लेकिन यक्ष अपनी शक्ति शक्ति से श्याम के झूठ को समझ गया। श्याम का लालच देखकर यक्ष ने उसकी पीठ पर एक और कूबर पैदा कर दिया और उसे भगा दिया। कथासार यह है कि व्यक्ति के कर्मों से ही उसका वर्तमान और भविष्य तय होता है। अतः कभी झूठ से आगे बढ़ने की मत सोचो, सदा सतकर्मों की राह पर चलो।
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  • सेठ ने संकल्प लिया की बारह वर्ष तक वह प्रतिदिन कथा सुनेंगे। उनकी कामना थी कि उनकी धन, संपदा बढ़ती रहे। ईश्वर के प्रति भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने यह मार्ग

    चुना। संकल्प लेने के बाद कथा सुनाने के लिए ब्राह्मण की खोज आरंभ हुई। सेठ जी चाहते थे कि अत्यल्प पारिश्रमिक पर कार्य हो जाए। इसलिए उन्होंने अनेक ब्राह्मणों का साक्षात्कार लिया। अंत में उन्हें एक

    जैसा सदाचारी धर्मनिष्ठा ब्राह्मण मिला, जिसने बारह वर्ष तक बहुत कम

    पारिश्रमिक पर कथा सुनाना स्वीकार कर लिया। ब्राह्मण तय समय पर प्रतिदिन आता और सेठ जी को कथा सुना जाता। बारह वर्ष होने ही वाले थे कि सेठ जी को अत्यंत जरूरी व्यापारिक कार्य

    से बाहर जाना पड़ा। जाने के पूर्व उन्होंने जब यह बात ब्राह्मण को बताई, तो

    वह बोला - आपके स्थान पर आपके पुत्र कथा सुन लेगा। यह धर्मनुसार ही है। सेठ जी ने शंका व्यक्त की - कथा सुनकर मेरा पुत्र वैरागी तो नहीं हो जायेगा ?ब्राह्मण ने कहा - इतने वर्षों तक कथा सुनने के बाद आप संन्यासी नहीं बने, तो दो-चार दिन में आपका पुत्र कैसे वैरागी बन जाएगा ?सेठ से कहा - मैं तो कथा इसलिए सुनता था कि धार्मिकता का पुण्य मिले, किन्तु कथा के प्रभाव से मैं वैरागी न बनूं। यह सुनकर ब्राह्मण बोला - क्षमा करें सेठ जी! आपको कथा का कोई पुण्य

    नहीं मिलेगा, क्योंकि आपकी धार्मिकता हार्दिक नहीं दिखावटी है और आप इसे

    स्वार्थवश कर रहे थे। सेठ जी निरुत्तर हो गए। वस्तुतः जब ईशभक्ति निष्काम होती है और तभी वह फलती भी है।

    सेठ ने संकल्प लिया की बारह वर्ष तक वह प्रतिदिन कथा सुनेंगे। उनकी कामना थी कि उनकी धन, संपदा बढ़ती रहे। ईश्वर के प्रति भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने यह मार्ग चुना। संकल्प लेने के बाद कथा सुनाने के लिए ब्राह्मण की खोज आरंभ हुई। सेठ जी चाहते थे कि अत्यल्प पारिश्रमिक पर कार्य हो जाए। इसलिए उन्होंने अनेक ब्राह्मणों का साक्षात्कार लिया। अंत में उन्हें एक जैसा सदाचारी धर्मनिष्ठा ब्राह्मण मिला, जिसने बारह वर्ष तक बहुत कम पारिश्रमिक पर कथा सुनाना स्वीकार कर लिया। ब्राह्मण तय समय पर प्रतिदिन आता और सेठ जी को कथा सुना जाता। बारह वर्ष होने ही वाले थे कि सेठ जी को अत्यंत जरूरी व्यापारिक कार्य से बाहर जाना पड़ा। जाने के पूर्व उन्होंने जब यह बात ब्राह्मण को बताई, तो वह बोला - आपके स्थान पर आपके पुत्र कथा सुन लेगा। यह धर्मनुसार ही है। सेठ जी ने शंका व्यक्त की - कथा सुनकर मेरा पुत्र वैरागी तो नहीं हो जायेगा ?ब्राह्मण ने कहा - इतने वर्षों तक कथा सुनने के बाद आप संन्यासी नहीं बने, तो दो-चार दिन में आपका पुत्र कैसे वैरागी बन जाएगा ?सेठ से कहा - मैं तो कथा इसलिए सुनता था कि धार्मिकता का पुण्य मिले, किन्तु कथा के प्रभाव से मैं वैरागी न बनूं। यह सुनकर ब्राह्मण बोला - क्षमा करें सेठ जी! आपको कथा का कोई पुण्य नहीं मिलेगा, क्योंकि आपकी धार्मिकता हार्दिक नहीं दिखावटी है और आप इसे स्वार्थवश कर रहे थे। सेठ जी निरुत्तर हो गए। वस्तुतः जब ईशभक्ति निष्काम होती है और तभी वह फलती भी है।
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  • सदियों पहले की बात है। राजा सूर्यसेन प्रतापगढ़ का राजा था। राजा की इकलौती संतान उसकी पुत्री भानुमति थी। वह अत्यंत सुंदर थी। भानुमति के विवाह योग्य होने पर राजा को पुत्री के लिए एक योग्य वर की तलाश थी। राजा एक ऐसा बुद्धिमान वर खोजना चाहता था जो उसकी पुत्री से विवाह के पश्चात उसके राज्य को भी संभाल सके। राजा ने ऐलान किया कि जो कोई भी राजकुमारी से विवाह करना चाहता है वह संसार की सबसे मूलयवान वस्तु लेकर आए। अनेक राजकुमार कई मुलयमान वस्तुएं लेकर राजा के समक्ष उपस्थित होते रहते

    थे किन्तु राजा ने सबको नकार दिया। राजा को यकीन था कि एक दिन कोई न कोई

    योग्य युवक इस शर्त को जरूर पूरा करेगा। एक दिन उसी राजा के राज्य के एक गांव के किसान के पुत्र रघु को राजा के इस शर्त के बारे में पता लगा। रघु बहुत बुद्धिमान था। उसने विवेकपूर्ण तरिके से सोचा और फिर एक दिन तीन वस्तुएं लेकर राजा के दरबार में हाजिर हो गया। राजा से अनुमति पाकर वह बोला - मैं दुनिया की तीन सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तुएं लाया हूँ। मेरे हाथ में यह मिट्टी है जो हमें अन्न देती है, यह जल है जो अमूल्य है और इसके बिना जीवन संभव नहीं है तीसरी वस्तु पुस्तक है। पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं और ज्ञान के बिना सृष्टि का संचालन असंभव है। रघु की बुद्धिमता से राजा प्रभावित हुआ और उसने भानुमति का विवाह उससे करके उसे राज्य का योग्य उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सार यह है कि बुद्धि, विवेक और ज्ञान से कठिन से कठिन प्रश्नों का हल निकल जाता है।

    सदियों पहले की बात है। राजा सूर्यसेन प्रतापगढ़ का राजा था। राजा की इकलौती संतान उसकी पुत्री भानुमति थी। वह अत्यंत सुंदर थी। भानुमति के विवाह योग्य होने पर राजा को पुत्री के लिए एक योग्य वर की तलाश थी। राजा एक ऐसा बुद्धिमान वर खोजना चाहता था जो उसकी पुत्री से विवाह के पश्चात उसके राज्य को भी संभाल सके। राजा ने ऐलान किया कि जो कोई भी राजकुमारी से विवाह करना चाहता है वह संसार की सबसे मूलयवान वस्तु लेकर आए। अनेक राजकुमार कई मुलयमान वस्तुएं लेकर राजा के समक्ष उपस्थित होते रहते थे किन्तु राजा ने सबको नकार दिया। राजा को यकीन था कि एक दिन कोई न कोई योग्य युवक इस शर्त को जरूर पूरा करेगा। एक दिन उसी राजा के राज्य के एक गांव के किसान के पुत्र रघु को राजा के इस शर्त के बारे में पता लगा। रघु बहुत बुद्धिमान था। उसने विवेकपूर्ण तरिके से सोचा और फिर एक दिन तीन वस्तुएं लेकर राजा के दरबार में हाजिर हो गया। राजा से अनुमति पाकर वह बोला - मैं दुनिया की तीन सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तुएं लाया हूँ। मेरे हाथ में यह मिट्टी है जो हमें अन्न देती है, यह जल है जो अमूल्य है और इसके बिना जीवन संभव नहीं है तीसरी वस्तु पुस्तक है। पुस्तकें ज्ञान का आधार होती हैं और ज्ञान के बिना सृष्टि का संचालन असंभव है। रघु की बुद्धिमता से राजा प्रभावित हुआ और उसने भानुमति का विवाह उससे करके उसे राज्य का योग्य उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। सार यह है कि बुद्धि, विवेक और ज्ञान से कठिन से कठिन प्रश्नों का हल निकल जाता है।
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  • एक बालक अभी पुरे दो साल का भी नहीं हुआ था की उसके पिता की मृत्यु हो गयी। ऐसी कठिन परिस्थिति में उसकी मां उसे लेकर अपने मायके में रहने लगी। सभी उसे नन्हा कहकर पुकारते थे। छोटे से कद का बालक शारीरिक रूप से दुर्बल था किन्तु मानसिक रूप से अत्यंत मेधावी। उसे जो कुछ भी कहा या सिखाया जाता वह बड़े मनोयोग से उसे ग्रहण करता था। धीरे-धीरे दिन बीतते गए और बालक छह वर्ष का हो गया। एक बार वह अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर किसी बाग़ में फूल तोड़ने

    पहुंचा। वह बालक और उसके सभी फल तोड़ने लगे। तभी माली आ गया। उस बालक के सभी

    मित्र भाग गए, लेकिन वह माली की पकड़ में आ गया। माली ने उसे डंडे से पीटना शुरू किया। नन्हा मार खाता रहा और फिर धीमी

    आवाज में माली से बोला - मेरे पिता इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए तुम मुझे

    इस तरह मार रहे हो ?बालक की बात सुनकर माली का हाथ रुक गया। माली शांत होकर बोला - बेटा,

    तुम्हारे पिता के न होने से तुम्हारी जिम्मेवारी और अधिक बढ़ जाती है कि तुम

    कोई गलत काम नहीं करो। यह सुनकर नन्हा बालक फूट-फूट कर रो पड़ा और फिर कभी गलत काम न करने का संकल्प लिया। यही नन्हा बालक बड़ा होकर लाल बहादुर शास्त्री के नाम से वख्यात हुआ और

    प्रधानमंत्री के रूप में अपने गुण व व्यवहार से सर्वत्र प्रशंसा पाई। कथा का सार यह है कि मां-बाप के अमूल्य मार्गदर्शन के आभाव की स्थिति में और अधिक जिम्मेदार बनकर आत्मविकास करना चाहिए।

    एक बालक अभी पुरे दो साल का भी नहीं हुआ था की उसके पिता की मृत्यु हो गयी। ऐसी कठिन परिस्थिति में उसकी मां उसे लेकर अपने मायके में रहने लगी। सभी उसे नन्हा कहकर पुकारते थे। छोटे से कद का बालक शारीरिक रूप से दुर्बल था किन्तु मानसिक रूप से अत्यंत मेधावी। उसे जो कुछ भी कहा या सिखाया जाता वह बड़े मनोयोग से उसे ग्रहण करता था। धीरे-धीरे दिन बीतते गए और बालक छह वर्ष का हो गया। एक बार वह अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर किसी बाग़ में फूल तोड़ने पहुंचा। वह बालक और उसके सभी फल तोड़ने लगे। तभी माली आ गया। उस बालक के सभी मित्र भाग गए, लेकिन वह माली की पकड़ में आ गया। माली ने उसे डंडे से पीटना शुरू किया। नन्हा मार खाता रहा और फिर धीमी आवाज में माली से बोला - मेरे पिता इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए तुम मुझे इस तरह मार रहे हो ?बालक की बात सुनकर माली का हाथ रुक गया। माली शांत होकर बोला - बेटा, तुम्हारे पिता के न होने से तुम्हारी जिम्मेवारी और अधिक बढ़ जाती है कि तुम कोई गलत काम नहीं करो। यह सुनकर नन्हा बालक फूट-फूट कर रो पड़ा और फिर कभी गलत काम न करने का संकल्प लिया। यही नन्हा बालक बड़ा होकर लाल बहादुर शास्त्री के नाम से वख्यात हुआ और प्रधानमंत्री के रूप में अपने गुण व व्यवहार से सर्वत्र प्रशंसा पाई। कथा का सार यह है कि मां-बाप के अमूल्य मार्गदर्शन के आभाव की स्थिति में और अधिक जिम्मेदार बनकर आत्मविकास करना चाहिए।
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  • एक किसान था जिसके दो बेटे थे । वह बहुत ही आलसी और निकम्मे थे, वह अपने पिता को कामकाज में हाथ बठाने के बजाए आलस किया करते थे, इधर-उधर घूमते-फिरते थे। किसान को अपने बेटों की बहुत फिकर थी, वोह सोचते थे की मेरे मरने के

    बाद इनका क्या होगा, यह अपना पेट कैसे भरेंगे, अपने परिवार को कैसे संभाल

    पायेंगे।एक दिन किसान की हालत बहुत ही गंभीर थी, कहने का मतलब, किसान मरने की हालत में था। तभी किसान ने अपने दोनों बेटो को बुलाकर उनसे कहां की, हमारे खेत में

    एक खजाना गढ़ा हुआ है, लेकिन वह किस जगह है उसकी जानकारी मुझे भी नहीं है,

    लेकिन खोदने बाद तुमे वो खजाना मिल जाएगा। इतना कहकर किसान भगवान को प्यारे हो गये।खजाने की खबर सुनकर दोनो बेटों के मन में लालच आ गया और वो दोनों खेत पर

    चले गये और खेत को खोदने लगे, खजाने के लालच में कुछ ही दिनों में पूरे

    खेत को खोदने के बाद वह घर जाकर बैठ गए और वह अपने पिता को कोसने लगे, इसी

    तरह कुछ महीने बित गए और वर्षा ऋतु का आगमन हुआ। किसान के बेटों के पास पेट भरने के लिए सिर्फ एक ही जरिया था वोह है खेती।तब बाकी किसानो की तरह किसान के बेटो ने खेत में बिज बोने शुरु कर दिए। वर्षा का पाणी पाकर वह बिज अंकुशित हुए और देखते ही देखते खेत लहराने लगे। ऐसा लग रहा था की हवा के झोके से लहरा रहा था। यह देखकर किसान के बेटे बहुत खुश हो गये, उन को समझ आ गया की परिश्रम ही

    सच्चा धन होता है और वो उसी तरह से अपने पिता के शब्दो का मोल भी समझ गये

    और अपने कामकाज में लग गये।

    एक किसान था जिसके दो बेटे थे । वह बहुत ही आलसी और निकम्मे थे, वह अपने पिता को कामकाज में हाथ बठाने के बजाए आलस किया करते थे, इधर-उधर घूमते-फिरते थे। किसान को अपने बेटों की बहुत फिकर थी, वोह सोचते थे की मेरे मरने के बाद इनका क्या होगा, यह अपना पेट कैसे भरेंगे, अपने परिवार को कैसे संभाल पायेंगे।एक दिन किसान की हालत बहुत ही गंभीर थी, कहने का मतलब, किसान मरने की हालत में था। तभी किसान ने अपने दोनों बेटो को बुलाकर उनसे कहां की, हमारे खेत में एक खजाना गढ़ा हुआ है, लेकिन वह किस जगह है उसकी जानकारी मुझे भी नहीं है, लेकिन खोदने बाद तुमे वो खजाना मिल जाएगा। इतना कहकर किसान भगवान को प्यारे हो गये।खजाने की खबर सुनकर दोनो बेटों के मन में लालच आ गया और वो दोनों खेत पर चले गये और खेत को खोदने लगे, खजाने के लालच में कुछ ही दिनों में पूरे खेत को खोदने के बाद वह घर जाकर बैठ गए और वह अपने पिता को कोसने लगे, इसी तरह कुछ महीने बित गए और वर्षा ऋतु का आगमन हुआ। किसान के बेटों के पास पेट भरने के लिए सिर्फ एक ही जरिया था वोह है खेती।तब बाकी किसानो की तरह किसान के बेटो ने खेत में बिज बोने शुरु कर दिए। वर्षा का पाणी पाकर वह बिज अंकुशित हुए और देखते ही देखते खेत लहराने लगे। ऐसा लग रहा था की हवा के झोके से लहरा रहा था। यह देखकर किसान के बेटे बहुत खुश हो गये, उन को समझ आ गया की परिश्रम ही सच्चा धन होता है और वो उसी तरह से अपने पिता के शब्दो का मोल भी समझ गये और अपने कामकाज में लग गये।
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